संधिआ ​​वेले का हुक्मनामा – 03 नवंबर 2026

अंग : 683
धनासरी महला ५ हलति सुखु पलति सुखु नित सुखु सिमरनो नामु गोबिंद का सदा लीजै ॥ मिटहि कमाणे पाप चिराणे साधसंगति मिलि मुआ जीजै ॥१॥ रहाउ ॥ राज जोबन बिसरंत हरि माइआ महा दुखु एहु महांत कहै ॥ आस पिआस रमण हरि कीरतन एहु पदारथु भागवंतु लहै ॥१॥ सरणि समरथ अकथ अगोचरा पतित उधारण नामु तेरा ॥ अंतरजामी नानक के सुआमी सरबत पूरन ठाकुरु मेरा ॥२॥२॥५४॥
अर्थ: हे भाई ! परमात्मा का नाम सदा सिमरना चाहिए। सुमिरन इस लोक में परलोक में सदा ही सुख देने वाला है (सुमिरन की बरकत के साथ) सभी पुराने किये हुए पाप मिट जाते हैं। हे भाई ! साध संगत में मिल के (सुमिरन करने के साथ) आत्मिक मौत मरा हुआ मनुख फिर से आत्मिक जीवन हासिल कर लेता है।1।रहाउ। हे भाई ! राज और जवानी (के झूले ) परमात्मा का नाम भुला देते हैं ! माया का मोह बड़ा दु:ख (का कारन) है-यह बात महा पुरख बताते हैं। परमात्मा के नाम के सुमिरन, परमात्मा की सिफ़त-सालाह की आशा और चाह-यह कीमती चीज कोई विरला किस्मत वाला मनुख प्राप्त करता है।1। हे शरण आए की सहायता करने योग्य ! हे अकथ ! हे अगोचर ! हे अंतरजामी ! हे नानक के स्वामी ! तेरा नाम विकारीयों को विकारों से बचा लेने वाला है। हे भाई ! मेरा स्वामी-भगवान सब जगह व्यापक है।2।2।58।

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