अमृत ​​वेले का हुक्मनामा – 06 अप्रैल 2026

अंग : 854
सलोक मः ३ ॥ अपणा आपु न पछाणई हरि प्रभु जाता दूरि ॥ गुर की सेवा विसरी किउ मनु रहै हजूरि ॥ मनमुखि जनमु गवाइआ झूठै लालचि कूरि ॥ नानक बखसि मिलाइअनु सचै सबदि हदूरि ॥१॥ मः ३ ॥ हरि प्रभु सचा सोहिला गुरमुखि नामु गोविंदु ॥ अनदिनु नामु सलाहणा हरि जपिआ मनि आनंदु ॥ वडभागी हरि पाइआ पूरनु परमानंदु ॥ जन नानक नामु सलाहिआ बहुड़ि न मनि तनि भंगु ॥२॥ पउड़ी ॥ कोई निंदकु होवै सतिगुरू का फिरि सरणि गुर आवै ॥ पिछले गुनह सतिगुरु बखसि लए सतसंगति नालि रलावै ॥ जिउ मीहि वुठै गलीआ नालिआ टोभिआ का जलु जाइ पवै विचि सुरसरी सुरसरी मिलत पवित्रु पावनु होइ जावै ॥ एह वडिआई सतिगुर निरवैर विचि जितु मिलिऐ तिसना भुख उतरै हरि सांति तड़ आवै ॥ नानक इहु अचरजु देखहु मेरे हरि सचे साह का जि सतिगुरू नो मंनै सु सभनां भावै ॥१३॥१॥ सुधु ॥
अर्थ: (हे भाई! अपने मन के पीछे चलने वाला मनुख) अपने आत्मिक जीवन को (कभी) परखता नहीं, वह परमात्मा को (कहीं) दूर बस्ता समझता है, उस को गुरु के बताये हुए काम (सदा) भूले रहता हैं, (इस लिए उस का) मन (परमात्मा की) हजूरी में (कभी) नहीं टिकता। हे नानक! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुख ने झूठे लालच में (लग के) माया के मोह में (फस के ही अपना) जीवन गवा लिया होता है। जो मनुख सिफत-सलाह वाले गुरु-शब्द के द्वारा (परमात्मा की) हजूरी में टिके रहते हैं, उन को परमात्मा ने कृपा कर के (अपने चरणों में) मिला लिया होता है।१। हे भाई! हरि प्रभु गोविंद सदा कायम रहने वाला है, (उसकी) महिमा का गीत (उसका) नाम गुरु की शरण पड़ने से (मिलता है)। (जिस मनुष्य को हरि-नाम मिलता है, वह) हर वक्त ही नाम स्मरण करता रहता है, और परमात्मा का नाम स्मरण करते हुए (उसके) मन में आत्मिक आनंद बना रहता है। पर, हे भाई! परम-आनंद का मालिक पूर्ण प्रभु परमात्मा बहुत भाग्यों से ही मिलता है। हे नानक! (कह: जिस) दासों ने (परमात्मा का) नाम स्मरण किया, उनके मन में उनके तन में फिर कभी (परमातमा से) दूरी पैदा नहीं होती।२। (अगर) कोई मनुष्य (पहले) गुरु की निंदा करने वाला हो (पर) फिर गुरु की शरण में आ जाए, तो सतिगुरु (उसके) पिछले अवगुण बख्श लेता है और (उसको) साधु-संगत में मिला लेता है। हे भाई! जैसे बरसात होने से गली-नाली-टोभों का पानी (जब) गंगा में जा पड़ता है (और) गंगा में मिलते ही (वह पानी) पूरी तौर से पवित्र हो जाता है, (वैसे ही) निरवैर सतिगुरु में (भी) ये गुण हैं कि उस (गुरु) को मिलने से (मनुष्य को माया की) प्यास (माया की) भूख दूर हो जाती है (और, उसके अंदर) परमात्मा (के मिलाप) की ठंड तुरंत पड़ जाती है। हे नानक! (कह: हे भाई!) सदा कायम रहने वाले शाह परमात्मा का ये आश्चर्यजनक तमाशा देखो कि जो मनुष्य गुरु पर श्रद्धा रखता है वह मनुष्य सभी को प्यारा लगने लग जाता है।१३॥१। सुधु।

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