अंग : 737
सूही महला ५ ॥ धनु सोहागनि जो प्रभू पछानै ॥ मानै हुकमु तजै अभिमानै ॥ प्रिअ सिउ राती रलीआ मानै ॥१॥ सुनि सखीए प्रभ मिलण नीसानी ॥ मनु तनु अरपि तजि लाज लोकानी ॥१॥ रहाउ ॥ सखी सहेली कउ समझावै ॥ सोई कमावै जो प्रभ भावै ॥ सा सोहागणि अंकि समावै ॥२॥ गरबि गहेली महलु न पावै ॥ फिरि पछुतावै जब रैणि बिहावै ॥ करमहीणि मनमुखि दुखु पावै ॥३॥ बिनउ करी जे जाणा दूरि ॥ प्रभु अबिनासी रहिआ भरपूरि ॥ जनु नानकु गावै देखि हदूरि ॥४॥३॥
अर्थ: हे सहेली! वह जीव-स्त्री प्रशंसा योग्य है, सुहाग-भाग्य वाली है, जो प्रभु-पति के साथ साँझ बनाती है, जो अहंकार छोड़ कर के प्रभु-पति का हुकम मानती रहती है। वह जीव-स्त्री प्रभु-पति (के प्यार) में रंगी हुई उस के मिलाप का आनंद मनाती रहती है॥1॥ हे सखी! परमात्मा मिल्न्बे की निशानी (मुझसे) सुन ले। (वह निशानी वह तरीका है कि ) लाज की खातिर छोड़ कर अपना मन अपना सरीर परमात्मा के हवाले कर दे॥1॥रहाउ॥ (एक सत्संगी) सहेली (दूसरी सत्संगी) सहेली को (प्रभु-पति के मिलाप के तरीके के बारे में) समझाती है (और कहती है कि) जो जीव-स्त्री वही कुछ करती है जो प्रभु-पति को पसंद आ जाता है, वह सोहाग-भाग वाली जीव-स्त्री उस प्रभु के चरणों में लीन रहती है।2। (पर) जो जीव-स्त्री अहंकार में फसी रहती है, वह प्रभु-पति के चरणों में जगह प्राप्त नहीं कर सकती। जब (जिंदगी की) रात बीत जाती है, तब वह पछताती है। अपने मन के पीछे चलने वाली वह दुर्भाग्यपूर्ण जीव-स्त्री सदा दुख पाती रहती है।3। हे भाई! (लोक-सम्मान की खातिर मैं तब ही परमात्मा के दर पर) अरदास करूँ, अगर मैं उसको कहीं दूर बसता समझूँ। वह नाश-रहित परमात्मा तो हर जगह व्यापक है। दास नानक (तो उसको अपने) अंग-संग (बसता) देख के उसकी महिमा करता है।4।3।