अमृत ​​वेले का हुक्मनामा – 15 मार्च 2026

अंग : 813
बिलावलु महला ५ ॥ महा तपति ते भई सांति परसत पाप नाठे ॥ अंध कूप महि गलत थे काढे दे हाथे ॥१॥ ओइ हमारे साजना हम उन की रेन ॥ जिन भेटत होवत सुखी जीअ दानु देन ॥१॥ रहाउ ॥ परा पूरबला लीखिआ मिलिआ अब आइ ॥ बसत संगि हरि साध कै पूरन आसाइ ॥२॥
अर्थ: हे भाई! (उन संत जनों के पाँव) परसने से सारे पाप नास हो जाते हैं, मन में विकारों की भरी तपिश से शांति बन जाती है। जो मनुख (विकारों पापों के) घने अँधेरे कुएं में गल-सड़ रहे होते हैं, उनको (वह संत-जन अपना) हाथ दे के (उस कुएँ से) निकाल लेते हैं।१। हे भाई! जिन को मिलकर (मेरा मन) आनंद से भरपूर हो जाता है, जो (मुझे आत्मिक जीवन की दात देते हैं, वह (संत-जन ही) मेरे (असली) मित्र हैं, मैं उनके चरणों की धुल (चाहता) हूँ।१।रहाउ। हे भाई! इस मनुख जनम में (जब किसी मनुख को कोई संत-जन मिल जाता है, तो) बड़े पूर्व जन्म के उसके मस्तक पर लिखे लेख उभर आते है। प्रभु के सेवक-जन की सांगत में बसते हुए (उस मनुख की सारी आशाएं पूरी हो जाती हैं।२।

Share On Whatsapp


Leave a Reply