अमृत ​​वेले का हुक्मनामा – 30 नवंबर 2025

अंग : 474
सलोकु महला २ ॥ चाकरु लगै चाकरी नाले गारबु वादु ॥ गला करे घणेरीआ खसम न पाए सादु ॥ आपु गवाइ सेवा करे ता किछु पाए मानु ॥ नानक जिस नो लगा तिसु मिलै लगा सो परवानु ॥१॥ महला २ ॥ जो जीइ होइ सु उगवै मुह का कहिआ वाउ ॥ बीजे बिखु मंगै अंम्रितु वेखहु एहु निआउ ॥२॥ महला २ ॥ नालि इआणे दोसती कदे न आवै रासि ॥ जेहा जाणै तेहो वरतै वेखहु को निरजासि ॥ वसतू अंदरि वसतु समावै दूजी होवै पासि ॥ साहिब सेती हुकमु न चलै कही बणै अरदासि ॥ कूड़ि कमाणै कूड़ो होवै नानक सिफति विगासि ॥३॥ महला २ ॥ नालि इआणे दोसती वडारू सिउ नेहु ॥ पाणी अंदरि लीक जिउ तिस दा थाउ न थेहु ॥४॥ महला २ ॥ होइ इआणा करे कमु आणि न सकै रासि ॥ जे इक अध चंगी करे दूजी भी वेरासि ॥५॥ पउड़ी ॥ चाकरु लगै चाकरी जे चलै खसमै भाइ ॥ हुरमति तिस नो अगली ओहु वजहु भि दूणा खाइ ॥ खसमै करे बराबरी फिरि गैरति अंदरि पाइ ॥ वजहु गवाए अगला मुहे मुहि पाणा खाइ ॥ जिस दा दिता खावणा तिसु कहीऐ साबासि ॥ नानक हुकमु न चलई नालि खसम चलै अरदासि ॥२२॥
अर्थ: जो कोई नौकर अपने स्वामी की नौकरी भी करे, और उसके साथ के साथ अपने स्वामी के आगे अकड़ की बाते भी करता जाए और इस प्रकार की बाहरली बातें स्वामी के सामने करे, तो वह नौकर स्वामी की खुशी हासिल नहीं कर सकता। मनुख अपना आप मिटा के (स्वामी की) सेवा करे तो ही उस को (स्वामी के दर से) कुछ आदर मिलता है, तो ही, हे नानक ! वह मनुख अपने उस स्वामी को मिल सकता है जिस की सेवा में लगा हुआ है। (अपना आप गँवा के सेवा में) लगा हुआ मनुख ही (स्वामी के दर पर) कबूल होता है।1। जो कुछ मनुख के दिल में होता है, वही प्रकट होता है, (भावार्थ, जैसी मनुख की नीयत होती है, वैसा ही उस को फल लगता है), (अगर अंदर नीयत कुछ ओर हो, तो उस के उलट) मुख से कह देना व्यर्थ है। यह कैसी अचरज की बात है कि मनुख बीजता तो ज़हर है (भावार्थ, नीयत तो विकारों की तरफ है) (पर उस के फल के रूप में) माँगता अमृत है।2।कोई भी मनुष्य परख के देख ले, किसी अंजान से लगाई हुई मित्रता कभी सिरे नहीं चढ़ती, क्योंकि उस अंजान का रवईआ वैसा ही रहता है जैसी उसकी समझ होती है; (इसी तरह उस मूर्ख मन के आगे लगने का कभी कोई लाभ नहीं होता, ये मन अपनी समझ अनुसार विकारों में ही लिए फिरता है)। किसी एक चीज में कोई और चीज तभी पड़ सकती है अगर उसमें से पहली पड़ी हुई चीज निकाल ली जाए; (इस तरह इस मन को प्रभु की तरफ जोड़ने के लिए जरूरी है कि इसका पहला स्वभाव तबदील किया जाए)। पति से हूकम किया हुआ कामयाब नहीं हो सकता, उसके आगे तो विनम्रता ही फबती है। हे नानक! धोखे का काम करने से धोखा ही होता है, (भाव, जितनी देर मनुष्य दुनिया के धंधों में लगा रहता है, तब तक चिन्ता में ही फसा रहता है, मन) प्रभु की महिमा करके ही खिड़ाव में आता है, सही मायने में प्रसन्नता पाता है।3। अंजान से मित्रता व अपने से बड़े के साथ प्यार- ये ऐसे ही हैं जैसे पानी में लकीर, उस लकीर का कोई निशान नहीं रहता।4। अगर कोई अंजान हो और वह कोई काम करे, वह काम सिरे नहीं चढ़ सकता; अगर कोई एक-आध काम वह ठीक कर भी ले तो दूसरे काम को बिगाड़ देगा।5। जो नौकर अपने मालिक की मर्जी के मुताबिक चले (तभी समझो, कि) वह मालिक की नौकरी कर रहा है, एक तो उसे बड़ी इज्जत मिलती है, दूसरा तनख्वाह भी मालिक से दोगुनी लेता है। पर, अगर सेवक अपने मालिक की बराबरी करता है, वह मन में शर्मिंदगी ही उठाता है, अपनी पहली तनख्वाह भी गवा बैठता है और सदा मुंह पर जूतियां खाता है। हे नानक! जिस मालिक का दिया हुआ खाएं, उसकी सदा उपमा करनी चाहिए; मालिक पर हुक्म नहीं किया जा सकता, उसके आगे अर्ज करनी ही फबती है।22।

Share On Whatsapp


Leave a Reply