अमृत ​​वेले का हुक्मनामा – 24 जुलाई 2026

अंग : 555
सलोक मः ३ ॥ हउमै विचि जगतु मुआ मरदो मरदा जाइ ॥ जिचरु विचि दमु है तिचरु न चेतई कि करेगु अगै जाइ ॥ गिआनी होइ सु चेतंनु होइ अगिआनी अंधु कमाइ ॥ नानक एथै कमावै सो मिलै अगै पाए जाइ ॥१॥ मः ३ ॥ धुरि खसमै का हुकमु पइआ विणु सतिगुर चेतिआ न जाइ ॥ सतिगुरि मिलिऐ अंतरि रवि रहिआ सदा रहिआ लिव लाइ ॥ दमि दमि सदा समालदा दमु न बिरथा जाइ ॥ जनम मरन का भउ गइआ जीवन पदवी पाइ ॥ नानक इहु मरतबा तिस नो देइ जिस नो किरपा करे रजाइ ॥२॥ पउड़ी ॥ आपे दानां बीनिआ आपे परधानां ॥ आपे रूप दिखालदा आपे लाइ धिआनां ॥ आपे मोनी वरतदा आपे कथै गिआनां ॥ कउड़ा किसै न लगई सभना ही भाना ॥ उसतति बरनि न सकीऐ सद सद कुरबाना ॥१९॥
अर्थ: संसार अहंकार में मरा पड़ा है, नित्य (नीचे ही नीचे) गरकता ही है। जब तक शरीर में दम है, प्रभू को याद नहीं करता; (संसारी जीव अहंकार में रह के कभी नहीं सोचता कि) आगे दरगाह में जा के क्या हाल होगा। जो मनुष्य दयावान होता है, वह सचेत रहता है और अज्ञानी मनुष्य अज्ञानता का ही काम करता है। हे नानक! मानस जनम में जो कुछ मनुष्य कमाई करता है, वही मिलती है, परलोक में जा के भी वही मिलती है।1। धुर से ही प्रभू का हुकम चला आ रहा है कि सतिगुरू के बिना प्रभू का सिमरन नहीं किया जा सकता; सतिगुरू के मिलने पर प्रभू मनुष्य के हृदय में बस जाता है और मनुष्य सदा उसमें बिरती जोड़े रखता है; श्वास-श्वास उसको चेता करता है, एक भी श्वास व्यर्थ नहीं जाता; (इस तरह उसका) पैदा होने मरने का डर खत्म हो जाता है और उसको (असल मानस) जीवन का दर्जा मिल जाता है। हे नानक! प्रभू ये मर्तबा (भाव, जीवन पदवी) उस मनुष्य को देता है जिस पर अपनी रजा में मेहर करता है।2। प्रभू खुद ही समझदार है, खुद ही चतुर है और खुद ही नायक है, खुद ही (अपने) रूप दिखलाता है और खुद ही बिरती जोड़ता है, खुद ही मौनधारी है और खुद ही ज्ञान की बातें करने वाला है, किसी को कड़वा नहीं लगता (किसी को किसी रंग में, किसी को किसी रंग में) सभी को प्यारा लगता है। ऐसे प्रभू से मैं सदके हूँ, उसके गुण बयान नहीं किए जा सकते।19।

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