अंग : 134
बारह माहा मांझ महला ५ घरु ४ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥*
*आसाड़ु तपंदा तिसु लगै हरि नाहु न जिंना पासि ॥ जगजीवन पुरखु तिआगि कै माणस संदी आस ॥ दुयै भाइ विगुचीऐ गलि पईसु जम की फास ॥ जेहा बीजै सो लुणै मथै जो लिखिआसु ॥ रैणि विहाणी पछुताणी उठि चली गई निरास ॥ जिन कौ साधू भेटीऐ सो दरगह होइ खलासु ॥ करि किरपा प्रभ आपणी तेरे दरसन होइ पिआस ॥ प्रभ तुधु बिनु दूजा को नही नानक की अरदासि ॥ आसाड़ु सुहंदा तिसु लगै जिसु मनि हरि चरण निवास ॥५॥
अर्थ: आसाड़ का महीना उस जीव को तपता प्रतीत होता है (वे लोग आसाढ़ के महीने की तरह तपते कलपते रहते हैं) जिनके हृदय में प्रभू पति नहीं बसता। जो जगत के सहारे परमात्मा (का आसरा) छोड़ के लोगों से आस बनाए रखते हैं।
(प्रभू के बिना) किसी और के आसरे रहने से खुआर ही होते हैं (जो भी कोई और सहारे ताकता है) उसके गले में जम की फाही पड़ती है (उसका जीवन सदा सहम में व्यतीत होता है)। (कुदरति का नियम ही ऐसा है कि) मनुष्य जैसा बीज बीजता है। (किए कर्मों अनुसार) जो लेख उसके माथे पर लिखा जाता है, वैसा ही फल वह प्राप्त करता है। (जगजीवन पुरख को विसारने वाली जीव स्त्री की) सारी जिंदगी पछतावों में गुजरती है, वह जगत से टूटे हुए दिल के साथ ही चल पड़ती है।
जिन लोगों को गुरू मिल जाता है, वह परमात्मा की हजूरी में सुर्खरू होते हैं (आदर मान पाते हैं)।
हे प्रभू! (तेरे आगे) नानक की विनती है– अपनी मेहर कर, (मेरे मन में) तेरे दर्शन की तमन्ना बनी रहे, (क्योंकि) हे प्रभू! तेरे बिना मेरा और कोई आसरा उम्मीद नहीं है।
जिस मनुष्य के मन में प्रभू के चरणों का निवास बना रहे, उसे (तपता) आसाढ़ (भी) सुहावना प्रतीत होता है (उसको दुनिया के दुख कलेश भी दुखी नहीं कर सकते)।5।