अंग : 701
जैतसरी महला ५ ॥ जा कउ भए गोविंद सहाई ॥ सूख सहज आनंद सगल सिउ वा कउ बिआधि न काई ॥१॥ रहाउ ॥ दीसहि सभ संगि रहहि अलेपा नह विआपै उन माई ॥ एकै रंगि तत के बेते सतिगुर ते बुधि पाई ॥१॥ दइआ मइआ किरपा ठाकुर की सेई संत सुभाई ॥ तिन कै संगि नानक निसतरीऐ जिन रसि रसि हरि गुन गाई ॥२॥३॥७॥
अर्थ: हे भाई! जिन मनुष्यों के लिए परमात्मा मददगार बन जाता है, (उन की उम्र) आतमिक अडोलता के सारे सुखों आनंदों के साथ (बीतती है) उनको कोई रोग नहीं सताता ॥१॥ हे भाई! वह मनुष्य सभी के साथ (वरतते) दिखते हैं, पर वह (माया से) निरलेप रहते हैं, माया उनके ऊपर अपना जोर नहीं डाल सकती। वह एक परमात्मा के प्रेम में टिके रहते हैं, वह जीवन की असलीयत के जानने वाले बन जाते हैं – यह समझ उन्होंने गुरु से प्राप्त कर ली होती है ॥१॥ रहाउ ॥ वह मनुष्य प्रेम-भरे हृदय वाले संत बन जाते हैं, जिनके ऊपर मालिक-प्रभू की कृपा दया होती है। हे नानक जी! जो मनुष्य सदा प्रेम के साथ परमात्मा के गुण गाते रहते हैं, उन की संगत में रह के संसार-समुंद्र को पार कर लईदा है ॥२॥३॥७॥