अंग : 842
बिलावलु महला ३ ॥ आदि पुरखु आपे स्रिसटि साजे ॥ जीअ जंत माइआ मोहि पाजे ॥ दूजै भाइ परपंचि लागे ॥ आवहि जावहि मरहि अभागे ॥ सतिगुरि भेटिऐ सोझी पाइ ॥ परपंचु चूकै सचि समाइ ॥१॥ जा कै मसतकि लिखिआ लेखु ॥ ता कै मनि वसिआ प्रभु एकु ॥१॥ रहाउ ॥ स्रिसटि उपाइ आपे सभु वेखै ॥ कोइ न मेटै तेरै लेखै ॥ सिध साधिक जे को कहै कहाए ॥ भरमे भूला आवै जाए ॥ सतिगुरु सेवै सो जनु बूझै ॥ हउमै मारे ता दरु सूझै ॥२॥
अर्थ: हे भाई! सारे जगत का मूल अकाल पुरख स्वयं ही जगत को पैदा करता है, (किए कर्मों के अनुसार) जीवों को (उसने) माया के मोह में जोड़ा हुआ है। (जीव परमात्मा को भुला के) और प्यार में दिखाई देते जगत के मोह में फंसे रहते हैं, (ऐसे) भाग्यहीन जीव जनम-मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं, आत्मिक मौत सहेड़े रखते हैं। अगर (किसी भाग्यशाली को) गुरु मिल जाए, तो वह (आत्मिक जीवन की) समझ हासिल कर लेता है, (उसके अंदर से) जगत का मोह समाप्त हो जाता है, (वह मनुष्य) सदा कायम रहने वाले परमात्मा (की) याद में लीन रहता है।1। हे भाई! जिस मनुष्य के माथे पर (मनुष्य के किए कर्मों के अनुसार परमात्मा की ओर से) लेख लिखा होता है, उस (मनुष्य) के मन में एक परमात्मा (ही) टिका रहता है।1। रहाउ। हे भाई! जगत पैदा करके (परमात्मा) स्वयं ही हरेक की संभाल करता है। (हे प्रभु! जीव के किए कर्मों के अनुसार उसके माथे पर जो लेख तू लिखता है) तेरे (उस लिखे) लेख को कोई जीव (अपने उद्यम से) मिटा नहीं सकता। हे भाई! (अपने अहंकार के आसरे) अगर कोई मनुष्य (अपने आप को) सिद्ध कहलवाता है, साधक कहता कहलवाता है, वह मनुष्य (अहंकार की) भटकना में पड़ कर गलत रास्ते पर पड़ा रहता है। हे भाई! जो मनुष्य (अपने अहंकार का आसरा छोड़ के) गुरु की शरण पड़ता है, वह मनुष्य (जीवन का) सही रास्ता समझ लेता है। जब मनुष्य (अपने अंदर से) अहंकार को मिटाता है, तब (उसको परमात्मा का) दर दिखाई दे जाता है।2।