अंग : 626
सोरठि महला ५ ॥ तापु गवाइआ गुरि पूरे ॥ वाजे अनहद तूरे ॥ सरब कलिआण प्रभि कीने ॥ करि किरपा आपि दीने ॥१॥ बेदन सतिगुरि आपि गवाई ॥ सिख संत सभि सरसे होए हरि हरि नामु धिआई ॥ रहाउ ॥ जो मंगहि सो लेवहि ॥ प्रभ अपणिआ संता देवहि ॥ हरि गोविदु प्रभि राखिआ ॥ जन नानक साचु सुभाखिआ ॥२॥६॥७०॥
अर्थ: पूरे गुरू ने (हरि-नाम की दवाई दे कर जिस मनुष्य के अंदर से) ताप दूर कर दिया, (उस के अंदर आत्मिक आनंद के, मानों) एक-रस वाजे वजने लग गए। प्रभू ने सभी सुख आनंद बख़्श़ दिए। उस ने कृपा कर के आप ही यह सुख बख़्श़ दिए ॥१॥ हे भाई! (जिस ने भी परमात्मा का नाम सिमरिया) गुरू ने आप (उस की प्रत्येक) तकलीफ़ दूर कर दी। सारे सिक्ख संत परमात्मा का नाम सिमर सिमर कर आनंद-भरपूर हुए रहते हैं ॥ रहाउ ॥ हे प्रभू! (तेरे दर से तेरे संत जन) जो कुछ माँगते हैं, वह हासिल कर लेते हैं। तूँ अपने संतों को (आप सब कुछ) देता हैं। (हे भाई! बालक) हरि गोबिंद को (भी) प्रभू ने (आप) बचाया है (किसी देवी आदि ने नहीं) हे दास नानक जी! (कहो-) मैं तो सदा-थिर रहने वाले प्रभू का नाम ही उचारता हूँ ॥२॥६॥७०॥