अमृत ​​वेले का हुक्मनामा – 31 अक्तूबर 2026

अंग : 676
धनासरी महला ५ ॥ फिरत फिरत भेटे जन साधू पूरै गुरि समझाइआ ॥ आन सगल बिधि कांमि न आवै हरि हरि नामु धिआइआ ॥१॥ ता ते मोहि धारी ओट गोपाल ॥ सरनि परिओ पूरन परमेसुर बिनसे सगल जंजाल ॥ रहाउ ॥ सुरग मिरत पइआल भू मंडल सगल बिआपे माइ ॥ जीअ उधारन सभ कुल तारन हरि हरि नामु धिआइ ॥२॥ नानक नामु निरंजनु गाईऐ पाईऐ सरब निधाना ॥ करि किरपा जिसु देइ सुआमी बिरले काहू जाना ॥३॥३॥२१॥
अर्थ: हे भाई! तलाश करते करते जब मैं गुरू महापुरुष को मिला, तो पूरे गुरू ने (मुझे) ये समझ बख्शी कि (माया के मोह से बचने कि लिए) अन्य सारी युक्तियों में से कोई एक युक्ति भी काम नहीं आती। परमात्मा का नाम सिमरा हुआ ही काम आता है।1। इसलिए, हे भाई! मैंने परमात्मा का आसरा ले लिया। (जब मैं) सर्व-व्यापक परमात्मा की शरण पड़ा, तो मेरे सारे (माया के) जंजाल नाश हो गए। रहाउ। हे भाई! देव-लोक, मात-लोक, पाताल-लोक, सारी ही सृष्टि माया (के मोह) में फंसी हुई है। हे भाई! सदा परमात्मा का नाम सिमरा कर, यही है जिंद को (माया के मोह में से) बचाने वाला, यही है सारी कुलों के उद्धार करने वाला।2। हे नानक! माया से निर्लिप परमात्मा का नाम गाना चाहिए, (नाम की बरकति से) सारे खजानों की प्राप्ति हो जाती है, पर (ये भेद) किसी (उस) विरले मनुष्य ने समझा है जिसे मालिक प्रभू स्वयं मेहर करके (नाम की दाति) देता है।3।3।21।

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