अंग : 721
तिलंग महला १ घरु २ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ भउ तेरा भांग खलड़ी मेरा चीतु ॥ मै देवाना भइआ अतीतु ॥ कर कासा दरसन की भूख ॥ मै दरि मागउ नीता नीत ॥१॥तउ दरसन की करउ समाइ ॥ मै दरि मागतु भीखिआ पाइ ॥१॥ रहाउ ॥केसरि कुसम मिरगमै हरणा सरब सरीरी चड़्हणा ॥ चंदन भगता जोति इनेही सरबे परमलु करणा ॥२॥घिअ पट भांडा कहै न कोइ ॥ ऐसा भगतु वरन महि होइ ॥ तेरै नामि निवे रहे लिव लाइ ॥ नानक तिन दरि भीखिआ पाइ ॥३॥१॥२॥
अर्थ: तिलंग महला १ घरु २ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥हे मालिक ! तेरा डर मेरी भाँग है और मेरा चित इस भॉग को पाने वाला चमड़े का थेलामें डर रूपी भाँग को पीकर दिवाना एवं विरक्त बन गया हूँ।मुझे तेरे दर्शनों की भूख लगी है और मेरे दोनों हाथ तेरे द्वार पर भीख माँगने के खप्पर हैं।मैं नित्य ही तेरे द्वार पर दर्शनों की भीख माँगता रहता हूँ॥ १॥मैं तेरे दर्शन ही माँगता हूँ।मैं भिखारी तेरे द्वार पर हा हूँ, मुझे दर्शनों की भीख दो ॥ १॥ रहाउ॥केसर, फूल, कस्तूरी एवं सोना इत्यादि सबने पर चढ़ना होता है।ऐसी चन्दन जैसी भक्तों में ज्योति बसती है, जो सबको अपनी ज्ञान सुगन्धि देती है॥ २॥घी एवं रेशम को कोई बुरा नहीं कहता। हे प्रभु ! तेरा भक्त भी ऐसा ही होता है कि कोई भी उसे बुरा नहीं कहता चाहे वह ब्राहाण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र किसी भी जाति में से हो।जो तेरे नाम में लीन रहते हैं और तुझ में वृत्ति लगाए रखते हैं नानक की विनती है कि हे मालिक ! उनके द्वार पर अपने दर्शनों की भिक्षा दो ॥ ३ ॥ १॥ २ ॥