अंग : 543
बिहागड़ा महला ५ ॥
करि किरपा गुर पारब्रहम पूरे अनदिनु नामु वखाणा राम ॥ अम्रित बाणी उचरा हरि जसु मिठा लागै तेरा भाणा राम ॥ करि दइआ मइआ गोपाल गोबिंद कोइ नाही तुझ बिना ॥ समरथ अगथ अपार पूरन जीउ तनु धनु तुम्ह मना ॥ मूरख मुगध अनाथ चंचल बलहीन नीच अजाणा ॥ बिनवंति नानक सरणि तेरी रखि लेहु आवण जाणा ॥१॥ साधह सरणी पाईऐ हरि जीउ गुण गावह हरि नीता राम ॥ धूरि भगतन की मनि तनि लगउ हरि जीउ सभ पतित पुनीता राम ॥ पतिता पुनीता होहि तिन्ह संगि जिन्ह बिधाता पाइआ ॥ नाम राते जीअ दाते नित देहि चड़हि सवाइआ ॥ रिधि सिधि नव निधि हरि जपि जिनी आतमु जीता ॥ बिनवंति नानकु वडभागि पाईअहि साध साजन मीता ॥२॥ जिनी सचु वणंजिआ हरि जीउ से पूरे साहा राम ॥ बहुतु खजाना तिंन पहि हरि जीउ हरि कीरतनु लाहा राम ॥ कामु क्रोधु न लोभु बिआपै जो जन प्रभ सिउ रातिआ ॥ एकु जानहि एकु मानहि राम कै रंगि मातिआ ॥ लगि संत चरणी पड़े सरणी मनि तिना ओमाहा ॥ बिनवंति नानकु जिन नामु पलै सेई सचे साहा ॥३॥ नानक सोई सिमरीऐ हरि जीउ जा की कल धारी राम ॥ गुरमुखि मनहु न वीसरै हरि जीउ करता पुरखु मुरारी राम ॥ दूखु रोगु न भउ बिआपै जिन्ही हरि हरि धिआइआ ॥ संत प्रसादि तरे भवजलु पूरबि लिखिआ पाइआ ॥ वजी वधाई मनि सांति आई मिलिआ पुरखु अपारी ॥ बिनवंति नानकु सिमरि हरि हरि इछ पुंनी हमारी ॥४॥३॥
अर्थ: हे सबसे महान! हे सर्वगुणों से परिपूर्ण प्रभु! (मुझ पर) कृपा कर कि मैं हर समय तेरा नाम सिमरन करता रहूँ, आत्मिक जीवन देने वाली तेरी वाणी का उच्चारण करता रहूँ, तेरी स्तुति-प्रशंसा के गीत गाता रहूँ, और मुझे तेरी रज़ा मधुर लगती रहे।
हे गोपाल! हे गोविंद! (मुझ पर) दया कर, करुणा कर, तेरे बिना मेरा कोई और सहारा नहीं है।
हे समस्त शक्तियों के स्वामी! हे अकथ! हे अनंत! यह मेरी जान, मेरा मन, यह शरीर और यह धन—सब कुछ तेरा ही दिया हुआ है।
नानक विनती करता है—हे प्रभु! मैं मूर्ख हूँ, बहुत मूर्ख हूँ, बेसहारा हूँ, चंचल, दुर्बल, नीच और अज्ञानी हूँ। मैं तेरी शरण में आया हूँ। मुझे जन्म-मरण के चक्र से बचा ले। ॥1॥
(हे भाई!) गुरमुखों की शरण पड़ने से परमात्मा मिल जाता है और हम सदा परमात्मा के गुण गा सकते हैं।
हे प्रभु जी! कृपा कर कि तेरे भक्त जनों के चरणों की धूल मेरे मन में और मेरे मस्तक पर लगी रहे। (भक्तों के चरणों की धूल की बरकत से) विकारों में गिरे हुए मनुष्य भी पवित्र हो जाते हैं।
जिन मनुष्यों ने करतार को पा लिया है, उनकी संगति में विकारी व्यक्ति भी पवित्र जीवन वाले बन जाते हैं।
परमात्मा के नाम-रंग में रंगे हुए मनुष्य आत्मिक जीवन की दातें देने योग्य हो जाते हैं; वे ये दातें निरंतर देते रहते हैं और ये बढ़ती ही रहती हैं।
जिन मनुष्यों ने परमात्मा का नाम जपकर अपने मन को वश में कर लिया, उन्हें सारी करामाती शक्तियाँ और संसार के नौ ही खज़ाने प्राप्त हो जाते हैं।
हे भाई! नानक विनती करता है कि गुरमुख सज्जन-मित्र बड़ी किस्मत से ही मिलते हैं। ॥2॥
जिन मनुष्यों ने सदा स्थिर रहने वाले हरि-नाम का व्यापार किया है, वे भरे भंडारों वाले साहूकार हैं। उनके पास हरि-नाम का अपार खज़ाना है। वे इस व्यापार में परमात्मा की स्तुति-प्रशंसा की कमाई करते हैं।
जो मनुष्य परमात्मा में रमे रहते हैं, उन पर न काम, न क्रोध, न लोभ—कोई भी अपना ज़ोर नहीं चला सकता। वे केवल एक परमात्मा से ही गहरी प्रीत जोड़ते हैं, उसी को सच्चा साथी मानते हैं और उसके प्रेम-रंग में मस्त रहते हैं।
वे गुरु के चरणों में लगकर परमात्मा की शरण में रहते हैं और उनके मन में प्रभु-मिलन की उमंग बनी रहती है।
नानक विनती करता है—जिनके पास परमात्मा का नाम-धन है, वही सदा के लिए स्थिर साहूकार बने रहते हैं। ॥3॥
हे नानक! सदा उसी परमात्मा का सिमरण करना चाहिए जिसकी सत्ता सारे संसार में कार्य कर रही है।
गुरु की शरण पड़ने से सर्वव्यापक करतार प्रभु मन से कभी नहीं भूलता।
जिन मनुष्यों ने निरंतर परमात्मा का सिमरण किया है, उन पर न कोई रोग, न कोई दुख, न कोई भय अपना प्रभाव डाल सकता है।
गुरु की कृपा से उन्होंने इस संसार-समुद्र को पार कर लिया और पूर्व जन्मों की कमाई के अनुसार उनके मस्तक पर भक्ति का लिखा लेख उन्हें प्राप्त हो गया।
उनके भीतर चढ़दी कला प्रबल हो गई, उनके मन में शांति आ गई और उन्हें वह अनंत प्रभु मिल गया।
नानक विनती करता है—परमात्मा का नाम सिमर-सिमर कर मेरी भी प्रभु-मिलन की चिरकालिक आशा पूरी हो गई है। ॥4॥3॥