संधिआ ​​वेले का हुक्मनामा – 07 जून 2026

अंग : 659
रागु सोरठि बाणी भगत भीखन की ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ ऐसा नामु रतनु निरमोलकु पुंनि पदारथु पाइआ ॥ अनिक जतन करि हिरदै राखिआ रतनु न छपै छपाइआ ॥१॥ हरि गुन कहते कहनु न जाई ॥ जैसे गूंगे की मिठिआई ॥१॥ रहाउ ॥ रसना रमत सुनत सुखु स्रवना चित चेते सुखु होई ॥ कहु भीखन दुइ नैन संतोखे जह देखां तह सोई ॥२॥२॥
अर्थ: परमात्मा का नाम एक ऐसा अमूल्य पदार्थ है जो भाग्यों से मिलता है। इस रत्न को अनेकों यत्न करके भी हृदय में (गुप्त) रखें, तो भी छुपाए नहीं छुपता।1। (वैसे वह स्वाद) बताया नहीं जा सकता (जो) परमात्मा के गुण गाने से (आता है), जैसे गूँगे मनुष्य द्वारा खाई हुई मिठाई (का स्वाद किसी और को नहीं पता लग सकता, गूँगा बता नहीं सकता)।1। रहाउ। (ये नाम-रत्न) जपते हुए जीभ को सुख मिलता है, सुनते हुए कानों को सुख मिलता है, और याद करते हुए चिक्त को सुख मिलता है। हे भीखन! (तू भी) कह– (ये नाम सिमरते हुए) मेरी दोनों आँखों में (ऐसी) ठंढ पड़ गई है कि मैं जिधर देखता हूँ उस परमात्मा को ही देखता हूँ।2।2।

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