अंग : 778
रागु सूही छंत महला ५ घरु २ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ गोबिंद गुण गावण लागे ॥ हरि रंगि अनदिनु जागे ॥ हरि रंगि जागे पाप भागे मिले संत पिआरिआ ॥ गुर चरण लागे भरम भागे काज सगल सवारिआ ॥ सुणि स्रवण बाणी सहजि जाणी हरि नामु जपि वडभागै ॥ बिनवंति नानक सरणि सुआमी जीउ पिंडु प्रभ आगै ॥१॥ अनहत सबदु सुहावा ॥ सचु मंगलु हरि जसु गावा ॥ गुण गाइ हरि हरि दूख नासे रहसु उपजै मनि घणा ॥ मनु तंनु निरमलु देखि दरसनु नामु प्रभ का मुखि भणा ॥ होइ रेण साधू प्रभ अराधू आपणे प्रभ भावा ॥ बिनवंति नानक दइआ धारहु सदा हरि गुण गावा ॥२॥
अर्थ: राग सूही , घर 2 में गुरु अर्जनदेव जी की बाणी ‘छंत। अकाल पुरख एक और सतगुरु की द्वारा मिलता है। वह मनुख परमात्मा के गुण गाने लग जाते हैं, परमात्मा के प्रेम-रंग में (टिक कर) वह हर समय (माया के हमलों से) सुचेत रहते हैं, जो मनुख प्यारे गुरु को मिल जाते हैं। (जैसे जैसे) वह प्यारे के रंग में (टिक कर) सुचेत होते हैं, (उन के अंदर से) सारे पाप भाग जाते हैं। जो मनुख गुरु के चरण लगते हैं, उनकी भटकन दूर हो जाती है, उनके सारे काम भी संवर जाते हैं। जो मनुख बड़ी किस्मत से सतगुरु की बाणी कानो से सुन कर परमात्मा का नाम जप कर आत्मिक अदोलता में (टिक कर परमात्मा से) गहरी साँझ बना बना लेता है-वह मनुख मालिक-प्रभु की शरण आ कर अपनी जान अपना सरीर (सब कुछ)परमात्मा के आगे (रख देता है)॥2॥ हे भाई! जिन मनुष्यों ने सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह के गीत हर वक्त गाए, उनको सिफत सालाह की बाणी हर वक्त एक-रस (कानों को) सुखद लगने लग जाती है। परमात्मा के गुण गा-गा के (उनके सारे) दुख नाश हो जाते हैं, (उनके) मन में बहुत आनंद पैदा हो जाता है। हे भाई! जो मनुष्य (अपने) मुँह से परमात्मा का नाम उचारते रहते हैं, (उनका) दर्शन करके मन पवित्र हो जाता है। गुरू की चरण-धूल हो के जो मनुष्य परमात्मा की आराधना करते रहते हैं, वह मनुष्य अपने प्रभू को प्यारे लगने लग जाते हैं। नानक विनती करता है– हे प्रभू! (मेरे पर) मेहर कर, मैं (भी) सदा तेरे गुण गाता रहॅूँ।2।