अमृत ​​वेले का हुक्मनामा – 27 मार्च 2025

ਅੰਗ : 963
सलोक मः ५ ॥ अम्रित बाणी अमिउ रसु अम्रितु हरि का नाउ ॥ मनि तनि हिरदै सिमरि हरि आठ पहर गुण गाउ ॥ उपदेसु सुणहु तुम गुरसिखहु सचा इहै सुआउ ॥ जनमु पदारथु सफलु होइ मन महि लाइहु भाउ ॥ सूख सहज आनदु घणा प्रभ जपतिआ दुखु जाइ ॥ नानक नामु जपत सुखु ऊपजै दरगह पाईऐ थाउ ॥१॥ मः ५ ॥ नानक नामु धिआईऐ गुरु पूरा मति देइ ॥ भाणै जप तप संजमो भाणै ही कढि लेइ ॥ भाणै जोनि भवाईऐ भाणै बखस करेइ ॥ भाणै दुखु सुखु भोगीऐ भाणै करम करेइ ॥ भाणै मिटी साजि कै भाणै जोति धरेइ ॥ भाणै भोग भोगाइदा भाणै मनहि करेइ ॥ भाणै नरकि सुरगि अउतारे भाणै धरणि परेइ ॥ भाणै ही जिसु भगती लाए नानक विरले हे ॥२॥
पउड़ी ॥ वडिआई सचे नाम की हउ जीवा सुणि सुणे ॥ पसू परेत अगिआन उधारे इक खणे ॥ दिनसु रैणि तेरा नाउ सदा सद जापीऐ ॥ त्रिसना भुख विकराल नाइ तेरै ध्रापीऐ ॥ रोगु सोगु दुखु वंञै जिसु नाउ मनि वसै ॥ तिसहि परापति लालु जो गुर सबदी रसै ॥ खंड ब्रहमंड बेअंत उधारणहारिआ ॥ तेरी सोभा तुधु सचे मेरे पिआरिआ ॥१२॥

ਅਰਥ: प्रभू का नाम आत्मिक जीवन देने वाला जल है, अमृत का स्वाद देने वाला है; (हे भाई!) सतिगुरू की अमृत बरसाने वाली बाणी के द्वारा इस प्रभू नाम को मन में, शरीर में, हृदय में सिमरो और आठों पहर प्रभू की सिफत सालाह करो।
हे गुर-सिखो! (सिफतसालाह वाला यह) उपदेश सुनो, जिंदगी का असल मनोरथ यही है। मन में (प्रभू का) प्यार टिकाओ, ये मानस-जीवन रूपी बहुमूल्य निधि सफल हो जाएगी। प्रभू का सिमरन करने से दुख दूर हो जाता है, सुख, आत्मिक अडोलता और बेअंत खुशी प्राप्त होती है। हे नानक! प्रभू का नाम जपने से (इस लोक में) सुख पैदा होता है और प्रभू की हजूरी में जगह मिलती है।1। हे नानक! पूरा गुरू (तो यह) मति देता है कि प्रभू का नाम सिमरना चाहिए; (पर वैसे) जप तप संजम (आदिक कर्म-काण्ड) प्रभू की रजा में ही हो रहे हैं, रजा अनुसार ही प्रभू (इस कर्म-काण्ड में से जीवों को) निकाल लेता है।
प्रभू की रजा अनुसार ही जीव जूनियों में भटकता है, रजा में ही प्रभू (जीव पर) बख्शिश करता है। उसकी रजा में ही (जीव को) दुख-सुख भोगना पड़ता है, अपनी रजा अनुसार ही प्रभू (जीवों पर) मेहर करता है।
प्रभू अपनी रजा में ही शरीर बना के (उस में) जीवन डाल देता है, रजा में ही भोगों की ओर प्रेरता है और रजा के अनुसार ही भोगों से रोकता है।
अपनी रजा अनुसार ही प्रभू (किसी को) नर्क में (किसी को) स्वर्ग में डालता है, प्रभू की रजा में ही जीव का नाश हो जाता है। अपनी रजा अनुसार ही जिस मनुष्य को बँदगी में जोड़ता है (वह मनुष्य बँदगी करता है, पर)हे नानक! बँदगी करने वाले बँदे बहुत ही विरले विरले हैं।2। प्रभू के सच्चे नाम की सिफतें (करके और) सुन-सुन के मेरे अंदर जान पड़ जाती है (मुझे आत्मिक जीवन हासिल होता है), (प्रभू का नाम) पशु-स्वभाव, प्रेत-स्वभाव और ज्ञान-हीनों का एक छिन में उद्धार कर देता है।
हे प्रभू! दिन-रात सदा ही तेरा नाम जपना चाहिए, तेरे नाम के द्वारा (माया की) डरावनी भूख-प्यास मिट जाती है।
जिस मनुष्य के मन में प्रभू का नाम बस जाता है उसके मन में से (विकार-) रोग संशय और दुख दूर हो जाते हैं। पर ये नाम हीरा उस मनुष्य को ही हासिल होता है जो गुरू के शबद में रच-मिच जाता है।
हे खंडों-ब्रहमण्डों के बेअंत जीवों का उद्धार करने वाले प्रभू! हे सदा स्थिर रहने वाले मेरे प्यारे! तेरी शोभा तुझे ही फबती है (अपनी महानता को तू स्वयं ही जानता है)।12।

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