ਅੰਗ : 706
सलोक ॥ रचंति जीअ रचना मात गरभ असथापनं ॥ सासि सासि सिमरंति नानक महा अगनि न बिनासनं ॥१॥ मुखु तलै पैर उपरे वसंदो कुहथड़ै थाइ ॥ नानक सो धणी किउ विसारिओ उधरहि जिस दै नाइ ॥२॥ पउड़ी ॥ रकतु बिंदु करि निमिआ अगनि उदर मझारि ॥ उरध मुखु कुचील बिकलु नरकि घोरि गुबारि ॥ हरि सिमरत तू ना जलहि मनि तनि उर धारि ॥ बिखम थानहु जिनि रखिआ तिसु तिलु न विसारि ॥ प्रभ बिसरत सुखु कदे नाहि जासहि जनमु हारि ॥२॥
ਅਰਥ: जो परमात्मा जीवों की बनतर बनाता है उनको माँ के पेट में जगह देता है, हे नानक! जीव उसको हरेक सांस के साथ-साथ याद करते हैं और (माँ के पेट की) बड़ी ( भयानक) आग उनका नाश नहीं कर सकती।1।
हे नानक! (कह– हे भाई!) जब तेरा मुँह नीचे को था, पैर ऊपर की तरफ थे, बड़ी मुश्किल जगह में तू बसता था तब जिस प्रभू के नाम की बरकति से तू बचा रहा, अब उस मालिक को तूने क्यों भुला दिया?।2। (हे जीव!) (माँ के) रक्त और (पिता के) वीर्य से (माँ के) पेट की आग में तू उगा। तेरा मुँह नीचे को था, गंदा और डरावना था, (जैसे) एक अंधेरे घोर नर्क में पड़ा हुआ था। जिस प्रभू को सिमर के तू जलता नहीं था- उसको (अब भी) मन से तन से हृदय में याद कर। जिस प्रभू ने तुझे मुश्किल जगह से बचाया, उसको रक्ती भर भी ना भुला।
प्रभू को भुलाने से कभी सुख नहीं मिलता, (अगर भुलाएगा तो) मानस जन्म (की बाजी) हार के जाएगा।2