अंग : 688
धनासरी महला १ ॥ जीवा तेरै नाइ मनि आनंदु है जीउ ॥ साचो साचा नाउ गुण गोविंदु है जीउ ॥ गुर गिआनु अपारा सिरजणहारा जिनि सिरजी तिनि गोई ॥ परवाणा आइआ हुकमि पठाइआ फेरि न सकै कोई ॥ आपे करि वेखै सिरि सिरि लेखै आपे सुरति बुझाई ॥ नानक साहिबु अगम अगोचरु जीवा सची नाई ॥१॥ तुम सरि अवरु न कोइ आइआ जाइसी जीउ ॥ हुकमी होइ निबेड़ु भरमु चुकाइसी जीउ ॥ गुरु भरमु चुकाए अकथु कहाए सच महि साचु समाणा ॥ आपि उपाए आपि समाए हुकमी हुकमु पछाणा ॥ सची वडिआई गुर ते पाई तू मनि अंति सखाई ॥ नानक साहिबु अवरु न दूजा नामि तेरै वडिआई ॥२॥ तू सचा सिरजणहारु अलख सिरंदिआ जीउ ॥ एकु साहिबु दुइ राह वाद वधंदिआ जीउ ॥ दुइ राह चलाए हुकमि सबाए जनमि मुआ संसारा ॥ नाम बिना नाही को बेली बिखु लादी सिरि भारा ॥ हुकमी आइआ हुकमु न बूझै हुकमि सवारणहारा ॥ नानक साहिबु सबदि सिञापै साचा सिरजणहारा ॥३॥ भगत सोहहि दरवारि सबदि सुहाइआ जीउ ॥ बोलहि अम्रित बाणि रसन रसाइआ जीउ ॥ रसन रसाए नामि तिसाए गुर कै सबदि विकाणे ॥ पारसि परसिऐ पारसु होए जा तेरै मनि भाणे ॥ अमरा पदु पाइआ आपु गवाइआ विरला गिआन वीचारी ॥ नानक भगत सोहनि दरि साचै साचे के वापारी ॥४॥ भूख पिआसो आथि किउ दरि जाइसा जीउ ॥ सतिगुर पूछउ जाइ नामु धिआइसा जीउ ॥ सचु नामु धिआई साचु चवाई गुरमुखि साचु पछाणा ॥ दीना नाथु दइआलु निरंजनु अनदिनु नामु वखाणा ॥ करणी कार धुरहु फुरमाई आपि मुआ मनु मारी ॥ नानक नामु महा रसु मीठा त्रिसना नामि निवारी ॥५॥२॥
अर्थ: हे प्रभू जी! तेरे नाम में (जुड़ कर) मेरे अंदर आतमिक जीवन पैदा होता है, मेरे मन में ख़ुश़ी पैदा होती है। हे भाई! परमात्मा का नाम सदा-थिर रहने वाला है, प्रभू गुणों (का ख़ज़ाना) है और धरती के जीवों के दिल की जानने वाला है। गुरू का बख़्श़ा ज्ञान बताता है कि सिरजनहार प्रभू बेअंत है, जिस ने यह सृष्टि पैदा की है, वही इस को नाश करता है। जब उस के हुक्म में भेजा हुआ (मौत का) निमंत्रण आता है तो कोई जीव (उस निमंत्रण को) मोड़ नहीं सकता। परमात्मा आप ही (जीवों को) पैदा कर के आप ही संभाल करता है, आप ही प्रत्येक जीव के सिर पर (उस के किए कार्य अनुसार) लेख लिखता है, आप ही (जीव को सही जीवन-मार्ग की) सूझ बख़्श़ता है। मालिक-प्रभू अपहुँच है, जीवों के ज्ञान-इंद्रियों की उस तक पहुँच नहीं हो सकती। हे नानक जी! (उस के द्वार पर अरदास करो, और कहो – हे प्रभू!) तेरी सदा कायम रहने वाली सिफ़त-सलाह कर के मेरे अंदर आतमिक जीवन पैदा होता है (मुझे अपनी सिफ़त-सलाह बख़्श़) ॥१॥ हे प्रभू जी! तेरे बराबर का अन्य कोई नहीं है, (अन्य जो भी जगत में) आया है, (वह यहाँ से आखिर) चला जाएगा (तूँ ही सदा कायम रहने वाला हैं)। जिस मनुष्य की भटकना (गुरू) दूर करता है, प्रभू के हुक्म अनुसार उस के जन्म मरण के चक्र खत्म हो जाते हैं। गुरू जिस की भटकना दूर करता है, उस से उस परमात्मा की सिफ़त-सलाह करवाता है जिस के गुण बताए नहीं जा सकते। वह मनुष्य सदा-थिर प्रभू (की याद) में रहता है, सदा-थिर प्रभू (उस के हृदय में) प्रगट हो जाता है। वह मनुष्य रज़ा के मालिक-प्रभू का हुक्म पहचान लेता है (और समझ लेता है कि) प्रभू आप ही पैदा करता है और आप ही (अपने में) लीन कर लेता है। हे प्रभू! जिस मनुष्य ने तेरी सिफ़त- सलाह (की दात) गुरू से प्राप्त कर लई है, तूँ उस के मन में आ वसता हैं और अंत समय भी उस का मित्र बनता हैं। हे नानक जी! मालिक-प्रभू सदा कायम रहने वाला है, उस जैसा अन्य कोई नहीं। (उस के द्वार पर अरदास करो और कहो-) हे प्रभू! तेरे नाम से जुड़ने से (लोग परलोग में) आदर मिलता है ॥२॥ हे अदृष्ट रचनहार! तूँ सदा-थिर रहने वाला हैं और सब जीवों को पैदा करने वाला हैं। एक सिरजणहार ही (सारे जगत का) मालिक है, उस ने (जन्म और मरण) के दो रास्ते चलाएं हैं। (उसी की रज़ा अनुसार जगत में) झगड़ों की वृद्धि होती है। दोनों रास्ते प्रभू ने ही चलाएं हैं, सभी जीव उसी के हुक्म में हैं, (उसी के हुक्म अनुसार) जगत जमता और मरता रहता है। (जीव नाम को भुला कर माया के मोह का) ज़हर-रूप बोझ अपने सिर पर इक्कठा करी जाता है, (और यह नहीं समझता कि) परमात्मा के नाम के बिना अन्य कोई भी साथी-मित्र नहीं बन सकता। जीव (परमात्मा के) हुक्म अनुसार (जगत में) आता है, (पर माया के मोह में फंस कर उस) हुक्म को समझता नहीं। प्रभू आप ही जीव को अपने हुक्म अनुसार (सही रास्ते पा कर) संवारने के समर्थ है। हे नानक जी! गुरू के श़ब्द में जुड़ने से यह पहचान आती है कि जगत का मालिक सदा-थिर रहने वाला है और सब का पैदा करने वाला है ॥३॥ हे भाई! परमात्मा की भगती करने वाले मनुष्य परमात्मा की हज़ूरी में शोभा प्राप्त करते हैं, क्योंकि गुरू के श़ब्द की बरकत से वह अपने जीवन को सुंदर बना लेते हैं। वह मनुष्य आतमिक जीवन देने वाली बाणी अपनी जीभ से उचारते रहते हैं, जीव को उस बाणी से एक-रस कर लेते हैं। भगत-जन प्रभू के नाम से जीभ को रसा लेते हैं, नाम में जुड़ कर (नाम के लिए उनकी) प्यास बढ़ती है, गुरू के श़ब्द द्वारा वह प्रभू-नाम से सदके होते हैं (नाम की खातिर अन्य सभी शारीरिक सुख कुर्बान करते हैं। हे प्रभू! जब (भगत जन) तेरे मन को प्यारे लगते हैं, तब वह गुरू-पारस से स्पर्श कर के आप भी पारस हो जाते हैं (अन्यों को पवित्र जीवन देने योग्य हो जाते हैं)। जो मनुष्य आपा-भाव दूर करते हैं उनको वह आतमिक दर्जा मिल जाता है जहाँ आतमिक मौत असर नहीं कर सकती। परन्तु इस तरह कोई विरला ही गुरू के दिए ज्ञान की विचार करने वाला मनुष्य होता है। हे नानक जी! परमात्मा की भगती करने वाले मनुष्य सदा-थिर प्रभू के द्वार पर शोभा प्राप्त करते हैं, वह (अपने सारे जीवन में) सदा-थिर प्रभू के नाम का ही व्यपार करते हैं ॥४॥ जब तक मैं माया के लिए भुखा प्यासा रहता हूँ, तब तक मैं किसी भी तरह प्रभू के द्वार पर पहुँच नहीं सकता। (माया की तृष्णा दूर करने का इलाज) मैं जा कर अपने गुरू से पुछता हूँ (और उन की शिक्षा के अनुसार) मैं परमात्मा का नाम सिमरता हूँ (नाम ही तृष्णा दूर करता है)। गुरू की श़रण पड़ कर मैं सदा-थिर नाम सिमरता हूँ, सदा-थिर प्रभू (की सिफ़त-सलाह) उचारता हूँ, और सदा-थिर प्रभू के साथ सांझ पाता हूँ। मैं हर रोज़ उस प्रभू का नाम मुख से लेता हूँ जो दीनों का सहारा है जो दया का स्रोत है और जिस पर माया का असर नहीं पड़ सकता। परमात्मा ने जिस मनुष्य को अपनी हज़ूरी से ही नाम सिमरन की करने-योग्य कार्य करने का हुक्म दे दिया, वह मनुष्य अपने मन को (माया की तरफ़ से) मार कर तृष्णा के असर से बच जाता है। हे नानक जी! उस मनुष्य को प्रभू का नाम ही मीठा और अन्य सभी रसों से श्रेष्ठ लगता है, उस ने नाम सिमरन की बरकत से माया की तृष्णा (अपने अंदर से) दूर कर ली होती है ॥५॥२॥



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अंग : 719-720
बैराड़ी महला ४ ॥
हरि जनु राम नाम गुन गावै ॥ जे कोई निंद करे हरि जन की अपुना गुनु न गवावै ॥१॥ रहाउ ॥ जो किछु करे सु आपे सुआमी हरि आपे कार कमावै ॥ हरि आपे ही मति देवै सुआमी हरि आपे बोलि बुलावै ॥१॥ हरि आपे पंच ततु बिसथारा विचि धातू पंच आपि पावै ॥ जन नानक सतिगुरु मेले आपे हरि आपे झगरु चुकावै ॥२॥३॥

अर्थ: परमात्मा का भगत हर समय परमात्मा के गुण गाता रहता है। अगर कोई मनुष्य उस भगत की निंदा (भी) करता है तो वह भगत अपना स्वभाव नहीं छोड़ता ॥१॥ रहाउ ॥ (भगत अपनी निंदा सुन के भी अपना स्वभाव नहीं छोड़ता, क्योंकि वह जनता है कि) जो कुछ कर रहा है मालिक प्रभु आप ही (जीवों में बैठ के) कर रहा है, वह आप ही हरेक काम कर रहा है। मालिक प्रभु आप ही (हरेक जीव को) समझ देता है, आप ही (हरेक जीव में बैठा) बोल रहा है, आप ही (हरेक जीव को) बोलने की प्रेरणा कर रहा है ॥१॥ (भगत जनता है कि) परमात्मा ने आप ही (अपने आप से) पांच तत्वों का जगत-बिखेरा हुआ है, आप ही इन पांच तत्वों में पांच विषय भरे हुए हैं। हे नानक जी! परमात्मा आप ही अपने सेवक को मिलाता है, और, आप ही (उस के अंदर से हरेक प्रकार की) खिचोतान ख़त्म करता है ॥२॥३॥



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ਅੰਗ : 719-720
ਬੈਰਾੜੀ ਮਹਲਾ ੪ ॥
ਹਰਿ ਜਨੁ ਰਾਮ ਨਾਮ ਗੁਨ ਗਾਵੈ ॥ ਜੇ ਕੋਈ ਨਿੰਦ ਕਰੇ ਹਰਿ ਜਨ ਕੀ ਅਪੁਨਾ ਗੁਨੁ ਨ ਗਵਾਵੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥ ਜੋ ਕਿਛੁ ਕਰੇ ਸੁ ਆਪੇ ਸੁਆਮੀ ਹਰਿ ਆਪੇ ਕਾਰ ਕਮਾਵੈ ॥ ਹਰਿ ਆਪੇ ਹੀ ਮਤਿ ਦੇਵੈ ਸੁਆਮੀ ਹਰਿ ਆਪੇ ਬੋਲਿ ਬੁਲਾਵੈ ॥੧॥ ਹਰਿ ਆਪੇ ਪੰਚ ਤਤੁ ਬਿਸਥਾਰਾ ਵਿਚਿ ਧਾਤੂ ਪੰਚ ਆਪਿ ਪਾਵੈ ॥ ਜਨ ਨਾਨਕ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੇਲੇ ਆਪੇ ਹਰਿ ਆਪੇ ਝਗਰੁ ਚੁਕਾਵੈ ॥੨॥੩॥

ਅਰਥ: ਬੈਰਾੜੀ ਮਹਲਾ ੪ ॥
ਹੇ ਭਾਈ ! ਪਰਮਾਤਮਾ ਦਾ ਭਗਤ ਸਦਾ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਗੁਣ ਗਾਂਦਾ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ । ਜੇ ਕੋਈ ਮਨੁੱਖ ਉਸ ਭਗਤ ਦੀ ਨਿੰਦਾ (ਭੀ) ਕਰਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਉਹ ਭਗਤ ਆਪਣਾ ਸੁਭਾਉ ਨਹੀਂ ਤਿਆਗਦਾ ।੧। ਰਹਾਉ। ਹੇ ਭਾਈ ! (ਭਗਤ ਆਪਣੀ ਨਿੰਦਾ ਸੁਣ ਕੇ ਭੀ ਆਪਣਾ ਸੁਭਾਉ ਨਹੀਂ ਛੱਡਦਾ, ਕਿਉਂਕਿ ਉਹ ਜਾਣਦਾ ਹੈ ਕਿ) ਜੋ ਕੁਝ ਕਰ ਰਿਹਾ ਹੈ ਮਾਲਕ-ਪ੍ਰਭੂ ਆਪ ਹੀ (ਜੀਵਾਂ ਵਿਚ ਬੈਠ ਕੇ) ਕਰ ਰਿਹਾ ਹੈ, ਉਹ ਆਪ ਹੀ ਹਰੇਕ ਕਾਰ ਕਰ ਰਿਹਾ ਹੈ । ਮਾਲਕ-ਪ੍ਰਭੂ ਆਪ ਹੀ (ਹਰੇਕ ਜੀਵ ਨੂੰ) ਮਤਿ ਦੇਂਦਾ ਹੈ, ਆਪ ਹੀ (ਹਰੇਕ ਵਿਚ ਬੈਠਾ) ਬੋਲ ਰਿਹਾ ਹੈ, ਆਪ ਹੀ (ਹਰੇਕ ਜੀਵ ਨੂੰ) ਬੋਲਣ ਦੀ ਪ੍ਰੇਰਨਾ ਕਰ ਰਿਹਾ ਹੈ ।੧। ਹੇ ਭਾਈ ! (ਭਗਤ ਜਾਣਦਾ ਹੈ ਕਿ) ਪਰਮਾਤਮਾ ਨੇ ਆਪ ਹੀ (ਆਪਣੇ ਆਪ ਤੋਂ) ਪੰਜ ਤੱਤਾਂ ਦਾ ਜਗਤ-ਖਿਲਾਰਾ ਖਿਲਾਰਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ, ਆਪ ਹੀ ਇਹਨਾਂ ਤੱਤਾਂ ਵਿਚ ਪੰਜ ਵਿਸ਼ੇ ਭਰੇ ਹੋਏ ਹਨ । ਹੇ ਨਾਨਕ ! (ਆਖ—ਹੇ ਭਾਈ) ਪਰਮਾਤਮਾ ਆਪ ਹੀ ਆਪਣੇ ਸੇਵਕ ਨੂੰ ਮਿਲਾਂਦਾ ਹੈ, ਤੇ, ਆਪ ਹੀ (ਉਸ ਦੇ ਅੰਦਰੋਂ ਹਰੇਕ ਕਿਸਮ ਦੀ) ਖਿੱਚੋਤਾਣ ਮੁਕਾਂਦਾ ਹੈ ।੨।੩।



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Dalbara Singh : waheguru ji🙏

ਅੰਗ : 721
ਤਿਲੰਗ ਮਹਲਾ ੧ ਘਰੁ ੩ ੴਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥ ਇਹੁ ਤਨੁ ਮਾਇਆ ਪਾਹਿਆ ਪਿਆਰੇ ਲੀਤੜਾ ਲਬਿ ਰੰਗਾਏ ॥ ਮੇਰੈ ਕੰਤ ਨ ਭਾਵੈ ਚੋਲੜਾ ਪਿਆਰੇ ਕਿਉ ਧਨ ਸੇਜੈ ਜਾਏ ॥੧॥ ਹੰਉ ਕੁਰਬਾਨੈ ਜਾਉ ਮਿਹਰਵਾਨਾ ਹੰਉ ਕੁਰਬਾਨੈ ਜਾਉ ॥ ਹੰਉ ਕੁਰਬਾਨੈ ਜਾਉ ਤਿਨਾ ਕੈ ਲੈਨਿ ਜੋ ਤੇਰਾ ਨਾਉ ॥ ਲੈਨਿ ਜੋ ਤੇਰਾ ਨਾਉ ਤਿਨਾ ਕੈ ਹੰਉ ਸਦ ਕੁਰਬਾਨੈ ਜਾਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥ ਕਾਇਆ ਰੰਙਿਣ ਜੇ ਥੀਅੈ ਪਿਆਰੇ ਪਾਈਅੈ ਨਾਉ ਮਜੀਠ ॥ ਰੰਙਣ ਵਾਲਾ ਜੇ ਰੰਙੈ ਸਾਹਿਬੁ ਅੈਸਾ ਰੰਗੁ ਨ ਡੀਠ ॥੨॥ ਜਿਨ ਕੇ ਚੋਲੇ ਰਤੜੇ ਪਿਆਰੇ ਕੰਤੁ ਤਿਨਾ ਕੈ ਪਾਸਿ ॥ ਧੂੜਿ ਤਿਨਾ ਕੀ ਜੇ ਮਿਲੈ ਜੀ ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਕੀ ਅਰਦਾਸਿ ॥੩॥ ਆਪੇ ਸਾਜੇ ਆਪੇ ਰੰਗੇ ਆਪੇ ਨਦਰਿ ਕਰੇਇ ॥ ਨਾਨਕ ਕਾਮਿਣ ਕੰਤੈ ਭਾਵੈ ਆਪੇ ਹੀ ਰਾਵੇਇ ॥੪॥੧॥੩॥
ਅਰਥ: ਰਾਗ ਤਿਲੰਗ, ਘਰ ੩ ਵਿੱਚ ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ਜੀ ਦੀ ਬਾਣੀ। ਅਕਾਲ ਪੁਰਖ ਇੱਕ ਹੈ ਅਤੇ ਸਤਿਗੁਰੂ ਦੀ ਕਿਰਪਾ ਨਾਲ ਮਿਲਦਾ ਹੈ। ਜਿਸ ਜੀਵ-ਇਸਤ੍ਰੀ ਦੇ ਇਸ ਸਰੀਰ ਨੂੰ ਮਾਇਆ (ਦੇ ਮੋਹ) ਦੀ ਪਾਹ ਲੱਗੀ ਹੋਵੇ, ਤੇ ਫਿਰ ਉਸ ਨੇ ਇਸ ਨੂੰ ਲੱਬ ਨਾਲ ਰੰਗਾ ਲਿਆ ਹੋਵੇ, ਉਹ ਜੀਵ-ਇਸਤ੍ਰੀ ਖਸਮ-ਪ੍ਰਭੂ ਦੇ ਚਰਨਾਂ ਵਿਚ ਨਹੀਂ ਪਹੁੰਚ ਸਕਦੀ, ਕਿਉਂਕਿ (ਜਿੰਦ ਦਾ) ਇਹ ਚੋਲਾ (ਇਹ ਸਰੀਰ, ਇਹ ਜੀਵਨ) ਖਸਮ-ਪ੍ਰਭੂ ਨੂੰ ਪਸੰਦ ਨਹੀਂ ਆਉਂਦਾ ॥੧॥ ਹੇ ਮਿਹਰਬਾਨ ਪ੍ਰਭੂ! ਮੈਂ ਕੁਰਬਾਨ ਜਾਂਦਾ ਹਾਂ ਮੈਂ ਸਦਕੇ ਜਾਂਦਾ ਹਾਂ, ਮੈਂ ਵਰਨੇ ਜਾਂਦਾ ਹਾਂ ਉਹਨਾਂ ਤੋਂ ਜੋ ਤੇਰਾ ਨਾਮ ਸਿਮਰਦੇ ਹਨ। ਜੋ ਬੰਦੇ ਤੇਰਾ ਨਾਮ ਲੈਂਦੇ ਹਨ, ਮੈਂ ਉਹਨਾਂ ਤੋਂ ਸਦਾ ਕੁਰਬਾਨ ਜਾਂਦਾ ਹਾਂ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥ (ਪਰ, ਹਾਂ!) ਜੇ ਇਹ ਸਰੀਰ (ਨੀਲਾਰੀ ਦੀ) ਮੱਟੀ ਬਣ ਜਾਏ, ਤੇ ਹੇ ਸੱਜਣ! ਜੇ ਇਸ ਵਿਚ ਮਜੀਠ ਵਰਗੇ ਪੱਕੇ ਰੰਗ ਵਾਲਾ ਪ੍ਰਭੂ ਦਾ ਨਾਮ-ਰੰਗ ਪਾਇਆ ਜਾਏ, ਫਿਰ ਮਾਲਿਕ-ਪ੍ਰਭੂ ਆਪ ਨੀਲਾਰੀ (ਬਣ ਕੇ ਜੀਵ-ਇਸਤ੍ਰੀ ਦੇ ਮਨ ਨੂੰ) ਰੰਗ (ਦਾ ਡੋਬਾ) ਦੇਵੇ, ਤਾਂ ਅਜੇਹਾ ਰੰਗ ਚੜ੍ਹਦਾ ਹੈ ਜੋ ਕਦੇ ਪਹਿਲਾਂ ਵੇਖਿਆ ਨਾਹ ਹੋਵੇ ॥੨॥ ਹੇ ਪਿਆਰੇ (ਸੱਜਣ!) ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਜੀਵ-ਇਸਤ੍ਰੀਆਂ ਦੇ (ਸਰੀਰ-) ਚੋਲੇ (ਜੀਵਨ ਨਾਮ-ਰੰਗ ਨਾਲ) ਰੰਗੇ ਗਏ ਹਨ, ਖਸਮ-ਪ੍ਰਭੂ (ਸਦਾ) ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਕੋਲ (ਵੱਸਦਾ) ਹੈ। ਹੇ ਸੱਜਣ! ਨਾਨਕ ਵਲੋਂ ਉਹਨਾਂ ਪਾਸ ਬੇਨਤੀ ਕਰ, ਭਲਾ ਕਿਤੇ ਨਾਨਕ ਨੂੰ ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਚਰਨਾਂ ਦੀ ਧੂੜ ਮਿਲ ਜਾਏ ॥੩॥ ਜਿਸ ਜੀਵ-ਇਸਤ੍ਰੀ ਉਤੇ ਪ੍ਰਭੂ ਆਪ ਮਿਹਰ ਦੀ ਨਜ਼ਰ ਕਰਦਾ ਹੈ ਉਸ ਨੂੰ ਉਹ ਆਪ ਹੀ ਸੰਵਾਰਦਾ ਹੈ ਆਪ ਹੀ (ਨਾਮ ਦਾ) ਰੰਗ ਚਾੜ੍ਹਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਨਾਨਕ ਜੀ! ਉਹ ਜੀਵ-ਇਸਤ੍ਰੀ ਖਸਮ-ਪ੍ਰਭੂ ਨੂੰ ਪਿਆਰੀ ਲੱਗਦੀ ਹੈ, ਉਸ ਨੂੰ ਪ੍ਰਭੂ ਆਪ ਹੀ ਆਪਣੇ ਚਰਨਾਂ ਵਿਚ ਜੋੜਦਾ ਹੈ ॥੪॥੧॥੩॥



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Dalbir Singh : 🙏🙏🌺🌸🌼ਹੇ ਅਕਾਲ ਪੁਰਖ ਵਾਹਿਗੁਰੂ ਜੀ ਸਾਨੂੰ ਨਿਮਾਣਿਆਂ ਨਿਤਾਣਿਆਂ ਨੂੰ ਵੀ ਅਪਣੇ ਨਾਮ ਦਾਨ ਥਖਸੋ ਜੀ...



अंग : 721
तिलंग महला १ घरु ३ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ इहु तनु माइआ पाहिआ पिआरे लीतड़ा लबि रंगाए ॥ मेरै कंत न भावै चोलड़ा पिआरे किउ धन सेजै जाए ॥१॥ हंउ कुरबानै जाउ मिहरवाना हंउ कुरबानै जाउ ॥ हंउ कुरबानै जाउ तिना कै लैनि जो तेरा नाउ ॥ लैनि जो तेरा नाउ तिना कै हंउ सद कुरबानै जाउ ॥१॥ रहाउ ॥ काइआ रंङणि जे थीऐ पिआरे पाईऐ नाउ मजीठ ॥ रंङण वाला जे रंङै साहिबु ऐसा रंगु न डीठ ॥२॥ जिन के चोले रतड़े पिआरे कंतु तिना कै पासि ॥ धूड़ि तिना की जे मिलै जी कहु नानक की अरदासि ॥३॥ आपे साजे आपे रंगे आपे नदरि करेइ ॥ नानक कामणि कंतै भावै आपे ही रावेइ ॥४॥१॥३॥
अर्थ: राग तिलंग, घर ३ में गुरु नानक देव जी की बाणी। अकाल पुरख एक है और सतिगुरु की कृपा द्वारा मिलता है। जिस जीव-स्त्री के इस संसार को माया (के मोह की लाग लगी हो, और फिर उस ने इस को पूरा जिव्हा के चस्के में रंग लिया हो, वह जीव-स्त्री खसम प्रभू के चरणों में नहीं पहुँच सकती, क्योंकि (जीवन का) यह चोला (यह शरीर, यह जीवन) खसम प्रभू को पसंद नहीं आता ॥१॥ हे मेहरबान प्रभू! मैं कुर्बान जाता हूँ, मैं सदके जाता हूँ उन से जो तेरा नाम सिमरते हैं। जो व्यक्ति तेरा नाम लेता है, मैं उस से सदा कुर्बान जाता हूँ ॥१॥ रहाउ ॥ (पर, हाँ!) अगर यह शरीर (निलारी की) मट्टी बन जाए, और हे सजन! अगर इस में मजीठ जैसे पक्के रंग वाला प्रभू का नाम रंग डाला जाए, फिर मालिक प्रभु स्वयं निलारी (बन के जीव-स्त्री के मन को) रंग (का गोता) दे, तो ऐसा रंग चड़ता है जो जो पहले कभी देखा न हो ॥੨॥ हे प्यारे (सजन!) जिन जीव स्त्रियों के (शरीर-) चोले (जीवन नाम-रंग से) रंगें गए हैं,खसम-प्रभू (सदा) उनके पास (वसता) है। हे सजन! नानक तरफों उन्हा पास बेनती कर, भला कहीं नानक को उनके चरनों की धूड़ मिल जाए ॥३॥ जिस जीव स्त्री पर प्रभू आप मेहर की नज़र करता है उसको वह आप ही संवारदा है और आप ही (नाम के) रंग में रंगता है। नानक जी! वह जीव-स्त्री खसम-प्रभू को प्यारी लगती है, उसको प्रभू आप ही अपने चरनों में जोड़ता है ॥४॥१॥३॥



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अंग : 694
धनासरी, भगत रवि दास जी की ੴ सतिगुर परसाद हम सरि दीनु दइआल न तुम सरि अब पतिआरू किया कीजे ॥ बचनी तोर मोर मनु माने जन कऊ पूरण दीजे ॥१॥ हउ बलि बलि जाउ रमईआ कारने ॥ कारन कवन अबोल ॥ रहाउ ॥ बहुत जनम बिछुरे थे माधउ इहु जनमु तुम्हारे लेखे ॥ कहि रविदास आस लगि जीवउ चिर भइओ दरसनु देखे ॥२॥१॥
अर्थ: (हे माधो मेरे जैसा कोई दीन और कंगाल नहीं हे और तेरे जैसा कोई दया करने वाला नहीं, (मेरी कंगालता का) अब और परतावा करने की जरुरत नहीं (हे सुंदर राम!) मुझे दास को यह सिदक बक्श की मेरा मन तेरी सिफत सलाह की बाते करने में ही लगा रहे।१। हे सुंदर राम! में तुझसे सदके हूँ, तू किस कारण मेरे साथ नहीं बोलता?||रहाउ|| रविदास जी कहते हैं- हे माधो! कई जन्मो से मैं तुझ से बिछुड़ा आ रहा हूँ (कृपा कर, मेरा) यह जनम तेरी याद में बीते; तेरा दीदार किये बहुत समां हो गया है, (दर्शन की) आस में जीवित हूँ॥२॥१॥



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ਅੰਗ : 694
ਧਨਾਸਰੀ ਭਗਤ ਰਵਿਦਾਸ ਜੀ ਕੀ ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥ ਹਮ ਸਰਿ ਦੀਨੁ ਦਇਆਲੁ ਨ ਤੁਮ ਸਰਿ ਅਬ ਪਤੀਆਰੁ ਕਿਆ ਕੀਜੈ ॥ ਬਚਨੀ ਤੋਰ ਮੋਰ ਮਨੁ ਮਾਨੈ ਜਨ ਕਉ ਪੂਰਨੁ ਦੀਜੈ ॥੧॥ ਹਉ ਬਲਿ ਬਲਿ ਜਾਉ ਰਮਈਆ ਕਾਰਨੇ ॥ ਕਾਰਨ ਕਵਨ ਅਬੋਲ ॥ ਰਹਾਉ ॥ ਬਹੁਤ ਜਨਮ ਬਿਛੁਰੇ ਥੇ ਮਾਧਉ ਇਹੁ ਜਨਮੁ ਤੁਮ੍ਹ੍ਹਾਰੇ ਲੇਖੇ ॥ ਕਹਿ ਰਵਿਦਾਸ ਆਸ ਲਗਿ ਜੀਵਉ ਚਿਰ ਭਇਓ ਦਰਸਨੁ ਦੇਖੇ ॥੨॥੧॥
ਅਰਥ: (ਹੇ ਮਾਧੋ!) ਮੇਰੇ ਵਰਗਾ ਕੋਈ ਨਿਮਾਣਾ ਨਹੀਂ, ਤੇ, ਤੇਰੇ, ਵਰਗਾ ਹੋਰ ਕੋਈ ਦਇਆ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਨਹੀਂ, (ਮੇਰੀ ਕੰਗਾਲਤਾ ਦਾ) ਹੁਣ ਹੋਰ ਪਰਤਾਵਾ ਕਰਨ ਦੀ ਲੋੜ ਨਹੀਂ। (ਹੇ ਸੋਹਣੇ ਰਾਮ!) ਮੈਨੂੰ ਦਾਸ ਨੂੰ ਇਹ ਪੂਰਨ ਸਿਦਕ ਬਖ਼ਸ਼ ਕਿ ਮੇਰਾ ਮਨ ਤੇਰੀ ਸਿਫ਼ਤਿ-ਸਾਲਾਹ ਦੀਆਂ ਗੱਲਾਂ ਵਿਚ ਪਰਚ ਜਾਇਆ ਕਰੇ।੧। ਹੇ ਸੋਹਣੇ ਰਾਮ! ਮੈਂ ਤੈਥੋਂ ਸਦਾ ਸਦਕੇ ਹਾਂ; ਤੂੰ ਕਿਸ ਗੱਲੇ ਮੇਰੇ ਨਾਲ ਨਹੀਂ ਬੋਲਦਾ?।ਰਹਾਉ। ਰਵਿਦਾਸ ਜੀ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ -ਹੇ ਮਾਧੋ! ਕਈ ਜਨਮਾਂ ਤੋਂ ਮੈਂ ਤੈਥੋਂ ਵਿਛੁੜਿਆ ਆ ਰਿਹਾ ਹਾਂ (ਮਿਹਰ ਕਰ, ਮੇਰਾ) ਇਹ ਜਨਮ ਤੇਰੀ ਯਾਦ ਵਿਚ ਬੀਤੇ; ਤੇਰਾ ਦੀਦਾਰ ਕੀਤਿਆਂ ਬੜਾ ਚਿਰ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ, (ਦਰਸ਼ਨ ਦੀ) ਆਸ ਵਿਚ ਹੀ ਮੈਂ ਜੀਊਂਦਾ ਹਾਂ ॥੨॥੧॥



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ਅੰਗ : 690
ਧਨਾਸਰੀ ਛੰਤ ਮਹਲਾ ੪ ਘਰੁ ੧ ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥ ਹਰਿ ਜੀਉ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਤਾ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ਜੀਉ ॥ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਸੁਭਾਇ ਸਹਜਿ ਗੁਣ ਗਾਈਐ ਜੀਉ ॥ ਗੁਣ ਗਾਇ ਵਿਗਸੈ ਸਦਾ ਅਨਦਿਨੁ ਜਾ ਆਪਿ ਸਾਚੇ ਭਾਵਏ ॥ ਅਹੰਕਾਰੁ ਹਉਮੈ ਤਜੈ ਮਾਇਆ ਸਹਜਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਵਏ ॥ ਆਪਿ ਕਰਤਾ ਕਰੇ ਸੋਈ ਆਪਿ ਦੇਇ ਤ ਪਾਈਐ ॥ ਹਰਿ ਜੀਉ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਤਾ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ਜੀਉ ॥੧॥ ਅੰਦਰਿ ਸਾਚਾ ਨੇਹੁ ਪੂਰੇ ਸਤਿਗੁਰੈ ਜੀਉ ॥ ਹਉ ਤਿਸੁ ਸੇਵੀ ਦਿਨੁ ਰਾਤਿ ਮੈ ਕਦੇ ਨ ਵੀਸਰੈ ਜੀਉ ॥ ਕਦੇ ਨ ਵਿਸਾਰੀ ਅਨਦਿਨੁ ਸਮ੍ਹ੍ਹਾਰੀ ਜਾ ਨਾਮੁ ਲਈ ਤਾ ਜੀਵਾ ॥ ਸ੍ਰਵਣੀ ਸੁਣੀ ਤ ਇਹੁ ਮਨੁ ਤ੍ਰਿਪਤੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਵਾ ॥ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਤਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੇਲੇ ਅਨਦਿਨੁ ਬਿਬੇਕ ਬੁਧਿ ਬਿਚਰੈ ॥ ਅੰਦਰਿ ਸਾਚਾ ਨੇਹੁ ਪੂਰੇ ਸਤਿਗੁਰੈ ॥੨॥ ਸਤਸੰਗਤਿ ਮਿਲੈ ਵਡਭਾਗਿ ਤਾ ਹਰਿ ਰਸੁ ਆਵਏ ਜੀਉ ॥ ਅਨਦਿਨੁ ਰਹੈ ਲਿਵ ਲਾਇ ਤ ਸਹਜਿ ਸਮਾਵਏ ਜੀਉ ॥ ਸਹਜਿ ਸਮਾਵੈ ਤਾ ਹਰਿ ਮਨਿ ਭਾਵੈ ਸਦਾ ਅਤੀਤੁ ਬੈਰਾਗੀ ॥ ਹਲਤਿ ਪਲਤਿ ਸੋਭਾ ਜਗ ਅੰਤਰਿ ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ॥ ਹਰਖ ਸੋਗ ਦੁਹਾ ਤੇ ਮੁਕਤਾ ਜੋ ਪ੍ਰਭੁ ਕਰੇ ਸੁ ਭਾਵਏ ॥ ਸਤਸੰਗਤਿ ਮਿਲੈ ਵਡਭਾਗਿ ਤਾ ਹਰਿ ਰਸੁ ਆਵਏ ਜੀਉ ॥੩॥ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਦੁਖੁ ਹੋਇ ਮਨਮੁਖ ਜਮਿ ਜੋਹਿਆ ਜੀਉ ॥ ਹਾਇ ਹਾਇ ਕਰੇ ਦਿਨੁ ਰਾਤਿ ਮਾਇਆ ਦੁਖਿ ਮੋਹਿਆ ਜੀਉ ॥ ਮਾਇਆ ਦੁਖਿ ਮੋਹਿਆ ਹਉਮੈ ਰੋਹਿਆ ਮੇਰੀ ਮੇਰੀ ਕਰਤ ਵਿਹਾਵਏ ॥ ਜੋ ਪ੍ਰਭੁ ਦੇਇ ਤਿਸੁ ਚੇਤੈ ਨਾਹੀ ਅੰਤਿ ਗਇਆ ਪਛੁਤਾਵਏ ॥ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਕੋ ਸਾਥਿ ਨ ਚਾਲੈ ਪੁਤ੍ਰ ਕਲਤ੍ਰ ਮਾਇਆ ਧੋਹਿਆ ॥ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਦੁਖੁ ਹੋਇ ਮਨਮੁਖਿ ਜਮਿ ਜੋਹਿਆ ਜੀਉ ॥੪॥ ਰਿ ਕਿਰਪਾ ਲੇਹੁ ਮਿਲਾਇ ਮਹਲੁ ਹਰਿ ਪਾਇਆ ਜੀਉ ॥ ਸਦਾ ਰਹੈ ਕਰ ਜੋੜਿ ਪ੍ਰਭੁ ਮਨਿ ਭਾਇਆ ਜੀਉ ॥ ਪ੍ਰਭੁ ਮਨਿ ਭਾਵੈ ਤਾ ਹੁਕਮਿ ਸਮਾਵੈ ਹੁਕਮੁ ਮੰਨਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥ ਅਨਦਿਨੁ ਜਪਤ ਰਹੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਸਹਜੇ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ॥ ਨਾਮੋ ਨਾਮੁ ਮਿਲੀ ਵਡਿਆਈ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਮਨਿ ਭਾਵਏ ॥ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਲੇਹੁ ਮਿਲਾਇ ਮਹਲੁ ਹਰਿ ਪਾਵਏ ਜੀਉ ॥੫॥੧॥
ਅਰਥ: ਰਾਗ ਧਨਾਸਰੀ, ਘਰ ੧ ਵਿੱਚ ਗੁਰੂ ਰਾਮਦਾਸ ਜੀ ਦੀ ਬਾਣੀ ‘ਛੰਤ’ (ਛੰਦ)। ਅਕਾਲ ਪੁਰਖ ਇੱਕ ਹੈ ਅਤੇ ਸਤਿਗੁਰੂ ਦੀ ਕਿਰਪਾ ਨਾਲ ਮਿਲਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਭਾਈ! ਜੇ ਪਰਮਾਤਮਾ ਆਪ ਕਿਰਪਾ ਕਰੇ, ਤਾਂ ਉਸ ਦਾ ਨਾਮ ਸਿਮਰਿਆ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ। ਜੇ ਗੁਰੂ ਮਿਲ ਪਏ, ਤਾਂ (ਪ੍ਰਭੂ ਦੇ) ਪ੍ਰੇਮ ਵਿਚ (ਲੀਨ ਹੋ ਕੇ) ਆਤਮਕ ਅਡੋਲਤਾ ਵਿਚ (ਟਿਕ ਕੇ) ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਗੁਣਾਂ ਨੂੰ ਗਾ ਸਕੀਦਾ ਹੈ। (ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ) ਗੁਣ ਗਾ ਕੇ (ਮਨੁੱਖ) ਸਦਾ ਹਰ ਵੇਲੇ ਖਿੜਿਆ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ, (ਪਰ ਇਹ ਤਦੋਂ ਹੀ ਹੋ ਸਕਦਾ ਹੈ) ਜਦੋਂ ਸਦਾ ਕਾਇਮ ਰਹਿਣ ਵਾਲੇ ਪਰਮਾਤਮਾ ਨੂੰ ਆਪ (ਇਹ ਮੇਹਰ ਕਰਨੀ) ਪਸੰਦ ਆਵੇ। (ਗੁਣ ਗਾਣ ਦੀ ਬਰਕਤਿ ਨਾਲ ਮਨੁੱਖ) ਅਹੰਕਾਰ, ਹਉਮੈ, ਮਾਇਆ (ਦਾ ਮੋਹ) ਤਿਆਗ ਦੇਂਦਾ ਹੈ, ਅਤੇ, ਆਤਮਕ ਅਡੋਲਤਾ ਵਿਚ ਹਰਿ-ਨਾਮ ਵਿਚ ਲੀਨ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। (ਨਾਮ ਸਿਮਰਨ ਦੀ ਦਾਤਿ) ਉਹ ਪਰਮਾਤਮਾ ਆਪ ਹੀ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਜਦੋਂ ਉਹ (ਇਹ ਦਾਤਿ) ਦੇਂਦਾ ਹੈ ਤਦੋਂ ਮਿਲਦੀ ਹੈ। ਹੇ ਭਾਈ! ਪਰਮਾਤਮਾ ਕਿਰਪਾ ਕਰੇ, ਤਾਂ ਉਸ ਦਾ ਨਾਮ ਸਿਮਰਿਆ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ।੧। ਹੇ ਭਾਈ! ਪੂਰੇ ਗੁਰੂ ਦੀ ਰਾਹੀਂ (ਮੇਰੇ) ਮਨ ਵਿਚ (ਪਰਮਾਤਮਾ ਨਾਲ) ਸਦਾ-ਥਿਰ ਰਹਿਣ ਵਾਲਾ ਪਿਆਰ ਬਣ ਗਿਆ ਹੈ। (ਗੁਰੂ ਦੀ ਕਿਰਪਾ ਨਾਲ) ਮੈਂ ਉਸ (ਪ੍ਰਭੂ) ਨੂੰ ਦਿਨ ਰਾਤ ਸਿਮਰਦਾ ਰਹਿੰਦਾ ਹਾਂ, ਮੈਨੂੰ ਉਹ ਕਦੇ ਭੀ ਨਹੀਂ ਭੁੱਲਦਾ। ਮੈਂ ਉਸ ਨੂੰ ਕਦੇ ਭੁਲਾਂਦਾ ਨਹੀਂ, ਮੈਂ ਹਰ ਵੇਲੇ (ਉਸ ਪ੍ਰਭੂ ਨੂੰ) ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਵਸਾਈ ਰੱਖਦਾ ਹਾਂ। ਜਦੋਂ ਮੈਂ ਉਸ ਦਾ ਨਾਮ ਜਪਦਾ ਹਾਂ, ਤਦੋਂ ਮੈਨੂੰ ਆਤਮਕ ਜੀਵਨ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਜਦੋਂ ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਕੰਨਾਂ ਨਾਲ (ਹਰਿ-ਨਾਮ) ਸੁਣਦਾ ਹਾਂ ਤਦੋਂ (ਮੇਰਾ) ਇਹ ਮਨ (ਮਾਇਆ ਵਲੋਂ) ਰੱਜ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਭਾਈ! ਮੈਂ ਗੁਰੂ ਦੀ ਸਰਨ ਪੈ ਕੇ ਆਤਮਕ ਜੀਵਨ ਦੇਣ ਵਾਲਾ ਨਾਮ-ਜਲ ਪੀਂਦਾ ਰਹਿੰਦਾ ਹਾਂ (ਜਦੋਂ ਪ੍ਰਭੂ ਮਨੁੱਖ ਉਤੇ ਮੇਹਰ ਦੀ) ਨਿਗਾਹ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਤਦੋਂ (ਉਸ ਨੂੰ) ਗੁਰੂ ਮਿਲਾਂਦਾ ਹੈ (ਤਦੋਂ ਹਰ ਵੇਲੇ ਉਸ ਮਨੁੱਖ ਦੇ ਅੰਦਰ) ਚੰਗੇ ਮੰਦੇ ਦੀ ਪਰਖ ਕਰ ਸਕਣ ਵਾਲੀ ਅਕਲ ਕੰਮ ਕਰਦੀ ਹੈ। ਹੇ ਭਾਈ! ਪੂਰੇ ਗੁਰੂ ਦੀ ਕਿਰਪਾ ਨਾਲ ਮੇਰੇ ਅੰਦਰ (ਪ੍ਰਭੂ ਨਾਲ) ਸਦਾ ਕਾਇਮ ਰਹਿਣ ਵਾਲਾ ਪਿਆਰ ਬਣ ਗਿਆ ਹੈ।੨। (ਜਿਸ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ) ਵੱਡੀ ਕਿਸਮਤ ਨਾਲ ਸਾਧ ਸੰਗਤਿ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ, ਤਾਂ ਉਸ ਨੂੰ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਨਾਮ ਦਾ ਸੁਆਦ ਆਉਣ ਲੱਗ ਪੈਂਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਹਰ ਵੇਲੇ (ਪ੍ਰਭੂ ਦੀ ਯਾਦ ਵਿਚ) ਸੁਰਤਿ ਜੋੜੀ ਰੱਖਦਾ ਹੈ, ਆਤਮਕ ਅਡੋਲਤਾ ਵਿਚ ਟਿਕਿਆ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ। ਜਦੋਂ ਮਨੁੱਖ ਆਤਮਕ ਅਡੋਲਤਾ ਵਿਚ ਲੀਨ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਤਦੋਂ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਮਨ ਵਿਚ ਪਿਆਰਾ ਲੱਗਣ ਲੱਗ ਪੈਂਦਾ ਹੈ, ਤਦੋਂ ਮਾਇਆ ਦੇ ਮੋਹ ਤੋਂ ਪਰੇ ਲੰਘ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਨਿਰਲੇਪ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਇਸ ਲੋਕ ਵਿਚ, ਪਰਲੋਕ ਵਿਚ, ਸਾਰੇ ਸੰਸਾਰ ਵਿਚ ਉਸ ਦੀ ਸੋਭਾ ਹੋਣ ਲੱਗ ਪੈਂਦੀ ਹੈ, ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਨਾਮ ਵਿਚ ਉਸ ਦੀ ਲਗਨ ਲੱਗੀ ਰਹਿੰਦੀ ਹੈ। ਉਹ ਮਨੁੱਖ ਖ਼ੁਸ਼ੀ ਗ਼ਮੀ ਦੋਹਾਂ ਤੋਂ ਸੁਤੰਤਰ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਜੋ ਕੁਝ ਪਰਮਾਤਮਾ ਕਰਦਾ ਹੈ ਉਹ ਉਸ ਨੂੰ ਚੰਗਾ ਲੱਗਣ ਲੱਗ ਪੈਂਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਭਾਈ! ਜਦੋਂ ਵੱਡੀ ਕਿਸਮਤ ਨਾਲ ਕਿਸੇ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਸਾਧ ਸੰਗਤਿ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਤਦੋਂ ਉਸ ਨੂੰ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਨਾਮ ਦਾ ਰਸ ਆਉਣ ਲੱਗ ਪੈਂਦਾ ਹੈ।੩। ਹੇ ਭਾਈ! ਆਪਣੇ ਮਨ ਦੇ ਪਿੱਛੇ ਤੁਰਨ ਵਾਲੇ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਆਤਮਕ ਮੌਤ ਨੇ ਸਦਾ ਆਪਣੀ ਤੱਕ ਵਿਚ ਰੱਖਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ, ਮਾਇਆ ਦੇ ਮੋਹ ਦੇ ਕਾਰਨ ਉਸ ਨੂੰ ਸਦਾ ਦੁੱਖ ਵਿਆਪਦਾ ਹੈ। ਉਹ ਦਿਨ ਰਾਤ ‘ਹਾਇ ਹਾਇ’ ਕਰਦਾ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ, ਮਾਇਆ ਦੇ ਦੁੱਖ ਵਿਚ ਫਸਿਆ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ। ਉਹ ਸਦਾ ਮਾਇਆ ਦੇ ਦੁੱਖ ਵਿਚ ਗ੍ਰਸਿਆ ਹੋਇਆ ਹਉਮੈ ਦੇ ਕਾਰਨ ਕ੍ਰੋਧਾਤੁਰ ਭੀ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ। ਉਸ ਦੀ ਸਾਰੀ ਉਮਰ ‘ਮੇਰੀ ਮਾਇਆ, ਮੇਰੀ ਮਾਇਆ’ ਕਰਦਿਆਂ ਲੰਘ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਜੇਹੜਾ ਪਰਮਾਤਮਾ (ਉਸ ਨੂੰ ਸਭ ਕੁਝ) ਦੇ ਰਿਹਾ ਹੈ ਉਸ ਪਰਮਾਤਮਾ ਨੂੰ ਉਹ ਕਦੇ ਚੇਤੇ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ, ਆਖ਼ਰ ਜਦੋਂ ਇਥੋਂ ਤੁਰਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਪਛੁਤਾਂਦਾ ਹੈ। ਪੁੱਤਰ ਇਸਤ੍ਰੀ (ਆਦਿਕ) ਹਰਿ-ਨਾਮ ਤੋਂ ਬਿਨਾ ਕੋਈ ਭੀ (ਮਨੁੱਖ ਦੇ) ਨਾਲ ਨਹੀਂ ਜਾਂਦਾ, ਦੁਨੀਆ ਦੀ ਮਾਇਆ ਉਸ ਨੂੰ ਛਲ ਲੈਂਦੀ ਹੈ। ਹੇ ਭਾਈ! ਆਪਣੇ ਮਨ ਦੇ ਪਿੱਛੇ ਤੁਰਨ ਵਾਲੇ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਆਤਮਕ ਮੌਤ ਗ੍ਰਸੀ ਰੱਖਦੀ ਹੈ, ਮਾਇਆ ਦੇ ਮੋਹ ਦੇ ਕਾਰਨ ਉਸ ਨੂੰ ਸਦਾ ਦੁੱਖ ਵਿਆਪਦਾ ਹੈ।੪। ਹੇ ਹਰੀ! ਜਿਸ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਤੂੰ (ਆਪਣੀ) ਕਿਰਪਾ ਕਰ ਕੇ (ਆਪਣੇ ਚਰਨਾਂ ਵਿਚ) ਜੋੜ ਲੈਂਦਾ ਹੈਂ, ਉਸ ਨੂੰ ਤੇਰੀ ਹਜ਼ੂਰੀ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। (ਹੇ ਭਾਈ! ਉਹ ਮਨੁੱਖ ਪ੍ਰਭੂ ਦੀ ਹਜ਼ੂਰੀ ਵਿਚ) ਸਦਾ ਹੱਥ ਜੋੜ ਕੇ ਟਿਕਿਆ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ, ਉਸ ਨੂੰ (ਆਪਣੇ) ਮਨ ਵਿਚ ਪ੍ਰਭੂ ਪਿਆਰਾ ਲੱਗਦਾ ਹੈ। ਜਦੋਂ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਮਨ ਵਿਚ ਪ੍ਰਭੂ ਪਿਆਰਾ ਲੱਗਦਾ ਹੈ, ਤਦੋਂ ਉਹ ਪ੍ਰਭੂ ਦੀ ਰਜ਼ਾ ਵਿਚ ਟਿਕ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਤੇ, ਹੁਕਮ ਮੰਨ ਕੇ ਆਤਮਕ ਆਨੰਦ ਮਾਣਦਾ ਹੈ। ਉਹ ਮਨੁੱਖ ਹਰ ਵੇਲੇ ਦਿਨ ਰਾਤ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦਾ ਨਾਮ ਜਪਦਾ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ, ਆਤਮਕ ਅਡੋਲਤਾ ਵਿਚ ਟਿਕ ਕੇ ਉਹ ਹਰਿ-ਨਾਮ ਸਿਮਰਦਾ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਨਾਨਕ! ਪਰਮਾਤਮਾ ਦਾ (ਹਰ ਵੇਲੇ) ਨਾਮ-ਸਿਮਰਨ (ਹੀ) ਉਸ ਨੂੰ ਵਡਿਆਈ ਮਿਲੀ ਰਹਿੰਦੀ ਹੈ, ਪ੍ਰਭੂ ਦਾ ਨਾਮ (ਉਸ ਨੂੰ ਆਪਣੇ) ਮਨ ਵਿਚ ਪਿਆਰਾ ਲੱਗਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਹਰੀ! (ਆਪਣੀ) ਕਿਰਪਾ ਕਰ ਕੇ (ਜਿਸ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਤੂੰ ਆਪਣੇ ਚਰਨਾਂ ਵਿਚ) ਜੋੜ ਲੈਂਦਾ ਹੈਂ, ਉਸ ਨੂੰ ਤੇਰੀ ਹਜ਼ੂਰੀ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ।੫।੧।



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अंग : 690
धनासरी छंत महला ४ घरु १ सतिੴ गुर प्रसादि ॥ हरि जीउ क्रिपा करे ता नामु धिआईऐ जीउ ॥ सतिगुरु मिलै सुभाइ सहजि गुण गाईऐ जीउ ॥ गुण गाइ विगसै सदा अनदिनु जा आपि साचे भावए ॥ अहंकारु हउमै तजै माइआ सहजि नामि समावए ॥ आपि करता करे सोई आपि देइ त पाईऐ ॥ हरि जीउ क्रिपा करे ता नामु धिआईऐ जीउ ॥१॥ अंदरि साचा नेहु पूरे सतिगुरै जीउ ॥ हउ तिसु सेवी दिनु राति मै कदे न वीसरै जीउ ॥ कदे न विसारी अनदिनु सम्ह्हारी जा नामु लई ता जीवा ॥ स्रवणी सुणी त इहु मनु त्रिपतै गुरमुखि अंम्रितु पीवा ॥ नदरि करे ता सतिगुरु मेले अनदिनु बिबेक बुधि बिचरै ॥ अंदरि साचा नेहु पूरे सतिगुरै ॥२॥ सतसंगति मिलै वडभागि ता हरि रसु आवए जीउ ॥ अनदिनु रहै लिव लाइ त सहजि समावए जीउ ॥ सहजि समावै ता हरि मनि भावै सदा अतीतु बैरागी ॥ हलति पलति सोभा जग अंतरि राम नामि लिव लागी ॥ हरख सोग दुहा ते मुकता जो प्रभु करे सु भावए ॥ सतसंगति मिलै वडभागि ता हरि रसु आवए जीउ ॥३॥ दूजै भाइ दुखु होइ मनमुख जमि जोहिआ जीउ ॥ हाइ हाइ करे दिनु राति माइआ दुखि मोहिआ जीउ ॥ माइआ दुखि मोहिआ हउमै रोहिआ मेरी मेरी करत विहावए ॥ जो प्रभु देइ तिसु चेतै नाही अंति गइआ पछुतावए ॥ बिनु नावै को साथि न चालै पुत्र कलत्र माइआ धोहिआ ॥ दूजै भाइ दुखु होइ मनमुखि जमि जोहिआ जीउ ॥४॥ करि किरपा लेहु मिलाइ महलु हरि पाइआ जीउ ॥ सदा रहै कर जोड़ि प्रभु मनि भाइआ जीउ ॥ प्रभु मनि भावै ता हुकमि समावै हुकमु मंनि सुखु पाइआ ॥ अनदिनु जपत रहै दिनु राती सहजे नामु धिआइआ ॥ नामो नामु मिली वडिआई नानक नामु मनि भावए ॥ करि किरपा लेहु मिलाइ महलु हरि पावए जीउ ॥५॥१॥
अर्थ: राग धनासरी, घर १ मे गुरु रामदास जी की बाणी ‘छंद’। अकाल पूरख एक है व् परमात्मा की कृपा द्वारा मिलता है। हे भाई! अगर परमात्मा आप कृपा कर, तो उस का नाम सिमरा जा सकता है। अगर गुरु मिल जाए, तो (प्रभु के) प्रेम में (लीन हो के) आत्मिक अडोलता मे (सथिर हो के) परमातम के गुणों को गा सकता है। (परमात्मा के) गुण गा के मनुख सदा खुश रहता है, परन्तु यह तभी हो सकता है जब सदा कायम रहने वाला परमात्मा को खुद (यह मेहर करनी) पसंद आये। गुण गाने की बरकत से मनुख का अहंकार , होम्य माया के मोह को त्याग देता है, और आत्मिक अडोलता में हरी नाम में लीन हो जाता है। नाम सुमिरन की दात परमात्मा खुद ही देता है, जब वेह देता है तभी मिलती है, हे भाई! परमात्मा कृपा करे तो ही उस का नाम सिमरा जा सकता है।१। हे भाई ! पूरे गुरु के द्वारा (मेरे) मन में (भगवान के साथ) सदा-थिर रहने वाला प्यार बन गया है। (गुरु की कृपा के साथ) मैं उस (भगवान) को दिन रात सुमिरता रहता हूँ, मुझे वह कभी भी नहीं भूलता। मैं उस को कभी भुलता नहीं, मैं हर समय (उस भगवान को) हृदय में बसाए रखता हूँ। जब मैं उस का नाम जपता हूँ, तब मुझे आत्मिक जीवन प्राप्त होता है। जब मैं आपने कानो के साथ (हरि-नाम) सुनता हूँ तब (मेरा) यह मन (माया की तरफ से) तृप्त हो जाता है। हे भाई ! मैं गुरु की शरण में आकर आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीता रहता हूँ (जब भगवान मनुख ऊपर कृपा की) निगाह करता है, तब (उस को) गुरु मिलाता है (तब हर समय उस मनुख के अंदर) अच्छे मंदे की परख कर सकने वाली समझ काम करती है। हे भाई ! पूरे गुरु की कृपा के साथ मेरे अंदर (भगवान के साथ) सदा कायम रहने वाला प्यार बन गया है।2। (जिस मनुष्य को) बड़ी किस्मत से साधु-संगत प्राप्त हो जाती है, तो उसको परमात्मा के नाम का स्वाद आने लग जाता है, वह हर वक्त (प्रभु की याद में) तवज्जो जोड़े रखता है, आत्मिक अडोलता में टिका रहता है। जब मनुष्य आत्मिक अडोलता में लीन हो जाता है, तब परमात्मा को प्यारा लगने लग जाता है, तब माया के मोह से परे लांघ जाता है, निर्लिप हो जाता है। इस लोक में, परलोक में, सारे संसार में उसकी शोभा होने लग जाती है, परमात्मा के नाम में उसकी लगन लगी रहती है। वह मनुष्य खुशी-ग़मी दोनों से स्वतंत्र हो जाता है, जो कुछ परमात्मा करता है वह उसको अच्छा लगने लगता है। हे भाई! जब बड़ी किस्मत से किसी मनुष्य को साधु-संगत प्राप्त होती है तब उसको परमात्मा के नाम का रस आने लग पड़ता है।3। हे भाई! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य को आत्मिक मौत ने सदा अपनी निगाह तले रखा हुआ है, माया के मोह के कारण उसे सदा दुख व्यापता है। वह दिन रात ‘हाय हाय’ करता रहता है, माया के दुख में फंसा रहता है। वह सदा माया के दुख में ग्रसा हुआ अहंम् के कारण क्रोधातुर भी रहता है। उसकी सारी उम्र ‘मेरी माया मेरी माया’ करते हुए बीत जाती है। जो परमात्मा (उसे सब कुछ) दे रहा है उस परमात्मा को वह कभी याद नहीं करता, आखिर में जब यहाँ से चलता है तो पछताता है। पुत्र, स्त्री (आदि) हरि-नाम के बिना कोई (मनुष्य के) साथ नहीं जाता, दुनिया की माया उसे छल लेती है। हे भाई! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य को आत्मिक मौत ग्रसे रखती है, माया के कारण उस को सदा दुख व्यापता है।4। हे हरि! जिस मनुष्य को तू (अपनी) कृपा करके (अपने चरणों में) जोड़ लेता है, उसको तेरी हजूरी प्राप्त हो जाती है। (हे भाई! वह मनुष्य प्रभु की हजूरी में) सदा हाथ जोड़ के टिका रहता है, उसको (अपने) मन में प्रभु प्यारा लगता है। जब मनुष्य को अपने मन में प्रभु प्यारा लगने लगता है, तब वह प्रभु की रजा में टिक जाता है, और हुक्म मान के आत्मिक आनंद लेता है। वह मनुष्य हर वक्त दिन रात परमात्मा का नाम जपता रहता है, आत्मिक अडोलता में टिक के वह हरि-नाम स्मरण करता रहता है। हे नानक! परमात्मा का (हर वक्त) नाम-स्मरण करने से (ही) उसको बड़ाई मिली रहती है, प्रभु का नाम (उसको अपने) मन में प्यारा लगता है। हे हरि! (अपनी) कृपा करके (जिस मनुष्य को तू अपने चरणों में) जोड़ लेता है, उसको तेरी हजूरी प्राप्त हो जाती है।5।1।



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ਅੰਗ : 708
ਸਲੋਕ ॥ ਰਾਜ ਕਪਟੰ ਰੂਪ ਕਪਟੰ ਧਨ ਕਪਟੰ ਕੁਲ ਗਰਬਤਹ ॥ ਸੰਚੰਤਿ ਬਿਖਿਆ ਛਲੰ ਛਿਦ੍ਰੰ ਨਾਨਕ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਸੰਗਿ ਨ ਚਾਲਤੇ ॥੧॥ ਪੇਖੰਦੜੋ ਕੀ ਭੁਲੁ ਤੁੰਮਾ ਦਿਸਮੁ ਸੋਹਣਾ ॥ ਅਢੁ ਨ ਲਹੰਦੜੋ ਮੁਲੁ ਨਾਨਕ ਸਾਥਿ ਨ ਜੁਲਈ ਮਾਇਆ ॥੨॥ ਪਉੜੀ ॥ ਚਲਦਿਆ ਨਾਲਿ ਨ ਚਲੈ ਸੋ ਕਿਉ ਸੰਜੀਐ ॥ ਤਿਸ ਕਾ ਕਹੁ ਕਿਆ ਜਤਨੁ ਜਿਸ ਤੇ ਵੰਜੀਐ ॥ ਹਰਿ ਬਿਸਰਿਐ ਕਿਉ ਤ੍ਰਿਪਤਾਵੈ ਨਾ ਮਨੁ ਰੰਜੀਐ ॥ ਪ੍ਰਭੂ ਛੋਡਿ ਅਨ ਲਾਗੈ ਨਰਕਿ ਸਮੰਜੀਐ ॥ ਹੋਹੁ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਦਇਆਲ ਨਾਨਕ ਭਉ ਭੰਜੀਐ ॥੧੦॥
ਅਰਥ: ਹੇ ਨਾਨਕ ਜੀ! ਇਹ ਰਾਜ ਰੂਪ ਧਨ ਤੇ (ਉੱਚੀ) ਕੁਲ ਦਾ ਮਾਣ-ਸਭ ਛਲ-ਰੂਪ ਹੈ। ਜੀਵ ਛਲ ਕਰ ਕੇ ਦੂਜਿਆਂ ਤੇ ਦੂਸ਼ਣ ਲਾ ਲਾ ਕੇ (ਕਈ ਢੰਗਾਂ ਨਾਲ) ਮਾਇਆ ਜੋੜਦੇ ਹਨ, ਪਰ ਪ੍ਰਭੂ ਦੇ ਨਾਮ ਤੋਂ ਬਿਨਾ ਕੋਈ ਭੀ ਚੀਜ਼ ਏਥੋਂ ਨਾਲ ਨਹੀਂ ਜਾਂਦੀ ॥੧॥ ਤੁੰਮਾ ਵੇਖਣ ਨੂੰ ਮੈਨੂੰ ਸੋਹਣਾ ਦਿੱਸਿਆ। ਕੀ ਇਹ ਉਕਾਈ ਲੱਗ ਗਈ ? ਇਸ ਦਾ ਤਾਂ ਅੱਧੀ ਕੌਡੀ ਭੀ ਮੁੱਲ ਨਹੀਂ ਮਿਲਦਾ। ਹੇ ਨਾਨਕ ਜੀ! (ਇਹੀ ਹਾਲ ਮਾਇਆ ਦਾ ਹੈ, ਜੀਵ ਦੇ ਭਾ ਦੀ ਤਾਂ ਇਹ ਭੀ ਕੌਡੀ ਮੁੱਲ ਦੀ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੀ ਕਿਉਂਕਿ ਏਥੋਂ ਤੁਰਨ ਵੇਲੇ) ਇਹ ਮਾਇਆ ਜੀਵ ਦੇ ਨਾਲ ਨਹੀਂ ਜਾਂਦੀ ॥੨॥ ਉਸ ਮਾਇਆ ਨੂੰ ਇਕੱਠੀ ਕਰਨ ਦਾ ਕੀ ਲਾਭ, ਜੋ (ਜਗਤ ਤੋਂ ਤੁਰਨ ਵੇਲੇ) ਨਾਲ ਨਹੀਂ ਜਾਂਦੀ, ਜਿਸ ਤੋਂ ਆਖ਼ਰ ਵਿਛੁੜ ਹੀ ਜਾਣਾ ਹੈ, ਉਸ ਦੀ ਖ਼ਾਤਰ ਦੱਸੋ ਕੀਹ ਜਤਨ ਕਰਨਾ ਹੋਇਆ ? ਪ੍ਰਭੂ ਨੂੰ ਵਿਸਾਰਿਆਂ (ਨਿਰੀ ਮਾਇਆ ਨਾਲ) ਰੱਜੀਦਾ ਭੀ ਨਹੀਂ ਤੇ ਨਾਹ ਹੀ ਮਨ ਪ੍ਰਸੰਨ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਪਰਮਾਤਮਾ ਨੂੰ ਛੱਡ ਕੇ ਜੇ ਮਨ ਹੋਰ ਪਾਸੇ ਲਗਾਇਆਂ ਨਰਕ ਵਿੱਚ ਸਮਾਈਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਪ੍ਰਭੂ! ਕਿਰਪਾ ਕਰ, ਦਇਆ ਕਰ, ਨਾਨਕ ਦਾ ਸਹਿਮ ਦੂਰ ਕਰ ਦੇਹ ॥੧੦॥



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अंग : 708
सलोक ॥ राज कपटं रूप कपटं धन कपटं कुल गरबतह ॥ संचंति बिखिआ छलं छिद्रं नानक बिनु हरि संगि न चालते ॥१॥ पेखंदड़ो की भुलु तुमा दिसमु सोहणा ॥ अढु न लहंदड़ो मुलु नानक साथि न जुलई माइआ ॥२॥ पउड़ी ॥ चलदिआ नालि न चलै सो किउ संजीऐ ॥ तिस का कहु किआ जतनु जिस ते वंजीऐ ॥ हरि बिसरिऐ किउ त्रिपतावै ना मनु रंजीऐ ॥ प्रभू छोडि अन लागै नरकि समंजीऐ ॥ होहु क्रिपाल दइआल नानक भउ भंजीऐ ॥१०॥
अर्थ: हे नानक जी! यह राज रूप धन और (ऊँची) कुल का अभिमान-सब छल-रूप है। जीव छल कर के दूसरों पर दोष लगा लगा कर (कई तरीकों से) माया जोड़ते हैं, परन्तु प्रभू के नाम के बिना कोई भी वस्तु यहाँ से साथ नहीं जाती ॥१॥ तुम्मा देखने में तो मुझे सुंदर दिखा। क्या यह ऊकाई लग गई ? इस का तो आधी कोडी भी मुल्य नहीं मिलता। हे नानक जी! (यही हाल माया का है, जीव के लिए तो यह भी कोड़ी मुल्य की नहीं होती क्योंकि यहाँ से चलने के समय) यह माया जीव के साथ नहीं जाती ॥२॥ उस माया को इकट्ठी करने का क्या लाभ, जो (जगत से चलने समय) साथ नहीं जाती, जिस से आखिर विछुड़ ही जाना है, उस की खातिर बताओ क्या यत्न करना हुआ ? प्रभू को भुला हुआ​ (बहुती माया से) तृप्त भी नहीं और ना ही मन प्रसन्न होता है। परमात्मा को छोड़ कर अगर मन अन्य जगह लगाया तो नर्क में समाता है। हे प्रभू! कृपा कर, दया कर, नानक का सहम दूर कर दे ॥१०॥



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अंग : 647
सलोकु मः ३ ॥ परथाइ साखी महा पुरख बोलदे साझी सगल जहानै ॥ गुरमुखि होइ सु भउ करे आपणा आपु पछाणै ॥ गुर परसादी जीवतु मरै ता मन ही ते मनु मानै ॥ जिन कउ मन की परतीति नाही नानक से किआ कथहि गिआनै ॥१॥ मः ३ ॥ गुरमुखि चितु न लाइओ अंति दुखु पहुता आइ ॥ अंदरहु बाहरहु अंधिआं सुधि न काई पाइ ॥ पंडित तिन की बरकती सभु जगतु खाइ जो रते हरि नाइ ॥ जिन गुर कै सबदि सलाहिआ हरि सिउ रहे समाइ ॥ पंडित दूजै भाइ बरकति न होवई ना धनु पलै पाइ ॥ पड़ि थके संतोखु न आइओ अनदिनु जलत विहाइ ॥ कूक पूकार न चुकई ना संसा विचहु जाइ ॥ नानक नाम विहूणिआ मुहि कालै उठि जाइ ॥२॥ पउड़ी ॥ हरि सजण मेलि पिआरे मिलि पंथु दसाई ॥ जो हरि दसे मितु तिसु हउ बलि जाई ॥ गुण साझी तिन सिउ करी हरि नामु धिआई ॥ हरि सेवी पिआरा नित सेवि हरि सुखु पाई ॥ बलिहारी सतिगुर तिसु जिनि सोझी पाई ॥१२॥
अर्थ: महा पुरुख किसी के सम्बन्ध में शिक्षा का बचन बोलते है (पर वेह शिक्षा) सार संसार के लिए बराबर होती हा, जो मनुख सतगुरु के सन्मुख होता है, वह (सुन के) प्रभु का डर (हिरदय में धारण) करता है, और अपने आप की खोह करता है। सतगुरु की कृपा से वह संसार में रहता हुआ माया से दूर रहता है, तो उसका मन अपने आप में रहता है (बहार भटकने से हट जाता है)। हे नानक! जिनका मन पसीजा नहीं, उनको ज्ञान की बातें करने का कोई लाभ नहीं होता।१। हे पंडित! जिन मनुष्यों ने सतिगुरू के सन्मुख हो के (हरी में) मन नहीं जोड़ा, उन्हें आखिर दुख ही होता है। उन अंदर व बाहर के अंधों को कोई समझ नहीं आती। (पर) हे पंडित! जो मनुष्य हरी के नाम में रंगे हुए हैं, जिन्होंने सतिगुरू के शबद के द्वारा सिफत सालाह की है और हरी में लीन हैं, उनकी कमाई की बरकति सारा संसार खाता है। हे पण्डित! माया के मोह में (फसे रहने से) बरकति नहीं हो सकती (आत्मिक जीवन फलता-फूलता नहीं) और ना ही नाम-धन मिलता है; पढ़-पढ़ के थक जाते हैं, पर संतोष नहीं आता और हर वक्त (उम्र) जलते हुए गुजरती है; उनकी गिला-गुजारिश खत्म नहीं होती और मन में से चिंता नहीं जाती। हे नानक! नाम से वंचित रहने के कारण मनुष्य काला मुँह ले के ही (संसार से) उठ जाता है।2। हे प्यारे हरी! मुझे गुरमुख मिला, जिनको मिल के मैं तेरा राह पूछूँ। जो मनुष्य मुझे हरी मित्र (की खबर) बताए, मैं उससे सदके हूँ। उनके साथ मैं गुणों की सांझ डालूँ और हरी का नाम सिमरूँ। मैं सदा प्यारे हरी को सिमरूँ और सिमर के सुख लूँ। मैं सदके हूँ उस सतिगुरू से जिसने (परमात्मा की) समझ बख्शी है।12।



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ਅੰਗ : 647
ਸਲੋਕੁ ਮ: ੩ ॥ ਪਰਥਾਇ ਸਾਖੀ ਮਹਾ ਪੁਰਖ ਬੋਲਦੇ ਸਾਝੀ ਸਗਲ ਜਹਾਨੈ ॥ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਇ ਸੁ ਭਉ ਕਰੇ ਆਪਣਾ ਆਪੁ ਪਛਾਣੈ ॥ ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਜੀਵਤੁ ਮਰੈ ਤਾ ਮਨ ਹੀ ਤੇ ਮਨੁ ਮਾਨੈ ॥ ਜਿਨ ਕਉ ਮਨ ਕੀ ਪਰਤੀਤਿ ਨਾਹੀ ਨਾਨਕ ਸੇ ਕਿਆ ਕਥਹਿ ਗਿਆਨੈ ॥੧॥ ਮਃ ੩ ॥ ਗੁਰਮੁਖਿ ਚਿਤੁ ਨ ਲਾਇਓ ਅੰਤਿ ਦੁਖੁ ਪਹੁਤਾ ਆਇ ॥ ਅੰਦਰਹੁ ਬਾਹਰਹੁ ਅੰਧਿਆਂ ਸੁਧਿ ਨ ਕਾਈ ਪਾਇ ॥ ਪੰਡਿਤ ਤਿਨ ਕੀ ਬਰਕਤੀ ਸਭੁ ਜਗਤੁ ਖਾਇ ਜੋ ਰਤੇ ਹਰਿ ਨਾਇ ॥ ਜਿਨ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸਲਾਹਿਆ ਹਰਿ ਸਿਉ ਰਹੇ ਸਮਾਇ ॥ ਪੰਡਿਤ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਬਰਕਤਿ ਨ ਹੋਵਈ ਨਾ ਧਨੁ ਪਲੈ ਪਾਇ ॥ ਪੜਿ ਥਕੇ ਸੰਤੋਖੁ ਨ ਆਇਓ ਅਨਦਿਨੁ ਜਲਤ ਵਿਹਾਇ ॥ ਕੂਕ ਪੂਕਾਰ ਨ ਚੁਕਈ ਨਾ ਸੰਸਾ ਵਿਚਹੁ ਜਾਇ ॥ ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਵਿਹੂਣਿਆ ਮੁਹਿ ਕਾਲੈ ਉਠਿ ਜਾਇ ॥੨॥ ਪਉੜੀ ॥ ਹਰਿ ਸਜਣ ਮੇਲਿ ਪਿਆਰੇ ਮਿਲਿ ਪੰਥੁ ਦਸਾਈ ॥ ਜੋ ਹਰਿ ਦਸੇ ਮਿਤੁ ਤਿਸੁ ਹਉ ਬਲਿ ਜਾਈ ॥ ਗੁਣ ਸਾਝੀ ਤਿਨ ਸਿਉ ਕਰੀ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈ ॥ ਹਰਿ ਸੇਵੀ ਪਿਆਰਾ ਨਿਤ ਸੇਵਿ ਹਰਿ ਸੁਖੁ ਪਾਈ ॥ ਬਲਿਹਾਰੀ ਸਤਿਗੁਰ ਤਿਸੁ ਜਿਨਿ ਸੋਝੀ ਪਾਈ ॥੧੨॥
ਅਰਥ: ਮਹਾਂ ਪੁਰਖ ਕਿਸੇ ਦੇ ਸੰਬੰਧ ਵਿਚ ਸਿੱਖਿਆ ਦਾ ਬਚਨ ਬੋਲਦੇ ਹਨ (ਪਰ ਉਹ ਸਿੱਖਿਆ) ਸਾਰੇ ਸੰਸਾਰ ਲਈ ਸਾਂਝੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ, ਜੋ ਮਨੁੱਖ ਸਤਿਗੁਰੂ ਦੇ ਸਨਮੁਖ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਉਹ (ਸੁਣ ਕੇ) ਪ੍ਰਭੂ ਦਾ ਡਰ (ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਧਾਰਨ) ਕਰਦਾ ਹੈ, ਤੇ ਆਪਣੇ ਆਪ ਦੀ ਖੋਜ ਕਰਦਾ ਹੈ। ਸਤਿਗੁਰੂ ਦੀ ਕਿਰਪਾ ਨਾਲ ਉਹ ਸੰਸਾਰ ਵਿਚ ਵਰਤਦਾ ਹੋਇਆ ਹੀ ਮਾਇਆ ਵਲੋਂ ਉਦਾਸ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ, ਤਾਂ ਉਸ ਦਾ ਮਨ ਆਪਣੇ ਆਪ ਵਿਚ ਪਤੀਜ ਜਾਂਦਾ ਹੈ (ਬਾਹਰ ਭਟਕਣੋਂ ਹਟ ਜਾਂਦਾ ਹੈ)। ਹੇ ਨਾਨਕ! ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਮਨ ਪਤੀਜਿਆ ਨਹੀਂ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਗਿਆਨ ਦੀਆਂ ਗੱਲਾਂ ਕਰਨ ਦਾ ਕੋਈ ਲਾਭ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ।੧। ਹੇ ਪੰਡਿਤ! ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਮਨੁੱਖਾਂ ਨੇ ਸਤਿਗੁਰੂ ਦੇ ਸਨਮੁਖ ਹੋ ਕੇ (ਹਰੀ ਵਿਚ) ਮਨ ਨਹੀਂ ਜੋੜਿਆ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਆਖ਼ਰ ਦੁੱਖ ਵਾਪਰਦਾ ਹੈ; ਉਹਨਾਂ ਅੰਦਰੋਂ ਤੇ ਬਾਹਰੋਂ ਅੰਨਿ੍ਹਆਂ ਨੂੰ ਕੋਈ ਸਮਝ ਨਹੀਂ ਆਉਂਦੀ। (ਪਰ) ਹੇ ਪੰਡਿਤ! ਜੋ ਮਨੁੱਖ ਹਰੀ ਦੇ ਨਾਮ ਵਿਚ ਰੱਤੇ ਹੋਏ ਹਨ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਸਤਿਗੁਰੂ ਦੇ ਸ਼ਬਦ ਦੀ ਰਾਹੀਂ ਸਿਫ਼ਤਿ-ਸਾਲਾਹ ਕੀਤੀ ਹੈ ਤੇ ਹਰੀ ਵਿੱਚ ਲੀਨ ਹਨ, ਉਹਨਾਂ ਦੀ ਕਮਾਈ ਦੀ ਬਰਕਤਿ ਸਾਰਾ ਸੰਸਾਰ ਖਾਂਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਪੰਡਿਤ! ਮਾਇਆ ਦੇ ਮੋਹ ਵਿਚ (ਫਸੇ ਰਿਹਾਂ) ਬਰਕਤਿ ਨਹੀਂ ਹੋ ਸਕਦੀ (ਆਤਮਿਕ ਜੀਵਨ ਵਧਦਾ-ਫੁਲਦਾ ਨਹੀਂ) ਤੇ ਨਾਹ ਹੀ ਨਾਮ-ਧਨ ਮਿਲਦਾ ਹੈ; ਪੜ੍ਹ ਕੇ ਥੱਕ ਜਾਂਦੇ ਹਨ, ਪਰ ਸੰਤੋਖ ਨਹੀਂ ਆਉਂਦਾ ਤੇ ਹਰ ਵੇਲੇ (ਉਮਰ) ਸੜਦਿਆਂ ਹੀ ਗੁਜ਼ਰਦੀ ਹੈ; ਉਹਨਾਂ ਦੀ ਗਿਲਾ-ਗੁਜ਼ਾਰੀ ਮੁੱਕਦੀ ਨਹੀਂ ਤੇ ਮਨ ਵਿਚੋਂ ਚਿੰਤਾ ਨਹੀਂ ਜਾਂਦੀ। ਹੇ ਨਾਨਕ! ਨਾਮ ਤੋਂ ਸੱਖਣਾ ਰਹਿਣ ਕਰਕੇ ਮਨੁੱਖ ਕਾਲੇ-ਮੂੰਹ ਹੀ (ਸੰਸਾਰ ਤੋਂ) ਉੱਠ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।੨। ਹੇ ਪਿਆਰੇ ਹਰੀ! ਮੈਨੂੰ ਗੁਰਮੁਖ ਮਿਲਾ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਮਿਲ ਕੇ ਮੈਂ ਤੇਰਾ ਰਾਹ ਪੁੱਛਾਂ। ਜੋ ਮਨੁੱਖ ਮੈਨੂੰ ਹਰੀ ਮਿਤ੍ਰ (ਦੀ ਖ਼ਬਰ) ਦੱਸੇ, ਮੈਂ ਉਸ ਤੋਂ ਸਦਕੇ ਹਾਂ। ਉਹਨਾਂ ਨਾਲ ਮੈਂ ਗੁਣਾਂ ਦੀ ਭਿਆਲੀ ਪਾਵਾਂ ਤੇ ਹਰੀ-ਨਾਮ ਸਿਮਰਾਂ। ਮੈਂ ਸਦਾ ਪਿਆਰਾ ਹਰੀ ਸਿਮਰਾਂ ਤੇ ਸਿਮਰ ਕੇ ਸੁਖ ਲਵਾਂ। ਮੈਂ ਸਦਕੇ ਹਾਂ ਉਸ ਸਤਿਗੁਰੂ ਤੋਂ, ਜਿਸ ਨੇ (ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੀ) ਸਮਝ ਬਖ਼ਸ਼ੀ ਹੈ।੧੨।



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Dalbir Singh : 🙏🙏🌺🌸🌼ਹੇ ਅਕਾਲ ਪੁਰਖ ਵਾਹਿਗੁਰੂ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਸਾਨੂੰ ਨਾਮ ਸਿਮਰਨ ਵਾਲਿਆਂ ਦੀ ਸੰਗਤ ਬਖਸੋ ਜੀ 🌼🌸🌺🙏🙏
Surpreet Kaur : ਵਾਹਿਗੁਰੂ ਜੀ 🙏ਮਿਹਰ ਕਰੋ 🙏🙏



ਅੰਗ : 709
ਸਲੋਕ ॥ ਸੰਤ ਉਧਰਣ ਦਇਆਲੰ ਆਸਰੰ ਗੋਪਾਲ ਕੀਰਤਨਹ ॥ ਨਿਰਮਲੰ ਸੰਤ ਸੰਗੇਣ ਓਟ ਨਾਨਕ ਪਰਮੇਸੁਰਹ ॥੧॥ ਚੰਦਨ ਚੰਦੁ ਨ ਸਰਦ ਰੁਤਿ ਮੂਲਿ ਨ ਮਿਟਈ ਘਾਂਮ ॥ ਸੀਤਲੁ ਥੀਵੈ ਨਾਨਕਾ ਜਪੰਦੜੋ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ॥੨॥ ਪਉੜੀ ॥ ਚਰਨ ਕਮਲ ਕੀ ਓਟ ਉਧਰੇ ਸਗਲ ਜਨ ॥ ਸੁਣਿ ਪਰਤਾਪੁ ਗੋਵਿੰਦ ਨਿਰਭਉ ਭਏ ਮਨ ॥ ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ਮੂਲਿ ਸੰਚਿਆ ਨਾਮੁ ਧਨ ॥ ਸੰਤ ਜਨਾ ਸਿਉ ਸੰਗੁ ਪਾਈਐ ਵਡੈ ਪੁਨ ॥ ਆਠ ਪਹਰ ਹਰਿ ਧਿਆਇ ਹਰਿ ਜਸੁ ਨਿਤ ਸੁਨ ॥੧੭॥
ਅਰਥ: ਸਲੋਕ ॥ ਜੋ ਸੰਤ ਜਨ ਗੋਪਾਲ-ਪ੍ਰਭੂ ਦੇ ਕੀਰਤਨ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਜੀਵਨ ਦਾ ਸਹਾਰਾ ਬਣਾ ਲੈਂਦੇ ਹਨ, ਦਿਆਲ ਪ੍ਰਭੂ ਉਹਨਾਂ ਸੰਤਾਂ ਨੂੰ (ਮਾਇਆ ਦੀ ਤਪਸ਼ ਤੋਂ) ਬਚਾ ਲੈਂਦਾ ਹੈ, ਉਹਨਾਂ ਸੰਤਾਂ ਦੀ ਸੰਗਤਿ ਕੀਤਿਆਂ ਪਵਿਤ੍ਰ ਹੋ ਜਾਈਦਾ ਹੈ । ਹੇ ਨਾਨਕ! (ਤੂੰ ਭੀ ਅਜੇਹੇ ਗੁਰਮੁਖਾਂ ਦੀ ਸੰਗਤਿ ਵਿਚ ਰਹਿ ਕੇ) ਪਰਮੇਸਰ ਦਾ ਪੱਲਾ ਫੜ ।੧। ਭਾਵੇਂ ਚੰਦਨ (ਦਾ ਲੇਪ ਕੀਤਾ) ਹੋਵੇ ਚਾਹੇ ਚੰਦ੍ਰਮਾ (ਦੀ ਚਾਨਣੀ) ਹੋਵੇ, ਤੇ ਭਾਵੇਂ ਠੰਢੀ ਰੁੱਤ ਹੋਵੇ—ਇਹਨਾਂ ਦੀ ਰਾਹੀਂ ਮਨ ਦੀ ਤਪਸ਼ ਉੱਕਾ ਹੀ ਮਿਟ ਨਹੀਂ ਸਕਦੀ । ਹੇ ਨਾਨਕ! ਪ੍ਰਭੂ ਦਾ ਨਾਮ ਸਿਮਰਿਆਂ ਹੀ ਮਨੁੱਖ (ਦਾ ਮਨ) ਸ਼ਾਂਤ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ।੨। ਪਉੜੀ ॥ ਪ੍ਰਭੂ ਦੇ ਸੋਹਣੇ ਚਰਨਾਂ ਦਾ ਆਸਰਾ ਲੈ ਕੇ ਸਾਰੇ ਜੀਵ (ਦੁਨੀਆ ਦੀ ਤਪਸ਼ ਤੋਂ) ਬਚ ਜਾਂਦੇ ਹਨ । ਗੋਬਿੰਦ ਦੀ ਵਡਿਆਈ ਸੁਣ ਕੇ (ਬੰਦਗੀ ਵਾਲਿਆਂ ਦੇ) ਮਨ ਨਿਡਰ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਹਨ । ਉਹ ਪ੍ਰਭੂ ਦਾ ਨਾਮ-ਧਨ ਇਕੱਠਾ ਕਰਦੇ ਹਨ ਤੇ ਉਸ ਧਨ ਵਿਚ ਕਦੇ ਘਾਟਾ ਨਹੀਂ ਪੈਂਦਾ । ਅਜੇਹੇ ਗੁਰਮੁਖਾਂ ਦੀ ਸੰਗਤਿ ਬੜੇ ਭਾਗਾਂ ਨਾਲ ਮਿਲਦੀ ਹੈ, ਇਹ ਸੰਤ ਜਨ ਅੱਠੇ ਪਹਿਰ ਪ੍ਰਭੂ ਨੂੰ ਸਿਮਰਦੇ ਹਨ ਤੇ ਸਦਾ ਪ੍ਰਭੂ ਦਾ ਜਸ ਸੁਣਦੇ ਹਨ ।੧੭।



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अंग : 709
सलोक ॥ संत उधरण दइआलं आसरं गोपाल कीरतनह ॥ निरमलं संत संगेण ओट नानक परमेसुरह ॥१॥ चंदन चंदु न सरद रुति मूलि न मिटई घांम ॥ सीतलु थीवै नानका जपंदड़ो हरि नामु ॥२॥ पउड़ी ॥ चरन कमल की ओट उधरे सगल जन ॥ सुणि परतापु गोविंद निरभउ भए मन ॥ तोटि न आवै मूलि संचिआ नामु धन ॥ संत जना सिउ संगु पाईऐ वडै पुन ॥ आठ पहर हरि धिआइ हरि जसु नित सुन ॥१७॥
अर्थ: जो संत जन गोपाल प्रभू के कीर्तन को अपने जीवन का सहारा बना लेते हैं, दयाल प्रभू उन संतों को (माया की तपस से) बचा लेता है, उन संतों की संगति करने से पवित्र हो जाते हैं। हे नानक! (तू भी ऐसे गुरमुखों की संगति में रह के) परमेश्वर का पल्ला पकड़।1। चाहे चंदन (का लेप किया) हो चाहे चंद्रमा (की चाँदनी) हो, और चाहे ठंडी ऋतु हो – इनसे मन की तपस बिल्कुल भी समाप्त नहीं हो सकती। हे नानक! प्रभू का नाम सिमरने से ही मनुष्य (का मन) शांत होता है।2। प्रभू के सुंदर चरणों का आसरा ले के सारे जीव (दुनिया की तपस से) बच जाते हैं। गोबिंद की महिमा सुन के (बँदगी वालों के) मन निडर हो जाते हैं। वे प्रभू का नाम-धन इकट्ठा करते हैं और उस धन में कभी घाटा नहीं पड़ता। ऐसे गुरमुखों की संगति बड़े भाग्यों से मिलती है, ये संत जन आठों पहर प्रभू को सिमरते हैं और सदा प्रभू का यश सुनते हैं।17।



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ਅੰਗ : 656
ਰਾਗੁ ਸੋਰਠਿ ਬਾਣੀ ਭਗਤ ਕਬੀਰ ਜੀ ਕੀ ਘਰੁ ੧ ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥ ਸੰਤਹੁ ਮਨ ਪਵਨੈ ਸੁਖੁ ਬਨਿਆ ॥ ਕਿਛੁ ਜੋਗੁ ਪਰਾਪਤਿ ਗਨਿਆ ॥ ਰਹਾਉ ॥ ਗੁਰਿ ਦਿਖਲਾਈ ਮੋਰੀ ॥ ਜਿਤੁ ਮਿਰਗ ਪੜਤ ਹੈ ਚੋਰੀ ॥ ਮੂੰਦਿ ਲੀਏ ਦਰਵਾਜੇ ॥ ਬਾਜੀਅਲੇ ਅਨਹਦ ਬਾਜੇ ॥੧॥ ਕੁੰਭ ਕਮਲੁ ਜਲਿ ਭਰਿਆ ॥ ਜਲੁ ਮੇਟਿਆ ਊਭਾ ਕਰਿਆ ॥ ਕਹੁ ਕਬੀਰ ਜਨ ਜਾਨਿਆ ॥ ਜਉ ਜਾਨਿਆ ਤਉ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ॥੨॥੧੦॥
ਅਰਥ: ਰਾਗ ਸੋਰਠਿ, ਘਰ ੧ ਵਿੱਚ ਭਗਤ ਕਬੀਰ ਜੀ ਦੀ ਬਾਣੀ। ਅਕਾਲ ਪੁਰਖ ਇੱਕ ਹੈ ਅਤੇ ਸਤਿਗੁਰੂ ਦੀ ਕਿਰਪਾ ਨਾਲ ਮਿਲਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਸੰਤ ਜਨੋ! (ਮੇਰੇ) ਪਉਣ (ਵਰਗੇ ਚੰਚਲ) ਮਨ ਨੂੰ (ਹੁਣ) ਸੁਖ ਮਿਲ ਗਿਆ ਹੈ, (ਹੁਣ ਇਹ ਮਨ ਪ੍ਰਭੂ ਦਾ ਮਿਲਾਪ) ਹਾਸਲ ਕਰਨ ਜੋਗਾ ਥੋੜਾ ਬਹੁਤ ਸਮਝਿਆ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ ॥ ਰਹਾਉ ॥ (ਕਿਉਂਕਿ) ਸਤਿਗੁਰੂ ਨੇ (ਮੈਨੂੰ ਮੇਰੀ ਉਹ) ਕਮਜ਼ੋਰੀ ਵਿਖਾ ਦਿੱਤੀ ਹੈ, ਜਿਸ ਕਰਕੇ (ਕਾਮਾਦਿਕ) ਪਸ਼ੂ ਅਡੋਲ ਹੀ (ਮੈਨੂੰ) ਆ ਦਬਾਉਂਦੇ ਸਨ। (ਸੋ, ਮੈਂ ਗੁਰੂ ਦੀ ਮਿਹਰ ਨਾਲ ਸਰੀਰ ਦੇ) ਦਰਵਾਜ਼ੇ (ਗਿਆਨ-ਇੰਦ੍ਰੇ: ਪਰ ਨਿੰਦਾ, ਪਰ ਤਨ, ਪਰ ਧਨ ਆਦਿਕ ਵਲੋਂ) ਬੰਦ ਕਰ ਲਏ ਹਨ, ਤੇ (ਮੇਰੇ ਅੰਦਰ ਪ੍ਰਭੂ ਦੀ ਸਿਫ਼ਤ-ਸਾਲਾਹ ਦੇ) ਵਾਜੇ ਇੱਕ-ਰਸ ਵੱਜਣ ਲੱਗ ਪਏ ਹਨ ॥੧॥ (ਮੇਰਾ) ਹਿਰਦਾ-ਕਮਲ ਰੂਪ ਘੜਾ (ਪਹਿਲਾਂ ਵਿਕਾਰਾਂ ਦੇ) ਪਾਣੀ ਨਾਲ ਭਰਿਆ ਹੋਇਆ ਸੀ, (ਹੁਣ ਗੁਰੂ ਦੀ ਬਰਕਤਿ ਨਾਲ ਮੈਂ ਉਹ) ਪਾਣੀ ਡੋਲ੍ਹ ਦਿੱਤਾ ਹੈ ਤੇ (ਹਿਰਦੇ ਨੂੰ) ਉੱਚਾ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਹੈ। ਕਬੀਰ ਜੀ ਆਖਦੇ ਹਨ – (ਹੁਣ) ਮੈਂ ਦਾਸ ਨੇ (ਪ੍ਰਭੂ ਨਾਲ) ਜਾਣ-ਪਛਾਣ ਕਰ ਲਈ ਹੈ, ਤੇ ਜਦੋਂ ਤੋਂ ਇਹ ਸਾਂਝ ਪਾਈ ਹੈ, ਮੇਰਾ ਮਨ (ਉਸ ਪ੍ਰਭੂ ਵਿਚ ਹੀ) ਗਿੱਝ ਗਿਆ ਹੈ ॥੨॥੧੦॥



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SinderPal Singh janagal : wahe guru mehar kre ji Sat shari akal ji




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