अंग : 956
सलोक मः ३ ॥ आसा अंदरि सभु को कोइ निरासा होइ ॥ नानक जो मरि जीविआ सहिला आइआ सोइ ॥१॥ मः ३ ॥ ना किछु आसा हथि है केउ निरासा होइ ॥ किआ करे एह बपुड़ी जां भुोलाए सोइ ॥२॥ पउड़ी ॥ ध्रिगु जीवणु संसार सचे नाम बिनु ॥ प्रभु दाता दातार निहचलु एहु धनु ॥ सासि सासि आराधे निरमलु सोइ जनु ॥ अंतरजामी अगमु रसना एकु भनु ॥ रवि रहिआ सरबति नानकु बलि जाई ॥२०॥
अर्थ: हरेक जीव आशाओं में (फसा हुआ) है (भाव, नित्य-नई आशाएं तमन्नाएं बनाता रहता है), कोई विरला मनुष्य है जो आशाओं से बचा रहता है। हे नानक! जो मनुष्य आशाओं से हट के (प्रभु के स्मरण में) जीवन गुजारता है उसका आना सफल है।1। ‘आसा’ के हाथ में कोई ताकत नहीं (कि जीवों को फसा सके; सो, अपने उद्यम से भी) मनुष्य ‘आशा’ से नहीं बच सकता। ये बेचारी ‘आसा’ क्या कर सकती है? भुलाता तो वह प्रभु खुद है।2। सदा कायम रहने वाले प्रभु का नाम स्मरण के बिना जगत में जीना धिक्कारयोग्य है। प्रभु ही (सबका) दाता है सब दातें देने वाला है; सो, उसका ये (नाम-) धन ही (ऐसा है जो) कभी नाश होने वाला नहीं। वही मनुष्य पवित्र (जीवन वाला) है जो (प्रभु को) हरेक सांस के साथ याद करता है। (हे भाई!) जीभ से उस एक प्रभु को याद कर जो सबके दिल की जानता है और जो (जीवों की) पहुँच से परे है। नानक उस प्रभु से सदके है जो सभी में व्यापक है।20।