अमृत ​​वेले का हुक्मनामा – 29 जुलाई 2026

अंग : 855
बिलावलु ॥ बिदिआ न परउ बादु नही जानउ ॥ हरि गुन कथत सुनत बउरानो ॥१॥ मेरे बाबा मै बउरा सभ खलक सैआनी मै बउरा ॥ मै बिगरिओ बिगरै मति अउरा ॥१॥ रहाउ ॥ आपि न बउरा राम कीओ बउरा ॥ सतिगुरु जारि गइओ भ्रमु मोरा ॥२॥ मै बिगरे अपनी मति खोई ॥ मेरे भरमि भूलउ मति कोई ॥३॥ सो बउरा जो आपु न पछानै ॥ आपु पछानै त एकै जानै ॥४॥ अबहि न माता सु कबहु न माता ॥ कहि कबीर रामै रंगि राता ॥५॥२॥
अर्थ: (बहसों की खातिर) मैं (तुम्हारी तर्क भरी) विद्या नहीं पढ़ता, ना ही मैं (धार्मिक) बहसें करनी जानता हूँ (भाव, आत्मिक जीवन के लिए मैं किसी विद्वता भरी धार्मिक-चर्चा की आवश्यक्ता नहीं समझता)। मैं तो प्रभू की सिफत-सालह करने-सुनने में मस्त रहता हूँ।1। हे प्यारे सज्जन! (लोगों के लिए तो) मैं पागल हूँ। लोग समझदार हैं मैं बवरा हूँ। (लोगों के विचार से) मैं गलत रास्ते पड़ गया हूँ (क्योंकि मैं अपने गुरू के राह पर चल कर प्रभू का भजन करता हूँ), (पर लोग अपना ध्यान रखें, इस) गलत राह पर कोई और ना चले।1। रहाउ। मैं अपने आप (इस प्रकार) बावरा नहीं बना, यह तो मुझे मेरे प्रभू ने (अपनी भक्ति में जोड़ के) पागल कर दिया है, और मेरे गुरू ने मेरा भ्रम-वहम सब जला डाले हैं।2। (यदि) कुमार्ग पर पड़े हुए ने अपनी बुद्धि गवा ली है (तो भला लोगों को क्यों मेरा इतना फिक्र है?) तो कोई और मेरे वाले इस भुलेखे में बेशक ना पड़े।3। (पर लोगों को ये भुलेखा है कि प्रभू की भक्ति करने वाला आदमी पागल होता है। जबकि दरअसल) पागल वह सख्श है जो अपनी अस्लियत को नहीं पहचानता। जो अपने आप को पहचानता है वह हर जगह एक परमात्मा को बसता जानता है।4। कबीर कहता है- परमात्मा के प्यार में रंग के जो मनुष्य इस जीवन में दीवाना नहीं बनता, उसने (फिर) कभी भी नहीं बनना (और वह जीवन व्यर्थ गवा के जाएगा)।5।2।

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