ਅੰਗ : 654
राग सोरठि, घर १ में भगत कबीर जी की बाणी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जब जरीऐ तब होइ भसम तनु रहै किरम दल खाई ॥ काची गागरि नीरु परतु है इआ तन की इहै बडाई ॥१॥ काहे भईआ फिरतौ फूलिआ फूलिआ ॥ जब दस मास उरध मुख रहता सो दिनु कैसे भूलिआ ॥१॥ रहाउ ॥ जिउ मधु माखी तिउ सठोरि रसु जोरि जोरि धनु कीआ ॥ मरती बार लेहु लेहु करीऐ भूतु रहन किउ दीआ ॥२॥
ਅਰਥ: (मरने के बाद) अगर सरीर (चित्ता में) जलाया जाये तो वह रख हो जाता है, अगर (कबर में) टिकाया जाये तो चींटियों का दल इस को खा जाता है। (जैसे) कच्चे घड़े में पानी डालने से (घड़ा गल कर पानी बहार निकल जाता है उसी प्रकार स्वास ख़तम हो जाने पर सरीर में से जींद बहार निकल जाती है, सो) इस सरीर का इतना कु ही मान हैं जितना कच्चे घड़े का॥१॥ हे भाई! तूँ किस बात के अहंकार में भरा घूमता है ? तुझे वह समां क्यों भूल गया है जब तू (माँ के पेट में) दस महीने उल्टा टिका रहा था॥१॥रहाउ॥ जैसे माखी (फूलों का) रस जोड़ जोड़ कर शहद इकट्ठा करती है, उसी प्रकार मुर्ख व्यक्ति सर्फे कर कर के चन जोड़ता है (परन्तु आखिर वह बेगाना हो जाता है। मौत आई, तो सब यही कहते हैं, ले चलो, ले चलो, अब यह बीत चूका है, बहुत समां घर रखने से कोई लाभ नहीं॥२॥