संधिआ ​​वेले का हुक्मनामा – 25 मार्च 2025

ਅੰਗ : 671
धनासरी मः ५ ॥ जब ते दरसन भेटे साधू भले दिनस ओइ आए ॥ महा अनंदु सदा करि कीरतनु पुरख बिधाता पाए ॥१॥ अब मोहि राम जसो मनि गाइओ ॥ भइओ प्रगासु सदा सुखु मन महि सतिगुरु पूरा पाइओ ॥१॥ रहाउ ॥ गुण निधानु रिद भीतरि वसिआ ता दूखु भरम भउ भागा ॥ भई परापति वसतु अगोचर राम नामि रंगु लागा ॥२॥ चिंत अचिंता सोच असोचा सोगु लोभु मोहु थाका ॥ हउमै रोग मिटे किरपा ते जम ते भए बिबाका ॥३॥ गुर की टहल गुरू की सेवा गुर की आगिआ भाणी ॥ कहु नानक जिनि जम ते काढे तिसु गुर कै कुरबाणी ॥४॥४॥
ਅਰਥ: हे भाई! जब से गुरू के दर्शन प्राप्त हुए हैं, मेरे इस तरह के अच्छे दिन आ गए, कि परमात्मा की सिफ़त-सलाह कर कर के सदा मेरे अंदर सुख बना रहता है, मुझे सर्व-व्यापक करतार मिल गया है ॥१॥ हे भाई! मुझे पूरा गुरू मिल गया है, (इस लिए उस की कृपा के साथ) अब मैं परमात्मा की सिफ़त-सलाह (अपने) मन में गा रहा हूँ, (मेरे अंदर आत्मिक जीवन की) रोशनी हो गई है, मेरे मन में सदा आनंद बना रहता है ॥१॥ रहाउ ॥ (हे भाई! गुरू की कृपा के साथ जब से) गुणों का ख़ज़ाना परमात्मा मेरे हृदय में आ वसा है, तब से मेरा दु:ख भ्रम डर दूर हो गया है। परमात्मा के नाम में मेरा प्यार बन गया है, मुझे (वह उत्तम) चीज़ प्राप्त हो गई है जिस तक ज्ञान-इन्द्रियों की पहुँच नहीं हो सकती ॥२॥ (हे भाई! गुरू के दर्शन की बरकत के साथ) मैं सभी चिंताओं और सोचों से बच गया हूँ, (मेरे अंदर से) ग़म ख़त्म हो गया है, लोभ ख़त्म हो गया है, मोह दूर हो गया है। (गुरू की) कृपा के साथ (मेरे अंदर से) अहंकार आदि रोग मिट गए हैं, मुझे यम-राज से भी कोई डर नहीं लगता ॥३॥ हे भाई! अब मुझे गुरू की टहल-सेवा, गुरू की रज़ा ही प्यारी लगती है। नानक जी कहते हैं – (हे भाई! मैं उस गुरू से सदके जाता हूँ, जिस ने मुझे यमों से बचा लिया है ॥४॥४॥*

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