अंग : 479
आसा ॥
काहू दीन्हे पाट पटंबर काहू पलघ निवारा ॥काहू गरी गोदरी नाही काहू खान परारा ॥१॥अहिरख वादु न कीजै रे मन ॥सुक्रितु करि करि लीजै रे मन ॥१॥ रहाउ ॥कुमह्हारै एक जु माटी गूंधी बहु बिधि बानी लाई ॥काहू महि मोती मुकताहल काहू बिआधि लगाई ॥२॥सूमहि धनु राखन कउ दीआ मुगधु कहै धनु मेरा ॥जम का डंडु मूंड महि लागै खिन महि करै निबेरा ॥३॥हरि जनु ऊतमु भगतु सदावै आगिआ मनि सुखु पाई ॥जो तिसु भावै सति करि मानै भाणा मंनि वसाई ४॥कहै कबीरु सुनहु रे संतहु मेरी मेरी झूठी ॥चिरगट फारि चटारा लै गइओ तरी तागरी छूटी ॥५॥३॥१६॥
अर्थ: आसा ॥
(परमात्मा ने) कई लोगों को रेशम के कपड़े (पहनने के लिए) और नर्म पलंग (सोने के लिए) दिए हैं; पर कुछ (बेचारे) ऐसे भी हैं जिन्हें फटी हुई चादर भी नसीब नहीं होती, और कई घरों में (बिस्तर की जगह) सिर्फ पराली ही होती है। ॥1॥
(पर) हे मन! तू ईर्ष्या और झगड़ा क्यों करता है? नेक कमाई करता जा, तू भी (ये सुख) प्राप्त कर लेगा। ॥1॥ रहाउ॥
कुम्हार ने एक ही मिट्टी को गूंथा और उसे अलग-अलग रंगों में ढाल दिया (अर्थात् अलग-अलग प्रकार के बर्तन बना दिए)। किसी बर्तन में मोती और मोतियों की मालाएँ रख दी गईं, और किसी में (शराब आदि) रोग देने वाली चीज़ें। ॥2॥
लोभी व्यक्ति धन इकट्ठा करने में लगा रहता है, और मूर्ख (लोभी) कहता है—यह धन मेरा है। (पर जब) यमराज का डंडा सिर पर आ पड़ता है, तब एक ही पल में फैसला हो जाता है (कि वास्तव में यह धन किसी का भी नहीं है)। ॥3॥
जो मनुष्य परमात्मा का सेवक बनकर रहता है, वह उसके हुक्म को मानकर सुख पाता है और संसार में सच्चा भक्त कहलाता है (अर्थात् यश प्राप्त करता है)। वह प्रभु की रज़ा को अपने मन में बसाता है और जो प्रभु को भाता है, उसी को सही मानता है। ॥4॥
कबीर जी कहते हैं—हे संत जनो! सुनो, “यह धन-दौलत मेरी है”—यह विचार झूठा है (अर्थात् संसार की वस्तुओं पर अपना अधिकार स्थायी नहीं है)। जैसे यदि पिंजरे को तोड़कर कोई बिल्ली पक्षी को पकड़कर ले जाए, तो (उस पिंजरे में रखी) दाना-पानी वहीं पड़ा रह जाता है; उसी प्रकार मृत्यु आने पर मनुष्य के खाने-पीने के सभी पदार्थ यहीं रह जाते हैं। ॥5॥३॥१६॥