अंग : 946
गुरमुखि साचु सबदु बीचारै कोइ ॥ गुरमुखि सचु बाणी परगटु होइ ॥ गुरमुखि मनु भीजै विरला बूझै कोइ ॥ गुरमुखि निज घरि वासा होइ ॥ गुरमुखि जोगी जुगति पछाणै ॥ गुरमुखि नानक एको जाणै ॥६९॥ बिनु सतिगुर सेवे जोगु न होई ॥ बिनु सतिगुर भेटे मुकति न कोई ॥ बिनु सतिगुर भेटे नामु पाइआ न जाइ ॥ बिनु सतिगुर भेटे महा दुखु पाइ ॥ बिनु सतिगुर भेटे महा गरबि गुबारि ॥ नानक बिनु गुर मुआ जनमु हारि ॥७०॥ गुरमुखि मनु जीता हउमै मारि ॥ गुरमुखि साचु रखिआ उर धारि ॥ गुरमुखि जगु जीता जमकालु मारि बिदारि ॥ गुरमुखि दरगह न आवै हारि ॥ गुरमुखि मेलि मिलाए सो जाणै ॥ नानक गुरमुखि सबदि पछाणै ॥७१॥ सबदै का निबेड़ा सुणि तू अउधू बिनु नावै जोगु न होई ॥ नामे राते अनदिनु माते नामै ते सुखु होई ॥ नामै ही ते सभु परगटु होवै नामे सोझी पाई ॥ बिनु नावै भेख करहि बहुतेरे सचै आपि खुआई ॥ सतिगुर ते नामु पाईऐ अउधू जोग जुगति ता होई ॥ करि बीचारु मनि देखहु नानक बिनु नावै मुकति न होई ॥७२॥ तेरी गति मिति तूहै जाणहि किआ को आखि वखाणै ॥ तू आपे गुपता आपे परगटु आपे सभि रंग माणै ॥ साधिक सिध गुरू बहु चेले खोजत फिरहि फुरमाणै ॥ मागहि नामु पाइ इह भिखिआ तेरे दरसन कउ कुरबाणै ॥ अबिनासी प्रभि खेलु रचाइआ गुरमुखि सोझी होई ॥ नानक सभि जुग आपे वरतै दूजा अवरु न कोई ॥७३॥१॥
अर्थ: यदि कोई मनुष्य गुरु के हुक्म के अनुसार चलता है, तो वह सच्चे शब्द का विचार करता है। सतिगुरु की वाणी के माध्यम से सच्चा प्रभु उसके हृदय में प्रकट हो जाता है। गुरमुख मनुष्य का मन नाम-रस में भीग जाता है, लेकिन इस बात को कोई विरला ही समझता है। गुरु के मार्ग पर चलने वाला मनुष्य अपने वास्तविक आत्मिक स्वरूप में स्थित रहता है। जो मनुष्य सतिगुरु के हुक्म में चलता है, वही सच्चा योगी है और प्रभु से मिलन की विधि पहचानता है। हे नानक! गुरु के हुक्म में चलने वाला मनुष्य एक परमात्मा को ही हर स्थान पर व्याप्त जानता है।
70। सतिगुरु की बताई हुई सेवा और आज्ञा का पालन किए बिना प्रभु से मिलन नहीं होता। गुरु से मिले बिना मुक्ति प्राप्त नहीं होती। गुरु के बिना प्रभु का नाम प्राप्त नहीं हो सकता और मनुष्य बहुत कष्ट उठाता है। गुरु से मिले बिना मनुष्य अहंकार और घोर अज्ञान के अंधकार में रहता है। हे नानक! सतिगुरु के बिना मनुष्य अपने जीवन की बाज़ी हारकर आत्मिक मृत्यु को प्राप्त होता है।
71। जो मनुष्य गुरु के हुक्म के अनुसार चलता है, वह अपने अहंकार को मिटाकर अपने मन पर विजय प्राप्त कर लेता है। वह सदा स्थिर रहने वाले प्रभु को अपने हृदय में बसा लेता है। मृत्यु के भय को समाप्त करके वह संसार पर विजय प्राप्त कर लेता है। ऐसा मनुष्य जीवन की बाज़ी हारकर प्रभु की हज़ूरी में नहीं जाता, बल्कि विजयी होकर जाता है। प्रभु स्वयं गुरमुख मनुष्य के लिए मिलन का संयोग बनाकर उसे अपने साथ मिला लेता है। इस रहस्य को वही गुरमुख समझता है। हे नानक! गुरु के मार्ग पर चलने वाला मनुष्य गुरु के शब्द के माध्यम से प्रभु को पहचान लेता है।
72। हे योगी! सुनो, सभी उपदेशों का सार यही है कि प्रभु के नाम के बिना सच्चा योग अर्थात प्रभु से मिलन संभव नहीं है। जो मनुष्य प्रभु के नाम में रंगे हुए हैं, वे हर समय उसी के प्रेम में मग्न रहते हैं। नाम से ही आत्मिक सुख मिलता है। नाम से ही पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है और नाम से ही सच्ची समझ आती है। जो मनुष्य प्रभु का नाम छोड़कर अनेक प्रकार के धार्मिक वेश धारण करते हैं, उन्हें सच्चे प्रभु ने स्वयं ही भटकने दिया है। हे योगी! सतिगुरु से ही प्रभु का नाम प्राप्त होता है और नाम मिलने पर ही सच्चे योग की अवस्था प्राप्त होती है। हे नानक! अपने मन में विचार करके देख लो, नाम के बिना मुक्ति नहीं मिलती। अर्थात नाम-सिमरन के बिना अहंकार से छुटकारा नहीं मिल सकता।
73। हे प्रभु! तू कैसा है और कितना महान है, यह केवल तू स्वयं ही जानता है। कोई दूसरा तेरी महिमा को शब्दों में कैसे बता सकता है? तू स्वयं ही छिपा हुआ है और स्वयं ही प्रकट है। अर्थात सूक्ष्म और स्थूल, दोनों रूपों में तू ही विद्यमान है। तू स्वयं ही संसार के सभी रंगों का आनंद ले रहा है। साधना करने वाले, सिद्ध योगी, गुरु और उनके अनेक शिष्य, सभी तेरे हुक्म में तुझे खोजते फिरते हैं। वे तुझसे तेरे नाम की भिक्षा माँगते हैं और तेरे दर्शन पर स्वयं को न्योछावर करते हैं। हे नानक! अविनाशी प्रभु ने ही संसार की यह लीला रची है। गुरमुख मनुष्य को इस सत्य की समझ प्राप्त होती है। सभी युगों में वही प्रभु स्वयं विद्यमान है। उसके समान कोई दूसरा नहीं है।