अमृत ​​वेले का हुक्मनामा – 10 अक्तूबर 2026

अंग : 685
धनासरी महला १ घरु २ असटपदीआ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ गुरु सागरु रतनी भरपूरे ॥ अम्रितु संत चुगहि नही दूरे ॥ हरि रसु चोग चुगहि प्रभ भावै ॥ सरवर महि हंसु प्रानपति पावै ॥१॥ किआ बगु बपुड़ा छपड़ी नाइ ॥ कीचड़ि डूबै मैलु न जाइ ॥१॥ रहाउ ॥ रखि रखि चरन धरे वीचारी ॥ दुबिधा छोडि भए निरंकारी ॥ मुकति पदारथु हरि रस चाखे ॥ आवण जाण रहे गुरि राखे ॥२॥ सरवर हंसा छोडि न जाइ ॥ प्रेम भगति करि सहजि समाइ ॥ सरवर महि हंसु हंस महि सागरु ॥ अकथ कथा गुर बचनी आदरु ॥३॥ सुंन मंडल इकु जोगी बैसे ॥ नारि न पुरखु कहहु कोऊ कैसे ॥ त्रिभवण जोति रहे लिव लाई ॥ सुरि नर नाथ सचे सरणाई ॥४॥ आनंद मूलु अनाथ अधारी ॥ गुरमुखि भगति सहजि बीचारी ॥ भगति वछल भै काटणहारे ॥ हउमै मारि मिले पगु धारे ॥५॥ अनिक जतन करि कालु संताए ॥ मरणु लिखाइ मंडल महि आए ॥ जनमु पदारथु दुबिधा खोवै ॥ आपु न चीनसि भ्रमि भ्रमि रोवै ॥६॥ कहतउ पड़तउ सुणतउ एक ॥ धीरज धरमु धरणीधर टेक ॥ जतु सतु संजमु रिदै समाए ॥ चउथे पद कउ जे मनु पतीआए ॥७॥ साचे निरमल मैलु न लागै ॥ गुर कै सबदि भरम भउ भागै ॥ सूरति मूरति आदि अनूपु ॥ नानकु जाचै साचु सरूपु ॥८॥१॥
अर्थ: राग धनासरी, घर २ में गुरु नानक देव जी की आठ-बंदो वाली बाणी। अकाल पुरख एक है और सतगुरु की कृपा द्वारा मिलता है। गुरु (मानो) एक सागर (है जो प्रभु की सिफत सलाह के) रत्नों से लाबा-लब भरा हुआ है। गुरमुख सिख (उस सागर में) aatimik जीवन dene वाली खुराक (प्राप्त करते हैं जैसे हंस मोती) चुगते हैं, (और गुरु से) दूर नहीं रहते। प्रभु की कृपा अनुसार संत-हंस हरी-नाम रस (की) चोग चुगते हैं। (गुरसिख) हंस (गुरु-) सरोवर में (टिके रहते हैं, और) जिंद के मालिक प्रभु को ढूंढ़ लेते हैं।१। बेचारा बगुला तालाब में किस लिए नहाता है? (कुछ नहीं कमाता, बलिकी, तालाब में नहा कर) कीचड़ में डूबता है, (उस की यह) मैल दूर नहीं होती (जो मनुख गुरु-सागर को छोड़ कर देवी देवता आदि और और सहारे खोजते हैं वह, मानो तालाब में ही नहा रहे हैं। वहाँ वह और माया-मोह की मैल खिंच लेते हैं।१।रहाउ। रसिख बड़ा सचेत हो के पूरा विचारवान हो के (जीवन-यात्रा में) पैर रखता है। परमात्मा के बिना किसी और आसरे की तलाश छोड़ के परमात्मा का ही बन जाता है। परमात्मा के नाम का रस चख के गुरसिख वह पदार्थ हासिल कर लेता है जो माया के मोह से खलासी दिलवा देता है। जिसकी गुरु ने सहायता कर दी उसके जन्म-मरण के चक्कर समाप्त हो गए।2। जैसे) हंस मानसरोवर को छोड़ के नहीं जाता (वैसे ही जो सिख गुरु का दर छोड़ के नहीं जाता वह) प्रेमा भक्ति की इनायत से अडोल आत्मिक अवस्था में लीन हो जाता है। जो गुरसिख-हंस गुरु-सरोवर में टिकता है, उसके अंदर गुरु-सरोवर अपना आप प्रगट करता है (उस सिख के अंदर गुरु बस जाता है) – यह कथा अकथ है (भाव, इस आत्मिक अवस्था का बयान नहीं किया जा सकता। सिर्फ ये कह सकते हैं कि) गुरु के वचन पर चल के वह (लोक-परलोक में) आदर पाता है।3। जे कोई विरला प्रभु चरणों में जुड़ा हुआ सख्श शून्य अवस्था में टिकता है, उसके अंदर स्त्री-मर्द वाला भेद नहीं रह जाता (भाव, उसके काम चेष्टा अपना प्रभाव नहीं डालती)। बताओ, कोई ये संकल्प कर भी कैसे सकता है? क्योंकि वह तो सदा उस परमात्मा में तवज्जो जोड़े रखता है जिसकी ज्योति तीनों भवनों में व्यापक है और देवते मनुष्य नाथ आदि सभी जिस सदा-स्थिर की शरण लिए रखते हैं।4। (गुरमुख-हंस गुरु-सागर में टिक के उस प्राणपति-प्रभु को मिलता है) जो आत्मिक आनंद का श्रोत है जो निआसरों का आसरा है। गुरमुख उसकी भक्ति के द्वारा और उसके गुणों के विचार के माध्यम से अडोल आत्मिक अवस्था में टिके रहते हैं। वह प्रभु (अपने सेवकों की) भक्ति से प्रेम करता है, उनके सारे डर दूर करने के समर्थ है। गुरमुखि अहंकार को मार के और (साधु-संगत में) टिक के उस आनंद-मूल प्रभु (के चरणों) में जुड़ते हैं।5। जो मनुष्य (बेचारे बगुले की तरह अहंकार की छपड़ी में ही नहाता है, और) अपने आत्मिक जीवन को नहीं पहचानता, वह (अहंकार में) भटक-भटक के दुखी होता है; परमात्मा के बिना किसी और आसरे की तलाश में वह अमूल्य मानव जनम गवा लेता है; अनेक अन्य ही जतन करने के कारण (सहेड़ी हुई) आत्मिक मौत (का लेख ही अपने माथे पर) लिखा के इस जगत में आया (और यहाँ भी आत्मिक मौत ही गले पड़वाता रहा)।6। (पर) जो मनुष्य एक परमात्मा की महिमा ही (नित्य) उचारता है, पढ़ता है और सुनता है और धरती के आसरे प्रभु की टेक पकड़ता है वह गंभीर स्वभाव ग्रहण करता है वह (मनुष्य जीवन के) फर्ज को (पहचानता है)। अगर मनुष्य (गुरु की शरण में रह के) अपने मन को उस आत्मिक अवस्था में पहुँचा ले जहाँ माया के तीनों ही गुण जोर नहीं डाल सकते, तो (सहज ही) जत-सत और संजम उसके हृदय में लीन रहते हैं।7। सदा-स्थिर प्रभु में टिक के पवित्र हुए मनुष्य के मन को विकारों की मैल नहीं चिपकती। गुरु के शब्द की इनायत से उसकी भटकना दूर हो जाती है उसका (दुनियावी) डर-सहम समाप्त हो जाता है। नानक (भी) उस सदा-स्थिर हस्ती वाले प्रभु (के दर से नाम की दाति) मांगता है जिस जैसा और कोई नहीं है जिसकी (सुंदर) सूरत और जिसका अस्तित्व आदि से ही चला आ रहा है।8।1।

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