अंग : 662
धनासरी महला १ ॥
चोरु सलाहे चीतु न भीजै ॥ जे बदी करे ता तसू न छीजै ॥ चोर की हामा भरे न कोइ ॥ चोरु कीआ चंगा किउ होइ ॥१॥ सुणि मन अंधे कुते कूड़िआर ॥ बिनु बोले बूझीऐ सचिआर ॥१॥ रहाउ ॥ चोरु सुआलिउ चोरु सिआणा ॥ खोटे का मुलु एकु दुगाणा ॥ जे साथि रखीऐ दीजै रलाइ ॥ जा परखीऐ खोटा होइ जाइ ॥२॥ जैसा करे सु तैसा पावै ॥ आपि बीजि आपे ही खावै ॥ जे वडिआईआ आपे खाइ ॥ जेही सुरति तेहै राहि जाइ ॥३॥ जे सउ कूड़ीआ कूड़ु कबाड़ु ॥ भावै सभु आखउ संसारु ॥ तुधु भावै अधी परवाणु ॥ नानक जाणै जाणु सुजाणु ॥४॥४॥६॥
अर्थ: जे कोई चोर (उस हाकम की जिस के सामने उस का मुक्कदमा पेश है) खुश़ामद करे तो उस को (यह) यकीन नहीं बन सकता (कि यह सच्चा है), जे वह चोर (हाकम की) बेज्जती करे तो भी वह पल भर नहीं घबराता। कोई भी मनुष्य किसे चोर के अच्छे होने की गवाही नहीं दे सकता। जो मनुष्य (लोगों की नजरों में) चोर माना गया, वह (खुश़ामद या बेज्जती से औरों के सामने) अच्छा नहीं बन सकता ॥१॥ हे अन्धे लालची और झूठे मन! (ध्यान से) सुन। सच्चा मनुष्य बिना बोले ही पहचाना जाता है ॥१॥ रहाउ ॥ चोर हुए अच्छा बने चतुर बने, (पर आखिर वह चोर ही है उस की कदर कीमत नहीं पड़ती, जैसे) खोटे रूपए की कीमत दो टका ही है। जे खोटे रूपए को (खरे में) रख दें, (खरों में) रला दें, तो भी जब उसकी परख होती है तब भी वह खोटा ही कहा जाता है ॥२॥ मनुष्य जैसा कार्य करता है वैसा ही उस का फल पाता है। हर कोई आप (कर्मों के बीज) बीज के आप ही फल खाता है। जे कोई मनुष्य (हो तो खोटा, पर) अपनी वड़ियाइयों की कसमें चुकी जाए, (उस का एतबार नहीं बन सकता, क्योंकि) मनुष्य की जिस तरह की मनों-वासना है वैसे ही रास्ते पर वह चलता है ॥३॥ (अपना एतबार करवाने के लिए चतुर बन कर) झूठी गप्पें और झूठ कबाड़ की बातें-चाहे सारे संसार को कहीं जाए (पर, हे प्रभू! कोई मनुष्य आपको धोखा नहीं दे सकता। (हे प्रभू! जे दिल का खरा हो तो) एक सीधा मनुष्य भी आपको पसंद आ जाता है, आपके द्वार पर कबूल हो जाता है। हे नानक जी! घट घट की जानन वाला सुजान प्रभू (सब कुछ) जानता है ॥४॥४॥६॥