अंग : 636
सोरठि महला १ ॥ जिन्ही सतिगुरु सेविआ पिआरे तिन्ह के साथ तरे ॥ तिन्हा ठाक न पाईऐ पिआरे अम्रित रसन हरे ॥ बूडे भारे भै बिना पिआरे तारे नदरि करे ॥१॥ भी तूहै सालाहणा पिआरे भी तेरी सालाह ॥ विणु बोहिथ भै डुबीऐ पिआरे कंधी पाइ कहाह ॥१॥ रहाउ ॥ सालाही सालाहणा पिआरे दूजा अवरु न कोइ ॥ मेरे प्रभ सालाहनि से भले पिआरे सबदि रते रंगु होइ ॥ तिस की संगति जे मिलै पिआरे रसु लै ततु विलोइ ॥२॥ पति परवाना साच का पिआरे नामु सचा नीसाणु ॥ आइआ लिखि लै जावणा पिआरे हुकमी हुकमु पछाणु ॥ गुर बिनु हुकमु न बूझीऐ पिआरे साचे साचा ताणु ॥३॥ हुकमै अंदरि निमिआ पिआरे हुकमै उदर मझारि ॥ हुकमै अंदरि जमिआ पिआरे ऊधउ सिर कै भारि ॥ गुरमुखि दरगह जाणीऐ पिआरे चलै कारज सारि ॥४॥ हुकमै अंदरि आइआ पिआरे हुकमे जादो जाइ ॥ हुकमे बंन्हि चलाईऐ पिआरे मनमुखि लहै सजाइ ॥ हुकमे सबदि पछाणीऐ पिआरे दरगह पैधा जाइ ॥५॥ हुकमे गणत गणाईऐ पिआरे हुकमे हउमै दोइ ॥ हुकमे भवै भवाईऐ पिआरे अवगणि मुठी रोइ ॥ हुकमु सिञापै साह का पिआरे सचु मिलै वडिआई होइ ॥६॥ आखणि अउखा आखीऐ पिआरे किउ सुणीऐ सचु नाउ ॥ जिन्ही सो सालाहिआ पिआरे हउ तिन्ह बलिहारै जाउ ॥ नाउ मिलै संतोखीआं पिआरे नदरी मेलि मिलाउ ॥७॥ काइआ कागदु जे थीऐ पिआरे मनु मसवाणी धारि ॥ ललता लेखणि सच की पिआरे हरि गुण लिखहु वीचारि ॥ धनु लेखारी नानका पिआरे साचु लिखै उरि धारि ॥८॥३॥
अर्थ: जिन लोगों ने सतिगुरू का पल्ला पकड़ा है, हे सज्जन! उनके संगी-साथी भी पार लांघ जाते हैं। जिनकी जीभ परमात्मा का नाम-अमृत चखती है उनके (जीवन-यात्रा में विकार आदि की) रुकावटें नहीं पड़ती। हे सज्जन! जो लोग परमात्मा के डर-अदब से वंचित रहते हैं वे विकारों के भार से लादे जाते हैं और संसार समुंद्र में डूब जाते हैं। पर जब परमात्मा मेहर की निगाह करता है तो उनको भी पार लंघा लेता है।1। हे सज्जन प्रभू! सदा तुझे ही सलाहना चाहिए, हमेशा तेरी ही सिफत सालाह करनी चाहिए। (इस संसार-समुंद्र में से पार लांघने के लिए तेरी सिफत सालाह ही जीवों के लिए जहाज है, इस) जहाज के बिना भव-सागर में डूब जाते हैं। (कोई भी जीव समुंद्र का) दूसरा छोर ढूँढ नहीं सकता। रहाउ। हे सज्जन! सलाहने योग्य परमात्मा की सिफत सालाह करनी चाहिए, उस जैसा और कोई नहीं है। जो लोग प्यारे प्रभू की सिफत सालाह करते हैं वे भाग्यशाली हैं। गुरू के शबद में गहरी लगन रखने वाले व्यक्ति को परमात्मा का प्रेम रंग चढ़ता है। ऐसे आदमी की संगति अगर (किसी को) प्राप्त हो जाए तो वह हरी नाम का रस लेता है। और (नाम-दूध को) मथ के वह जगत के मूल प्रभू में मिल जाता है।2। हे भाई! सदा स्थिर रहने वाले प्रभू का नाम प्रभू-पति को मिलने के लिए (इस जीवन-सफर में) राहदारी है, ये नाम सदा-स्थिर रहने वाली मेहर है। (प्रभू का यही हुकम है कि) जगत में जो भी आया है उसने (प्रभू को मिलने के लिए, ये नाम-रूपी राहदारी) लिख के अपने साथ ले जानी है। हे भाई! प्रभू की इस आज्ञा को समझ (पर इस हुकम को समझने के लिए गुरू की शरण पड़ना पड़ेगा) गुरू के बिना प्रभू का हुकम समझा नहीं जा सकता। हे भाई! (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ के समझ लेता है, विकारों का मुकाबला करने के लिए उसको) सदा-स्थिर प्रभू का बल हासिल हो जाता है।3। हे भाई! जीव परमात्मा के हुकम अनुसार (पहले) माता के गर्भ में ठहरता है, और माँ के पेट में (दस महीने निवास रखता है)। उल्टे सिर भार रह के प्रभू के हुकम अनुसार ही (फिर) जनम लेता है। (किसी खास जीवन उद्देश्य के लिए ही जीव जगत में आता है) जो जीव गुरू की शरण पड़ कर जीवन-उद्देश्य को सँवार के यहाँ से जाता है वही परमात्मा की हजूरी में आदर पाता है।4। हे सज्जन! परमात्मा की रजा के अनुसार ही जीव जगत में आता है, रजा के अनुसार ही यहाँ से चला जाता है। जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलता है (और माया के मोह में फस जाता है) उसे प्रभू की रजा के अनुसार ही बाँध के (भाव, जबरदस्ती) यहाँ से रवाना किया जाता है (क्योंकि मोह के कारण वह इस माया को छोड़ना नहीं चाहता)। परमात्मा की रजा के अनुसार ही जिसने गुरू के शबद के द्वारा (जीवन-उद्देश्य को) पहचान लिया है वह परमात्मा की हजूरी में आदर सहित जाता है।5। हे भाई! परमात्मा की रजा के अनुसार ही (कहीं) माया की सोच सोची जा रही है, प्रभू की रजा में ही कहीं अहंकार व कहीं द्वैत है। प्रभू की रजा के अनुसार ही (कहीं कोई माया की खातिर) भटक रहा है, (कहीं कोई) जनम-मरन के चक्कर में डाला जा रहा है, कहीं पाप की ठॅगी हुई दुनिया (अपने दुख) रो रही है। जिस मनुष्य को शाह-प्रभू की रजा की समझ आ जाती है, उसे सदा-स्थिर रहने वाला प्रभू मिल जाता है, उसकी (लोक-परलोक में) उपमा होती है।6। हे भाई! (जगत में माया का प्रभाव इतना है कि) परमात्मा का सदा-स्थिर रहने वाला नाम सिमरना बड़ा कठिन हो रहा है, ना ही प्रभू-नाम सुना जा रहा है (माया के प्रभाव तले जीव नाम नहीं सिमरते, नाम नहीं सुनते)। हे भाई! मैं उन लोगों से कुर्बान जाता हूँ जिन्होंने प्रभू की सिफत सालाह की है। (मेरी यही प्रार्थना है कि उन की संगति में) मुझे भी नाम मिले और मेरा जीवन संतोषी हो जाए, मेहर की नज़र वाले प्रभू के चरणों में मैं जुड़ा रहूँ।7। हे भाई! हमारा शरीर कागज बन जाए, यदि मन को स्याही की दवात बना लें, यदि हमारी जीभ प्रभू की सिफत सालाह बनने के लिए कलम बन जाए, तो हे भाई! (सौभाग्य इसी बात में है कि) परमात्मा के गुणों को अपने विचार-मण्डल में ला के (अपने अंदर) उकरते चलो। हे नानक! वह लिखारी धन्य है जो सदा-स्थिर प्रभू के नाम को हृदय में टिका के (अपने अंदर) उकर लेता है।8।3।
ਅੰਗ : 619
ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੫ ॥ ਹਮਰੀ ਗਣਤ ਨ ਗਣੀਆ ਕਾਈ ਅਪਣਾ ਬਿਰਦੁ ਪਛਾਣਿ ॥ ਹਾਥ ਦੇਇ ਰਾਖੇ ਕਰਿ ਅਪੁਨੇ ਸਦਾ ਸਦਾ ਰੰਗੁ ਮਾਣਿ ॥੧॥ ਸਾਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਸਦ ਮਿਹਰਵਾਣ ॥ ਬੰਧੁ ਪਾਇਆ ਮੇਰੈ ਸਤਿਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਹੋਈ ਸਰਬ ਕਲਿਆਣ ॥ ਰਹਾਉ ॥ ਜੀਉ ਪਾਇ ਪਿੰਡੁ ਜਿਨਿ ਸਾਜਿਆ ਦਿਤਾ ਪੈਨਣੁ ਖਾਣੁ ॥ ਅਪਣੇ ਦਾਸ ਕੀ ਆਪਿ ਪੈਜ ਰਾਖੀ ਨਾਨਕ ਸਦ ਕੁਰਬਾਣੁ ॥੨॥੧੬॥੪੪॥
ਅਰਥ: ਹੇ ਭਾਈ! ਪਰਮਾਤਮਾ ਅਸਾਂ ਜੀਵਾਂ ਦੇ ਕੀਤੇ ਮੰਦ-ਕਰਮਾਂ ਦਾ ਕੋਈ ਖ਼ਿਆਲ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ। ਉਹ ਆਪਣੇ ਮੁੱਢ-ਕਦੀਮਾਂ ਦੇ (ਪਿਆਰ ਵਾਲੇ) ਸੁਭਾਉ ਨੂੰ ਚੇਤੇ ਰੱਖਦਾ ਹੈ, (ਉਹ, ਸਗੋਂ, ਸਾਨੂੰ ਗੁਰੂ ਮਿਲਾ ਕੇ, ਸਾਨੂੰ) ਆਪਣੇ ਬਣਾ ਕੇ (ਆਪਣੇ) ਹੱਥ ਦੇ ਕੇ (ਸਾਨੂੰ ਵਿਕਾਰਾਂ ਵਲੋਂ) ਬਚਾਂਦਾ ਹੈ। (ਜਿਸ ਵਡ-ਭਾਗੀ ਨੂੰ ਗੁਰੂ ਮਿਲ ਪੈਂਦਾ ਹੈ, ਉਹ) ਸਦਾ ਹੀ ਆਤਮਕ ਆਨੰਦ ਮਾਣਦਾ ਹੈ ॥੧॥ ਹੇ ਭਾਈ! ਸਦਾ ਕਾਇਮ ਰਹਿਣ ਵਾਲਾ ਮਾਲਕ-ਪ੍ਰਭੂ ਸਦਾ ਦਇਆਵਾਨ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ, (ਕੁਕਰਮਾਂ ਵਲ ਪਰਤ ਰਹੇ ਬੰਦਿਆਂ ਨੂੰ ਉਹ ਗੁਰੂ ਮਿਲਾਂਦਾ ਹੈ। ਜਿਸ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਗੁਰੂ ਮਿਲ ਪਿਆ, ਉਸ ਦੇ ਵਿਕਾਰਾਂ ਦੇ ਰਸਤੇ ਵਿਚ) ਮੇਰੇ ਪੂਰੇ ਗੁਰੂ ਨੇ ਬੰਨ੍ਹ ਮਾਰ ਦਿੱਤਾ (ਤੇ, ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਉਸ ਦੇ ਅੰਦਰ) ਸਾਰੇ ਆਤਮਕ ਆਨੰਦ ਪੈਦਾ ਹੋ ਗਏ ॥ ਰਹਾਉ॥ ਹੇ ਭਾਈ! ਜਿਸ ਪਰਮਾਤਮਾ ਨੇ ਜਿੰਦ ਪਾ ਕੇ (ਸਾਡਾ) ਸਰੀਰ ਪੈਦਾ ਕੀਤਾ ਹੈ, ਜੇਹੜਾ (ਹਰ ਵੇਲੇ) ਸਾਨੂੰ ਖ਼ੁਰਾਕ ਤੇ ਪੁਸ਼ਾਕ ਦੇ ਰਿਹਾ ਹੈ, ਉਹ ਪਰਮਾਤਮਾ (ਸੰਸਾਰ-ਸਮੁੰਦਰ ਦੀਆਂ ਵਿਕਾਰ-ਲਹਿਰਾਂ ਤੋਂ) ਆਪਣੇ ਸੇਵਕ ਦੀ ਇੱਜ਼ਤ (ਗੁਰੂ ਮਿਲਾ ਕੇ) ਆਪ ਬਚਾਂਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਨਾਨਕ! (ਆਖ ਕਿ ਮੈਂ ਉਸ ਪਰਮਾਤਮਾ ਤੋਂ) ਸਦਾ ਸਦਕੇ ਜਾਂਦਾ ਹਾਂ ॥੨॥੧੬॥੪੪॥
अंग : 619
सोरठि महला ५ ॥ हमरी गणत न गणीआ काई अपणा बिरदु पछाणि ॥ हाथ देइ राखे करि अपुने सदा सदा रंगु माणि ॥१॥ साचा साहिबु सद मिहरवाण ॥ बंधु पाइआ मेरै सतिगुरि पूरै होई सरब कलिआण ॥ रहाउ ॥ जीउ पाइ पिंडु जिनि साजिआ दिता पैनणु खाणु ॥ अपणे दास की आपि पैज राखी नानक सद कुरबाणु ॥२॥१६॥४४॥
अर्थ: हे भाई! परमात्मा हम जीवों के किये बुरे-कर्मो का कोई ध्यान नहीं करता। वह अपने मूढ़-कदीमा के (प्यार वाले) सवभाव को याद रखता है, (वह, बल्कि, हमें गुरु मिला कर, हमें) अपना बना कर (अपने) हाथ दे के (हमे विकारों से) बचाता है। (जिस बड़े-भाग्य वाले को गुरु मिल जाता है , वह) सदा ही आत्मिक आनंद मानता रहता है॥१॥ हे भाई! सदा कायम रहने वाला मालिक-प्रभु सदा दयावान रहता है, (कुकर्मो की तरफ बड़ रहे मनुख को गुरु मिलाता है। जिस को पूरा गुरु मिल गया, उस के विकारों के रास्ते में) मेरे पूरे गुरु ने बंद लगा दिया ( और, इस प्रकार उस के अंदर) सारे आत्मिक आनंद पैदा हो गए॥रहाउ॥ हे भाई! जिस परमात्मा ने जान डालकर (हमारा) सरीर पैदा किया है, जो (हर समय) हमे खुराक और पोशाक दे रहा है, वह परमात्मा (संसार-समुन्द्र की विकार लहरों से) अपने सेवक की इज्ज़त (गुरु मिला कर) आप बचाता है। हे नानक! (कह की मैं उस परमात्मा से) सदा सदके जाता हूँ॥२॥१६॥४४॥
ਅੰਗ : 813
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥ ਮਹਾ ਤਪਤਿ ਤੇ ਭਈ ਸਾਂਤਿ ਪਰਸਤ ਪਾਪ ਨਾਠੇ ॥ ਅੰਧ ਕੂਪ ਮਹਿ ਗਲਤ ਥੇ ਕਾਢੇ ਦੇ ਹਾਥੇ ॥੧॥ ਓਇ ਹਮਾਰੇ ਸਾਜਨਾ ਹਮ ਉਨ ਕੀ ਰੇਨ ॥ ਜਿਨ ਭੇਟਤ ਹੋਵਤ ਸੁਖੀ ਜੀਅ ਦਾਨੁ ਦੇਨ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥ ਪਰਾ ਪੂਰਬਲਾ ਲੀਖਿਆ ਮਿਲਿਆ ਅਬ ਆਇ ॥ ਬਸਤ ਸੰਗਿ ਹਰਿ ਸਾਧ ਕੈ ਪੂਰਨ ਆਸਾਇ ॥੨
ਅਰਥ: ਹੇ ਭਾਈ! (ਉਹਨਾਂ ਸੰਤ ਜਨਾਂ ਦੇ ਪੈਰ) ਪਰਸਿਆਂ ਸਾਰੇ ਪਾਪ ਨਾਸ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਹਨ, ਮਨ ਵਿਚ ਵਿਕਾਰਾਂ ਦੀ ਭਾਰੀ ਤਪਸ਼ ਤੋਂ ਸ਼ਾਂਤੀ ਬਣ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਜੇਹੜੇ ਮਨੁੱਖ (ਵਿਕਾਰਾਂ ਪਾਪਾਂ ਦੇ) ਘੁੱਪ ਹਨੇਰੇ ਖੂਹ ਵਿਚ ਗਲ-ਸੜ ਰਹੇ ਹੁੰਦੇ ਹਨ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ (ਉਹ ਸੰਤ ਜਨ ਆਪਣਾ) ਹੱਥ ਦੇ ਕੇ (ਉਸ ਖੂਹ ਵਿਚੋਂ) ਕੱਢ ਲੈਂਦੇ ਹਨ।੧। ਹੇ ਭਾਈ! ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਮਿਲਿਆਂ (ਮੇਰਾ ਮਨ) ਆਨੰਦ ਨਾਲ ਭਰਪੂਰ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਜੇਹੜੇ (ਮੈਨੂੰ) ਆਤਮਕ ਜੀਵਨ ਦੀ ਦਾਤਿ ਦੇਂਦੇ ਹਨ, ਉਹ (ਸੰਤ ਜਨ ਹੀ) ਮੇਰੇ (ਅਸਲ) ਮਿੱਤਰ ਹਨ, ਮੈਂ ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਚਰਨਾਂ ਦੀ ਧੂੜ (ਲੋਚਦਾ) ਹਾਂ।੧।ਰਹਾਉ। ਹੇ ਭਾਈ! ਇਸ ਮਨੁੱਖਾ ਜਨਮ ਵਿਚ (ਜਦੋਂ ਕਿਸੇ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਕੋਈ ਸੰਤ ਜਨ ਮਿਲ ਪੈਂਦਾ ਹੈ, ਤਾਂ) ਬੜੇ ਪੂਰਬਲੇ ਜਨਮ ਤੋਂ ਉਸ ਦੇ ਮੱਥੇ ਉਤੇ ਲਿਖਿਆ ਲੇਖ ਉਘੜ ਪੈਂਦਾ ਹੈ। ਪ੍ਰਭੂ ਦੇ ਸੇਵਕ-ਜਨ ਦੀ ਸੰਗਤਿ ਵਿਚ ਵੱਸਦਿਆਂ (ਉਸ ਮਨੁੱਖ ਦੀਆਂ ਸਾਰੀਆਂ ਆਸਾਂ ਪੂਰੀਆਂ ਹੋ ਜਾਂਦੀਆਂ ਹਨ।੨।
अंग : 813
बिलावलु महला ५ ॥ महा तपति ते भई सांति परसत पाप नाठे ॥ अंध कूप महि गलत थे काढे दे हाथे ॥१॥ ओइ हमारे साजना हम उन की रेन ॥ जिन भेटत होवत सुखी जीअ दानु देन ॥१॥ रहाउ ॥ परा पूरबला लीखिआ मिलिआ अब आइ ॥ बसत संगि हरि साध कै पूरन आसाइ ॥२॥
अर्थ: हे भाई! (उन संत जनों के पाँव) परसने से सारे पाप नास हो जाते हैं, मन में विकारों की भरी तपिश से शांति बन जाती है। जो मनुख (विकारों पापों के) घने अँधेरे कुएं में गल-सड़ रहे होते हैं, उनको (वह संत-जन अपना) हाथ दे के (उस कुएँ से) निकाल लेते हैं।१। हे भाई! जिन को मिलकर (मेरा मन) आनंद से भरपूर हो जाता है, जो (मुझे आत्मिक जीवन की दात देते हैं, वह (संत-जन ही) मेरे (असली) मित्र हैं, मैं उनके चरणों की धुल (चाहता) हूँ।१।रहाउ। हे भाई! इस मनुख जनम में (जब किसी मनुख को कोई संत-जन मिल जाता है, तो) बड़े पूर्व जन्म के उसके मस्तक पर लिखे लेख उभर आते है। प्रभु के सेवक-जन की सांगत में बसते हुए (उस मनुख की सारी आशाएं पूरी हो जाती हैं।२।
ਅੰਗ : 694
ਧਨਾਸਰੀ ਭਗਤ ਰਵਿਦਾਸ ਜੀ ਕੀ ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥ ਹਮ ਸਰਿ ਦੀਨੁ ਦਇਆਲੁ ਨ ਤੁਮ ਸਰਿ ਅਬ ਪਤੀਆਰੁ ਕਿਆ ਕੀਜੈ ॥ ਬਚਨੀ ਤੋਰ ਮੋਰ ਮਨੁ ਮਾਨੈ ਜਨ ਕਉ ਪੂਰਨੁ ਦੀਜੈ ॥੧॥ ਹਉ ਬਲਿ ਬਲਿ ਜਾਉ ਰਮਈਆ ਕਾਰਨੇ ॥ ਕਾਰਨ ਕਵਨ ਅਬੋਲ ॥ ਰਹਾਉ ॥ ਬਹੁਤ ਜਨਮ ਬਿਛੁਰੇ ਥੇ ਮਾਧਉ ਇਹੁ ਜਨਮੁ ਤੁਮ੍ਹ੍ਹਾਰੇ ਲੇਖੇ ॥ ਕਹਿ ਰਵਿਦਾਸ ਆਸ ਲਗਿ ਜੀਵਉ ਚਿਰ ਭਇਓ ਦਰਸਨੁ ਦੇਖੇ ॥੨॥੧॥
ਅਰਥ: (ਹੇ ਮਾਧੋ!) ਮੇਰੇ ਵਰਗਾ ਕੋਈ ਨਿਮਾਣਾ ਨਹੀਂ, ਤੇ, ਤੇਰੇ, ਵਰਗਾ ਹੋਰ ਕੋਈ ਦਇਆ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਨਹੀਂ, (ਮੇਰੀ ਕੰਗਾਲਤਾ ਦਾ) ਹੁਣ ਹੋਰ ਪਰਤਾਵਾ ਕਰਨ ਦੀ ਲੋੜ ਨਹੀਂ। (ਹੇ ਸੋਹਣੇ ਰਾਮ!) ਮੈਨੂੰ ਦਾਸ ਨੂੰ ਇਹ ਪੂਰਨ ਸਿਦਕ ਬਖ਼ਸ਼ ਕਿ ਮੇਰਾ ਮਨ ਤੇਰੀ ਸਿਫ਼ਤਿ-ਸਾਲਾਹ ਦੀਆਂ ਗੱਲਾਂ ਵਿਚ ਪਰਚ ਜਾਇਆ ਕਰੇ।੧। ਹੇ ਸੋਹਣੇ ਰਾਮ! ਮੈਂ ਤੈਥੋਂ ਸਦਾ ਸਦਕੇ ਹਾਂ; ਤੂੰ ਕਿਸ ਗੱਲੇ ਮੇਰੇ ਨਾਲ ਨਹੀਂ ਬੋਲਦਾ?।ਰਹਾਉ। ਰਵਿਦਾਸ ਜੀ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ -ਹੇ ਮਾਧੋ! ਕਈ ਜਨਮਾਂ ਤੋਂ ਮੈਂ ਤੈਥੋਂ ਵਿਛੁੜਿਆ ਆ ਰਿਹਾ ਹਾਂ (ਮਿਹਰ ਕਰ, ਮੇਰਾ) ਇਹ ਜਨਮ ਤੇਰੀ ਯਾਦ ਵਿਚ ਬੀਤੇ; ਤੇਰਾ ਦੀਦਾਰ ਕੀਤਿਆਂ ਬੜਾ ਚਿਰ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ, (ਦਰਸ਼ਨ ਦੀ) ਆਸ ਵਿਚ ਹੀ ਮੈਂ ਜੀਊਂਦਾ ਹਾਂ ॥੨॥੧॥
अंग : 694
धनासरी, भगत रवि दास जी की ੴ सतिगुर परसाद हम सरि दीनु दइआल न तुम सरि अब पतिआरू किया कीजे ॥ बचनी तोर मोर मनु माने जन कऊ पूरण दीजे ॥१॥ हउ बलि बलि जाउ रमईआ कारने ॥ कारन कवन अबोल ॥ रहाउ ॥ बहुत जनम बिछुरे थे माधउ इहु जनमु तुम्हारे लेखे ॥ कहि रविदास आस लगि जीवउ चिर भइओ दरसनु देखे ॥२॥१॥
अर्थ: (हे माधो मेरे जैसा कोई दीन और कंगाल नहीं हे और तेरे जैसा कोई दया करने वाला नहीं, (मेरी कंगालता का) अब और परतावा करने की जरुरत नहीं (हे सुंदर राम!) मुझे दास को यह सिदक बक्श की मेरा मन तेरी सिफत सलाह की बाते करने में ही लगा रहे।१। हे सुंदर राम! में तुझसे सदके हूँ, तू किस कारण मेरे साथ नहीं बोलता?||रहाउ|| रविदास जी कहते हैं- हे माधो! कई जन्मो से मैं तुझ से बिछुड़ा आ रहा हूँ (कृपा कर, मेरा) यह जनम तेरी याद में बीते; तेरा दीदार किये बहुत समां हो गया है, (दर्शन की) आस में जीवित हूँ॥२॥१॥
ਇਹ ਸਿੱਖਾਂ ਦੇ ਸਿਰਾਂ ਦੇ ਮੁੱਲ ਪੈਣ ਦੇ ਨੇੜੇ ਤੇੜੇ ਦਾ ਸਮਾਂ ਸੀ,,, ਇੱਕ ਬਾਲ ਬਾਬੇ ਨਾਲ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਸਾਹਿਬ ਆਇਆਂ,,,ਪਹਿਰੇ ਹਰ ਪਾਸੇ ਸਖ਼ਤ ਹੋਣ ਕਾਰਨ ਬਾਬਾ ਤੇ ਬਾਲ ਬਚਦੇ ਬਚਾਉਂਦੇ ਹਰਮਿੰਦਰ ਸਾਹਿਬ ਪਹੁੰਚੇ,, ਪਰਕਰਮਾ ਵਿੱਚ ਦਾਖਲ ਹੁੰਦਿਆਂ ਬਾਲ ਨੇ ਪੁੱਛਿਆ ਮੁਗਲਾਂ ਦੇ ਪਹਿਰੇ ਰਾਹ ਵਿੱਚ ਇਹਨੇ ਸਖ਼ਤ ਹਨ ਬਾਬਾ ਜੀ ਕੀ ਉਹ ਦਰਬਾਰ ਸਾਹਿਬ ਤੇ ਨਜ਼ਰ ਨਹੀਂ ਰਖਦੇ,,,,
ਰੱਖਦੇ ਸਨ ਭਾਈ,,,ਪੂਰੀਆ ਚੌਕੀਆਂ ਬਿਠਾ ਦਿਤੀਆਂ ਸਨ ਉਹਨਾਂ ਨੇ ਏਥੇ ਪਰਕਰਮਾ ਵਿੱਚ,,,ਸਭ ਪਾਸੇ,, ਕਿਸੇ ਪਰਿੰਦੇ ਨੂੰ ਪਰ ਨਹੀਂ ਮਾਰਨ ਦਿੱਤਾ ਜਾਦਾ ਸੀ,,,
“”ਫੇਰ,,,ਉਹ ਪਹਿਰੇ ਚੱਕੇ ਕਿਵੇਂ ਗਏ,,,,
“””ਆਪ ਕਿਥੇ ਚੱਕੇ ਆ,,ਚੱਕਵਾਏ ਆ ਗੁਰੂ ਕੇ ਲਾਲਾ ਨੇ”””
,,,,,ਕਿਹਨਾ ਨੇ,,,,,,
ਕੌਣ ਸਿੰਘ ਨੇ ਜਿਹਨਾਂ ਮੁਗਲ ਏਥੋਂ ਭਜਾਏ???
“””ਭਾਈ ਸੁੱਖਾ ਸਿੰਘ ਤੇ ਭਾਈ ਮਹਿਤਾਬ ਸਿੰਘ,,, ਗੁਰੂ ਕੇ ਦੋ ਲਾਲ,,,ਬੁਢੇ ਜੌਹੜ ਤੋਂ ਆਏ,,, ਤੇ ਮੱਸੇ ਦਾ ਸਿਰ ਵੱਢ ਕੇ ਦਲ ਖਾਲਸੇ ਕੋਲ ਲੈ ਗਏ,,,,
ਵਾਹ,,, ਧੰਨ ਨੇ ਉਹ ਸਿੰਘ,,,
ਬਾਲ ਮੁਸਕਰਾਉਂਦਾ ਹੋਇਆ ਬੋਲਿਆ,,,,
ਸੰਧਿਆ ਦਾ ਦੀਵਾਨ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋ ਗਿਆ ਸੀ,, ਦਰਬਾਰ ਸਾਹਿਬ ਚੋ ਆਵਾਜ ਆਈ
“””ਸੋ ਦਰੁ ਤੇਰਾ ਕੇਹਾ”””ਬਾਬੇ ਦੀ ਓਗਲ ਖਿਚਦਾ ਹੋਇਆ ਬੋਲਿਆ,,,ਸੋ ਦਰੁ ਤੇਰਾ ਕੇਹਾ,,,ਬਾਬਾ ਜੀ??
ਦਰਬਾਰ ਸਾਹਿਬ ਹਰਿਮੰਦਰ ਜਿਹਾ,, ਜਵਾਬ ਦਿੰਦਿਆਂ ਬਾਂਬੇ ਨੇਂ ਹੱਥ ਹਰਮਿੰਦਰ ਸਾਹਿਬ ਵੱਲ ਕੀਤਾ,,,
ਬਾਲ ਨੇਂ ਐਤਕੀ ਗਹੁ ਨਾਲ ਹਰਮਿੰਦਰ ਸਾਹਿਬ ਵੱਲ ਦੇਖਿਆ,, ਤਾਂ ਉਸ ਨੂੰ ਇਹ ਅਕਾਲ ਜੀ ਦਾ ਰੂਹਾਨੀ ਦਰਬਾਰ ਹੀ ਜਾਪਿਆ,,,
ਸੱਚਮੁੱਚ,,,, ਹਰਮਿੰਦਰ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਦਰ ਮੱਥਾ ਛੁਹਾਉਦਿਆ ਬਾਲ ਬੋਲਿਆ,,,
ਦੀਵਾਨ ਦੀ ਸਮਾਪਤੀ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਬਾਲ ਬਾਹਰ ਆ ਗਿਆ ਤੇ ਹਰਮਿੰਦਰ ਸਾਹਿਬ ਦੀ ਪਰਕਰਮਾ ਕਰਨ ਲੱਗਾ,,
“””””ਸੱਚਮੁੱਚ ਕਿਆ ਕਮਾਲ ਦਰਬਾਰ ਹੈ,,,ਹਰਿ ਮੰਦਰ ਤਾ ਫਿਰ ਐਸਾ ਹੀ ਹੋਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ,,ਐਸਾ ਦਰਬਾਰ ਜਿਹਨਾਂ ਦੇ ਭਾਗਾਂ ਦੇ ਵਿੱਚ ਹੈ,, ਉਹ ਹੋਰ ਕਿਸੇ ਨੂੰ””ਆਂਖ ਤਰੇ”””ਲਿਆ ਹੀ ਨਹੀ ਸਕਦਾ,,,ਬਾਲ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨਾਲ ਗੱਲਾਂ ਕਰ ਰਿਹਾ ਸੀ,,,,
ਇਹ ਗੱਲਾਂ ਉਸਦੀ ਉਮਰ ਤੋਂ ਵੱਧ ਸਿਆਣੀਆਂ ਸਨ,,,
,,ਆਨ ਨਾ ਮਾਨੈ ਆਨ ਕੀ,,,
,,ਇਕ ਸੱਚੇ ਬਿਨ ਪਾਤਸਾਹਿ,,।
ਕੋਲ ਦੀ ਲੱਗਦਾ ਇਕ ਬਜ਼ੁਰਗ ਬਾਬਾ ਬੋਲਿਆ,,,
ਬਾਲ ਨੇਂ ਬਾਬੇ ਦੀ ਓਗਲ ਫਿਰ ਫ਼ੜ ਲਈ ਤੇ ਦਰਬਾਰ ਸਾਹਿਬ ਦੀ ਪਰਕਰਮਾ ਕਰਨ ਲੱਗੇ,,,
,,,, ਖਾਲਸਾ ਜੀ ਇਹ ਤਾਂ ਆਪਣੇ ਉਪਰ ਗੁਰੂ ਸਾਹਿਬ ਦੀ ਅਪਾਰ ਕਿਰਪਾ ਹੈ ਜਿਸ ਨਾਲ ਸਾਨੂੰ ਹਰਿਮੰਦਰ ਸਾਹਿਬ, ਆਨੰਦਪੁਰ ਸਾਹਿਬ,ਜਹੇ ਅਸਥਾਨਾਂ ਦੇ ਦਰਸ਼ਨ ਦੀਦਾਰ ਕਰਨ ਦਾ ਸੁਭਾਗ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋਇਆ ਹੈ,,,
,,,,, ਬੇਸ਼ੱਕ ਖਾਲਸਾ ਜੀ,,ਪਰ ਖ਼ਾਲਸੇ ਸਿਰ ਵੀ ਵੱਡੀ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਬਣਦੀ ਹੈ ਕੀ ਉਹ ਗੁਰੂ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਉਹਨਾਂ ਅਸਥਾਨਾਂ ਨੂੰ ਪ੍ਰਗਟ ਕਰਨ ਜੋ ਮੁਗਲਾਂ ਦੇ ਕਬਜ਼ੇ ਵਿਚ ਹਨ,,,
ਇੱਕ ਹੋਰ ਸਿੰਘ ਬੋਲੇ,,
ਕੀ ਆਪ ਦਾ ਇਸ਼ਾਰਾ ਦਿੱਲੀ ਦੇ ਅਸਥਾਨਾਂ ਵੱਲ ਹੈ,,?
ਮਹਾਰਾਜ ਪੰਥ ਨੂੰ ਤਾਕਤ ਬਖਸਣ ਤੇ ਕਿਸੇ ਸਿੰਘ ਦੇ ਸਿਰ ਮਿਹਰ ਭਰਿਆ ਹੱਥ ਰੱਖ ਇਹ ਸੇਵਾ ਕਰਵਾ ਲੈਣ,,,
ਹਜੇ ਇੱਕ ਸਿੰਘ ਇਹ ਬੋਲ ਹੀ ਰਿਹਾ ਸੀ ਕੀ ਬਾਲ ਬਾਬੇ ਦੀ ਉਗਲ ਛੱਡ ਅਕਾਲ ਬੁੰਗੇ ਵੱਲ ਭੱਜਿਆ,,,,
ਅਗਲੇ ਹੀ ਪਲ ਅਕਾਲ ਬੁੰਗੇ ਦੇ ਵਿਹੜੇ ਵਿਚ ਖਲੋਤਾ ਅਰਦਾਸ ਕਰ ਰਿਹਾ ਸੀ,,,
ਹੇ ਮੀਰੀ ਪੀਰੀ ਦੇ ਮਾਲਕ ਸਤਿਗੁਰੂ ਸ੍ਰੀ ਹਰਗੋਬਿੰਦ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਸੱਚੇ ਪਾਤਸ਼ਾਹ ਆਪ ਜੀ ਦਾ ਨਿਮਾਣਾ ਬਾਲ ਆਪ ਜੀ ਦੇ ਅੱਗੇ ਅਰਦਾਸ ਕਰਦਾ ਹੈ ਕਿ ਆਪ ਜੀ ਸਮਰੱਥਾ ਬਖਸ਼ੋ ਤਾ ਕਿ ਮੈਂ ਦਿੱਲੀ ਵਿਚ ਆਪ ਜੀਆ ਦੇ ਪਾਵਨ ਅਸਥਾਨਾਂ ਨੂੰ ਦੁਸ਼ਟਾ ਕੋਲੋਂ ਮੁਕਤ ਕਰਵਾਵਾ ਤੇ ਮੁੜ ਉਸਾਰ ਕੇ ਪੰਥ ਖਾਲਸੇ ਦੀਆ ਖੁਸ਼ੀਆ ਹਾਸਿਲ ਕਰ ਸਕਾਂ,,, ਤਾਕਤ ਬਖਸ਼ੋ ਸਤਿਗੁਰੂ ਜੀਓ,,,
ਹੇ ਧੰਨ ਧੰਨ ਸੱਚੇ ਪਾਤਸ਼ਾਹ ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦਰ ਜੀ ਮਹਾਰਾਜ ਜੀਓ ਆਪ ਜੀ ਇਹ ਸੇਵਾ ਮੇਰੀ ਝੋਲੀ ਪਾਓ,,,
,,ਏਨੇ ਨੂੰ ਨਵਾਬ ਕਪੂਰ ਸਿੰਘ ਅਕਾਲ ਬੁੰਗੇ ਤੋਂ ਬਾਹਰ ਆਏ,,,,
,,, ਹੋਰ ਭਾਈ ਝਬਾਲੀਓ,,ਕੀ ਹਾਲ ਆ ਤੁਹਾਡੇ,,,
ਚੜ੍ਹਦੀ ਕਲਾ ਜੀ,,,,
ਬਾਬਾ ਬੋਲਿਆ ਤੇ ਬਾਲ ਨੇ,,, ਨਵਾਬ ਸਾਹਬ ਦੇ ਚਰਨ ਛੂਹੇ,,,,,,,
,,,,ਇਹ ਬਾਲ ਤਾਂ ਪੂਰਾ ਜੰਗੀ ਹੈ ਭਾਈ,,,
ਕੀ ਨਾਓ ਹੈ ਯੋਧੇ ਦਾ,,, ਨਵਾਬ ਕਪੂਰ ਸਿੰਘ ਜੀ ਨੇ ਬਾਲ ਨੂੰ ਪੁਛਿਆ,,,,
,,,ਜੀ ਬਘੇਲ ਸਿੰਘ,,,,,ਬਾਲ ਨੇ ਨਾਂ ਦੱਸਿਆ,,
ਨਵਾਬ ਕਪੂਰ ਸਿੰਘ ਨੇ ਬਾਲ ਦੀਆਂ ਅੱਖਾਂ ਵਿਚ ਦੇਖਕੇ ਕਿਹਾ,,,
,,,,, ਸਰਦਾਰ ਬਘੇਲ ਸਿੰਘ ਰਣਾ ਦਾ ਜੇਤੂ ਬਣੇਗਾ।ਪੰਥ ਖਾਲਸੇ ਦੀ ਵੱਡੀ ਸੇਵਾ ਕਰੇਗਾ,,,ਇਹ ਨਾਮ,, ਸਰਦਾਰ ਬਘੇਲ ਸਿੰਘ,, ਆਉਣ ਵਾਲੀਆਂ ਨਸਲਾਂ ਮਾਂਣ ਨਾਲ ਲਿਆ ਕਰਨਗੀਆਂ,,
(ਸਰੋਤ,,,, ਬੇਲਿਓ ਨਿਕਲਦੇ ਸ਼ੇਰ,,,,)
#ਮਾਲਵਿੰਦਰ ਸਿੰਘ ਬਮਾਲ
ਅੰਗ : 694
ਧਨਾਸਰੀ ਭਗਤ ਰਵਿਦਾਸ ਜੀ ਕੀ ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥ ਹਮ ਸਰਿ ਦੀਨੁ ਦਇਆਲੁ ਨ ਤੁਮ ਸਰਿ ਅਬ ਪਤੀਆਰੁ ਕਿਆ ਕੀਜੈ ॥ ਬਚਨੀ ਤੋਰ ਮੋਰ ਮਨੁ ਮਾਨੈ ਜਨ ਕਉ ਪੂਰਨੁ ਦੀਜੈ ॥੧॥ ਹਉ ਬਲਿ ਬਲਿ ਜਾਉ ਰਮਈਆ ਕਾਰਨੇ ॥ ਕਾਰਨ ਕਵਨ ਅਬੋਲ ॥ ਰਹਾਉ ॥ ਬਹੁਤ ਜਨਮ ਬਿਛੁਰੇ ਥੇ ਮਾਧਉ ਇਹੁ ਜਨਮੁ ਤੁਮ੍ਹ੍ਹਾਰੇ ਲੇਖੇ ॥ ਕਹਿ ਰਵਿਦਾਸ ਆਸ ਲਗਿ ਜੀਵਉ ਚਿਰ ਭਇਓ ਦਰਸਨੁ ਦੇਖੇ ॥੨॥੧॥
ਅਰਥ: (ਹੇ ਮਾਧੋ!) ਮੇਰੇ ਵਰਗਾ ਕੋਈ ਨਿਮਾਣਾ ਨਹੀਂ, ਤੇ, ਤੇਰੇ, ਵਰਗਾ ਹੋਰ ਕੋਈ ਦਇਆ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਨਹੀਂ, (ਮੇਰੀ ਕੰਗਾਲਤਾ ਦਾ) ਹੁਣ ਹੋਰ ਪਰਤਾਵਾ ਕਰਨ ਦੀ ਲੋੜ ਨਹੀਂ। (ਹੇ ਸੋਹਣੇ ਰਾਮ!) ਮੈਨੂੰ ਦਾਸ ਨੂੰ ਇਹ ਪੂਰਨ ਸਿਦਕ ਬਖ਼ਸ਼ ਕਿ ਮੇਰਾ ਮਨ ਤੇਰੀ ਸਿਫ਼ਤਿ-ਸਾਲਾਹ ਦੀਆਂ ਗੱਲਾਂ ਵਿਚ ਪਰਚ ਜਾਇਆ ਕਰੇ।੧। ਹੇ ਸੋਹਣੇ ਰਾਮ! ਮੈਂ ਤੈਥੋਂ ਸਦਾ ਸਦਕੇ ਹਾਂ; ਤੂੰ ਕਿਸ ਗੱਲੇ ਮੇਰੇ ਨਾਲ ਨਹੀਂ ਬੋਲਦਾ?।ਰਹਾਉ। ਰਵਿਦਾਸ ਜੀ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ -ਹੇ ਮਾਧੋ! ਕਈ ਜਨਮਾਂ ਤੋਂ ਮੈਂ ਤੈਥੋਂ ਵਿਛੁੜਿਆ ਆ ਰਿਹਾ ਹਾਂ (ਮਿਹਰ ਕਰ, ਮੇਰਾ) ਇਹ ਜਨਮ ਤੇਰੀ ਯਾਦ ਵਿਚ ਬੀਤੇ; ਤੇਰਾ ਦੀਦਾਰ ਕੀਤਿਆਂ ਬੜਾ ਚਿਰ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ, (ਦਰਸ਼ਨ ਦੀ) ਆਸ ਵਿਚ ਹੀ ਮੈਂ ਜੀਊਂਦਾ ਹਾਂ ॥੨॥੧॥
अंग : 694
धनासरी, भगत रवि दास जी की ੴ सतिगुर परसाद हम सरि दीनु दइआल न तुम सरि अब पतिआरू किया कीजे ॥ बचनी तोर मोर मनु माने जन कऊ पूरण दीजे ॥१॥ हउ बलि बलि जाउ रमईआ कारने ॥ कारन कवन अबोल ॥ रहाउ ॥ बहुत जनम बिछुरे थे माधउ इहु जनमु तुम्हारे लेखे ॥ कहि रविदास आस लगि जीवउ चिर भइओ दरसनु देखे ॥२॥१॥
अर्थ: (हे माधो मेरे जैसा कोई दीन और कंगाल नहीं हे और तेरे जैसा कोई दया करने वाला नहीं, (मेरी कंगालता का) अब और परतावा करने की जरुरत नहीं (हे सुंदर राम!) मुझे दास को यह सिदक बक्श की मेरा मन तेरी सिफत सलाह की बाते करने में ही लगा रहे।१। हे सुंदर राम! में तुझसे सदके हूँ, तू किस कारण मेरे साथ नहीं बोलता?||रहाउ|| रविदास जी कहते हैं- हे माधो! कई जन्मो से मैं तुझ से बिछुड़ा आ रहा हूँ (कृपा कर, मेरा) यह जनम तेरी याद में बीते; तेरा दीदार किये बहुत समां हो गया है, (दर्शन की) आस में जीवित हूँ॥२॥१॥
ਉਂਝ ਭਾਵੇਂ ਸਿੱਖ ਇਤਿਹਾਸ ਵਿਚ ਇਕ ਤੋਂ ਇਕ ਮਹਾਨ ਸਿੱਖ ਜਰਨੈਲ ਹੋਏ ਹਨ। ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਸਿੱਖ ਧਰਮ ਲਈ ਆਪੋ ਅਪਣੀ ਭੂਮਿਕਾ ਨਿਭਾਈ ਹੈ,ਅਜਿਹਾ ਹੀ ਇਕ ਨਾਮ ਅਕਾਲੀ ਬਾਬਾ ਫੂਲਾ ਸਿੰਘ ਜੀ ਦਾ ਹੈ।
14 ਜਨਵਰੀ 1761 ਈਸਵੀ ਨੂੰ ਪਿਤਾ ਈਸਰ ਸਿੰਘ ਮਾਤਾ ਹਰਿ ਕੌਰ ਜੀ ਦੀ ਕੁਖੋਂ ਪਿੰਡ ਦੇਹਲਾ ਸੀਹਾਂ, ਤਹਿਸੀਲ ਮੂਨਕ, ਜ਼ਿਲ੍ਹਾ ਸੰਗਰੂਰ ਵਿਖੇ ਜਨਮ ਲੈਣ ਵਾਲੇ ਅਕਾਲੀ ਫੂਲਾ ਸਿੰਘ ਬਚਪਨ ਵਿਚ ਫੁਲ ਵਰਗੇ ਸੁੰਦਰ ਬਾਲਕ ਸਨ। ਜਿਸ ਨੂੰ ਵੇਖ ਕੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਪਿਤਾ ਜੀ ਨੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਨਾਮ ਫੂਲਾ ਸਿੰਘ ਰੱਖ ਦਿਤਾ ਸੀ।
ਅਕਾਲੀ ਬਾਬਾ ਫੂਲਾ ਸਿੰਘ ਜੀ ਅਜੇ ਦੋ ਸਾਲਾ ਦੇ ਸਨ ਜਦੋਂ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਪਿਤਾ ਸ੍ਰ: ਈਸਰ ਸਿੰਘ ਨੇ ਸ਼ਹੀਦ ਮਿਸਲ ਦੇ ਜਥੇਦਾਰ ਬਾਬਾ ਨੈਣਾ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਆਪ ਜੀ ਦੀ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਸੌਂਪ ਦਿਤੀ ਸੀ। ਛੋਟੀ ਉਮਰ ਵਿਚ ਹੀ ਅਕਾਲੀ ਫੂਲਾ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਗੁਰਮੁਖੀ ਅੱਖਰ ਤੇ ਨਿਤਨੇਮ ਦੀਆਂ ਬਾਣੀਆਂ ਕੰਠ ਹੋ ਗਈਆਂ ਸਨ। ਬਾਬਾ ਅਕਾਲੀ ਬਾਬਾ ਫੂਲਾ ਸਿੰਘ ਅਕਾਲ ਤਖ਼ਤ ਸਾਹਿਬ ਦੇ 6ਵੇਂ ਜਥੇਦਾਰ ਸਨ।
ਅਕਾਲੀ ਬਾਬਾ ਫੂਲਾ ਸਿੰਘ ਜੀ ਇਕ ਅਨੋਖੇ ਜਰਨੈਲ ਸਨ। ਉਹ ਦੁਸ਼ਮਣ ਦੇ ਵਿਰੁਧ ਬੜੀ ਬਹਾਦਰੀ ਨਾਲ ਲੜ ਕੇ ਜਿੱਤ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਦੇ ਸਨ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਆਪਣੀ ਇਕ ਫ਼ੌਜ ਤਿਆਰ ਕੀਤੀ ਹੋਈ ਸੀ ਜੋ ਲੜਾਈ ਦੇ ਮੈਦਾਨ ਵਿਚ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦਾ ਸਾਥ ਨਿਭਾਉਂਦੀ ਸੀ। ਆਪ ਜੀ ਦੇ ਨਾਂਅ ਕਸੂਰ ਦੀ ਜਿੱਤ, ਮੁਲਤਾਨ ਦੀ ਜਿੱਤ, ਪਿਸ਼ਾਵਰ ਦੀ ਜਿੱਤ, ਕਸ਼ਮੀਰ ਦੀ ਜਿੱਤ, ਨੁਸਹਿਰੇ ਦੀ ਜਿੱਤ ਵਰਗੀਆਂ ਮਹਤਵਪੂਰਨ ਜਿੱਤਾਂ ਦਰਜ ਹਨ।
ਅਕਾਲੀ ਬਾਬਾ ਫੂਲਾ ਸਿੰਘ ਜੀ ਜਦੋਂ ਜੰਗ ਲਈ ਜਾਂਦੇ ਸਨ ਤੇ ਅਟਕ ਵਰਗੇ ਵੱਡੇ-ਵੱਡੇ ਦਰਿਆ ਵੀ ਰਾਹ ਛਡ ਦਿੰਦੇ ਸਨ। ਉਸ ਸਮੇਂ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਵੀ ਅਕਾਲੀ ਫੂਲਾ ਸਿੰਘ ਦਾ ਬੇਹੱਦ ਸਤਿਕਾਰ ਕਰਦੇ ਸਨ। ਇਸ ਦਾ ਕਾਰਨ ਇਹ ਸੀ ਕਿ ਜਦੋਂ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਨੇ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਨੂੰ ਫਤਿਹ ਕਰਨ ਲਈ ਚੜ੍ਹਾਈ ਕੀਤੀ ਤਾਂ ਸਿੱਖ ਫ਼ੌਜਾਂ ਆਪਸ ਵਿਚ ਲੜਨ ਲੱਗੀਆਂ ਸਨ।
ਉਹ ਅਕਾਲੀ ਫੂਲਾ ਸਿੰਘ ਹੀ ਸਨ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਦਖਲ ਦੇ ਕੇ ਲੜਾਈ ਬੰਦ ਕਰਵਾਈ ਸੀ। ਇਤਿਹਾਸ ਗਵਾਹ ਹੈ ਕਿ ਉਹ ਮਰਿਆਦਾ ਦੇ ਉਲਟ ਕਿਸੇ ਵੀ ਕਾਰਵਾਈ ਨੂੰ ਬਰਦਾਸ਼ਤ ਨਹੀਂ ਸਨ ਕਰਦੇ। ਇਸੇ ਦਾ ਹੀ ਨਤੀਜਾ ਸੀ ਕਿ ਸ੍ਰੀ ਅਕਾਲ ਤਖ਼ਤ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਜਥੇਦਾਰ ਹੁੰਦਿਆਂ ਅਕਾਲੀ ਫੂਲਾ ਸਿੰਘ ਜੀ ਨੇ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਕੋੜੇ ਮਾਰਨ ਦੀ ਸਜ਼ਾ ਸੁਣਾਈ ਦਿਤੀ ਸੀ।
ਅਕਾਲੀ ਫੂਲਾ ਸਿੰਘ ਨੇ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੀਆਂ ਔਖੀਆਂ ਮੁਹਿੰਮਾਂ ਵਿਚ ਹਮੇਸ਼ਾ ਸਹਾਇਤਾ ਕੀਤੀ। ਅਕਾਲੀ ਬਾਬਾ ਫੂਲਾ ਸਿੰਘ ਵਲੋਂ ਲੜੀ ਗਈ ਆਖਰੀ ਲੜਾਈ ਨੌਸ਼ਹਿਰੇ ਦੀ ਸੀ, ਜਿਸ ਵਿਚ ਜਿੱਤ ਦਾ ਝੰਡਾ ਲਹਿਰਾਉਂਦਿਆਂ ਆਪ 14 ਮਾਰਚ 1823 ਨੂੰ ਸ਼ਹੀਦ ਹੋ ਗਏ। ਇਹ ਲੜਾਈ ਵੀ ਬਾਕੀ ਲੜਾਈਆਂ ਦੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਆਪ ਦੀ ਸੂਰਬੀਰਤਾ ਕਰਕੇ ਜਿੱਤੀ ਜਾ ਸਕੀ ਸੀ।
ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਵਿਖੇ ਆਪ ਜਿਸ ਸਥਾਨ ‘ਤੇ ਰਹੇ, ਉਥੇ ਅੱਜਕੱਲ੍ਹ ‘ਬੁਰਜ ਬਾਬਾ ਫੂਲਾ ਸਿੰਘ ਅਕਾਲੀ’ ਬਣਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ। ਇਥੇ ਹੀ ਛਾਉਣੀ ਨਿਹੰਗ ਸਿੰਘਾਂ ਵੀ ਹੈ, ਜਿਸ ਦਾ ਪ੍ਰਬੰਧ ਸ਼੍ਰੋਮਣੀ ਪੰਥ ਅਕਾਲੀ ਬੁੱਢਾ ਦਲ ਕੋਲ ਹੈ। ਹਰ ਸਾਲ 14 ਮਾਰਚ ਨੂੰ ਆਪ ਜੀ ਦਾ ਸ਼ਹੀਦੀ ਦਿਹਾੜਾ ਸ਼੍ਰੋਮਣੀ ਪੰਥ ਅਕਾਲੀ ਬੁੱਢਾ ਦਲ ਦੇ ਮੁਖੀ ਜਥੇਦਾਰ ਬਾਬਾ ਬਲਬੀਰ ਸਿੰਘ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਹੇਠ ਮਨਾਇਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਅਕਾਲੀ ਫੂਲਾ ਸਿੰਘ ਦਾ ਨਾਂ ਸਿੱਖ ਇਤਿਹਾਸ ਦੇ ਪੰਨਿਆਂ ‘ਤੇ ਸੁਨਹਿਰੀ ਅੱਖਰਾਂ ਵਿਚ ਦਰਜ ਹੈ।
ਅੰਗ : 653
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੪ ॥ ਗੁਰਮੁਖਿ ਅੰਤਰਿ ਸਾਂਤਿ ਹੈ ਮਨਿ ਤਨਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਇ ॥ ਨਾਮੋ ਚਿਤਵੈ ਨਾਮੁ ਪੜੈ ਨਾਮਿ ਰਹੈ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥ ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਪਾਇਆ ਚਿੰਤਾ ਗਈ ਬਿਲਾਇ ॥ ਸਤਿਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਨਾਮੁ ਊਪਜੈ ਤਿਸਨਾ ਭੁਖ ਸਭ ਜਾਇ ॥ ਨਾਨਕ ਨਾਮੇ ਰਤਿਆ ਨਾਮੋ ਪਲੈ ਪਾਇ ॥੧॥ ਮਃ ੪ ॥ ਸਤਿਗੁਰ ਪੁਰਖਿ ਜਿ ਮਾਰਿਆ ਭ੍ਰਮਿ ਭ੍ਰਮਿਆ ਘਰੁ ਛੋਡਿ ਗਇਆ ॥ ਓਸੁ ਪਿਛੈ ਵਜੈ ਫਕੜੀ ਮੁਹੁ ਕਾਲਾ ਆਗੈ ਭਇਆ ॥ ਓਸੁ ਅਰਲੁ ਬਰਲੁ ਮੁਹਹੁ ਨਿਕਲੈ ਨਿਤ ਝਗੂ ਸੁਟਦਾ ਮੁਆ ॥ ਕਿਆ ਹੋਵੈ ਕਿਸੈ ਹੀ ਦੈ ਕੀਤੈ ਜਾਂ ਧੁਰਿ ਕਿਰਤੁ ਓਸ ਦਾ ਏਹੋ ਜੇਹਾ ਪਇਆ ॥ ਜਿਥੈ ਓਹੁ ਜਾਇ ਤਿਥੈ ਓਹੁ ਝੂਠਾ ਕੂੜੁ ਬੋਲੇ ਕਿਸੈ ਨ ਭਾਵੈ ॥ ਵੇਖਹੁ ਭਾਈ ਵਡਿਆਈ ਹਰਿ ਸੰਤਹੁ ਸੁਆਮੀ ਅਪੁਨੇ ਕੀ ਜੈਸਾ ਕੋਈ ਕਰੈ ਤੈਸਾ ਕੋਈ ਪਾਵੈ ॥ ਏਹੁ ਬ੍ਰਹਮ ਬੀਚਾਰੁ ਹੋਵੈ ਦਰਿ ਸਾਚੈ ਅਗੋ ਦੇ ਜਨੁ ਨਾਨਕੁ ਆਖਿ ਸੁਣਾਵੈ ॥੨॥ ਪਉੜੀ ॥ ਗੁਰਿ ਸਚੈ ਬਧਾ ਥੇਹੁ ਰਖਵਾਲੇ ਗੁਰਿ ਦਿਤੇ ॥ ਪੂਰਨ ਹੋਈ ਆਸ ਗੁਰ ਚਰਣੀ ਮਨ ਰਤੇ ॥ ਗੁਰਿ ਕ੍ਰਿਪਾਲਿ ਬੇਅੰਤਿ ਅਵਗੁਣ ਸਭਿ ਹਤੇ ॥ ਗੁਰਿ ਅਪਣੀ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰਿ ਅਪਣੇ ਕਰਿ ਲਿਤੇ ॥ ਨਾਨਕ ਸਦ ਬਲਿਹਾਰ ਜਿਸੁ ਗੁਰ ਕੇ ਗੁਣ ਇਤੇ ॥੨੭॥
ਅਰਥ: ਜੇ ਮਨੁੱਖ ਸਤਿਗੁਰੂ ਦੇ ਸਨਮੁਖ ਹੈ ਉਸ ਦੇ ਅੰਦਰ ਠੰਢ ਹੈ ਤੇ ਉਹ ਮਨੋਂ ਤਨੋਂ ਨਾਮ ਵਿਚ ਲੀਨ ਰਹਿੰਦੀ ਹੈ। ਉਹ ਨਾਮ ਹੀ ਚਿਤਾਰਦਾ ਹੈ, ਨਾਮ ਹੀ ਪੜ੍ਹਦਾ ਹੈ ਤੇ ਨਾਮ ਵਿਚ ਹੀ ਬ੍ਰਿਤੀ ਜੋੜੀ ਰੱਖਦਾ ਹੈ। ਨਾਮ (ਰੂਪ) ਸੁੰਦਰ ਵਸਤ ਲੱਭ ਕੇ ਉਸ ਦੀ ਚਿੰਤਾ ਦੂਰ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਜੇ ਗੁਰੂ ਮਿਲ ਪਏ ਤਾਂ ਨਾਮ (ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ) ਪੁੰਗਰਦਾ ਹੈ, ਤ੍ਰਿਸ਼ਨਾ ਦੂਰ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ (ਮਾਇਆ ਦੀ) ਭੁੱਖ ਸਾਰੀ ਦੂਰ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਹੇ ਨਾਨਕ ਜੀ! ਨਾਮ ਵਿਚ ਰੰਗੇ ਜਾਣ ਕਰਕੇ ਨਾਮ ਹੀ (ਹਿਰਦੇ-ਰੂਪ) ਪੱਲੇ ਵਿਚ ਉੱਕਰਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ॥੧॥ ਜੋ ਮਨੁੱਖ ਗੁਰੂ ਪਰਮੇਸਰ ਵਲੋਂ ਮਾਰਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ (ਭਾਵ, ਜਿਸਨੂੰ ਰੱਬ ਵਾਲੇ ਪਾਸੇ ਤੋਂ ਉੱਕਾ ਹੀ ਨਫ਼ਰਤ ਹੈ) ਉਹ ਭਰਮ ਵਿਚ ਭਟਕਦਾ ਹੋਇਆ ਆਪਣੇ ਟਿਕਾਣੇ ਤੋਂ ਹਿੱਲ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਉਸ ਦੇ ਪਿੱਛੇ ਲੋਕ ਫੱਕੜੀ ਵਜਾਂਦੇ ਹਨ, ਤੇ ਅੱਗੇ (ਜਿਥੇ ਜਾਂਦਾ ਹੈ) ਮੁਕਾਲਖ ਖੱਟਦਾ ਹੈ। ਉਸ ਦੇ ਮੂੰਹੋਂ ਨਿਰਾ ਬਕਵਾਸ ਹੀ ਨਿਕਲਦਾ ਹੈ ਉਹ ਸਦਾ ਨਿੰਦਾ ਕਰ ਕੇ ਹੀ ਦੁੱਖੀ ਹੁੰਦਾ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ। ਕਿਸੇ ਦੇ ਭੀ ਕੀਤਿਆਂ ਕੁਝ ਨਹੀਂ ਹੋ ਸਕਦਾ (ਭਾਵ, ਕੋਈ ਉਸ ਨੂੰ ਸੁਮੱਤ ਨਹੀਂ ਦੇ ਸਕਦਾ), ਕਿਉਂਕਿ ਮੁੱਢ ਤੋਂ (ਕੀਤੇ ਮੰਦੇ ਕਰਮਾਂ ਦੇ ਸੰਸਕਾਰਾਂ ਅਨੁਸਾਰ ਹੁਣ ਭੀ) ਇਹੋ ਜਿਹੀ (ਭਾਵ, ਨਿੰਦਾ ਦੀ ਮੰਦੀ) ਕਮਾਈ ਕਰਨੀ ਪਈ ਹੈ। ਉਹ (ਮਨਮੁਖ) ਜਿਥੇ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਉਥੇ ਹੀ ਝੂਠਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਝੂਠ ਬੋਲਦਾ ਹੈ ਤੇ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਚੰਗਾ ਨਹੀਂ ਲੱਗਦਾ। ਹੇ ਸੰਤ ਜਨੋਂ! ਪਿਆਰੇ ਮਾਲਕ ਪ੍ਰਭੂ ਦੀ ਵਡਿਆਈ ਵੇਖੋ, ਕਿ ਜਿਹੋ ਜਿਹੀ ਕੋਈ ਕਮਾਈ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਉਹੋ ਜਿਹਾ ਉਸ ਨੂੰ ਫਲ ਮਿਲਦਾ ਹੈ। ਇਹ ਸੱਚੀ ਵਿਚਾਰ ਸੱਚੀ ਦਰਗਾਹ ਵਿਚ ਹੁੰਦੀ ਹੈ, ਦਾਸ ਨਾਨਕ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਤੁਹਾਨੂੰ ਆਖ ਕੇ ਸੁਣਾ ਰਿਹਾ ਹੈ (ਤਾਂ ਜੁ ਭਲਾ ਬੀਜ ਬੀਜ ਕੇ ਭਲੇ ਫਲ ਦੀ ਆਸ ਹੋ ਸਕੇ) ॥੨॥ ਸੱਚੇ ਸਤਿਗੁਰੂ ਨੇ (ਸਤਸੰਗ-ਰੂਪ) ਪਿੰਡ ਵਸਾਇਆ ਹੈ, (ਉਸ ਪਿੰਡ ਲਈ ਸਤਸੰਗੀ) ਰਾਖੇ ਭੀ ਸਤਿਗੁਰੂ ਨੇ ਹੀ ਦਿੱਤੇ ਹਨ। ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਮਨ ਗੁਰੂ ਦੇ ਚਰਨਾਂ ਵਿਚ ਜੁੜੇ ਹਨ, ਉਹਨਾਂ ਦੀ ਆਸ ਪੂਰਨ ਹੋ ਗਈ ਹੈ (ਭਾਵ, ਤ੍ਰਿਸ਼ਨਾ ਮਿਟ ਗਈ ਹੈ)। ਦਿਆਲ ਤੇ ਬੇਅੰਤ ਗੁਰੂ ਨੇ ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਸਾਰੇ ਪਾਪ ਨਾਸ ਕਰ ਦਿੱਤੇ ਹਨ। ਆਪਣੀ ਮੇਹਰ ਕਰ ਕੇ ਸਤਿਗੁਰੂ ਨੇ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣਾ ਬਣਾ ਲਿਆ ਹੈ। ਹੇ ਨਾਨਕ ਜੀ! ਮੈਂ ਸਦਾ ਉਸ ਸਤਿਗੁਰੂ ਤੋਂ ਸਦਕੇ ਹਾਂ, ਜਿਸ ਵਿਚ ਇਤਨੇ ਗੁਣ ਹਨ ॥੨੭॥
अंग : 653
सलोकु मः ४ ॥ गुरमुखि अंतरि सांति है मनि तनि नामि समाइ ॥ नामो चितवै नामु पड़ै नामि रहै लिव लाइ ॥ नामु पदारथु पाइआ चिंता गई बिलाइ ॥ सतिगुरि मिलिऐ नामु ऊपजै तिसना भुख सभ जाइ ॥ नानक नामे रतिआ नामो पलै पाइ ॥१॥ मः ४ ॥ सतिगुर पुरखि जि मारिआ भ्रमि भ्रमिआ घरु छोडि गइआ ॥ ओसु पिछै वजै फकड़ी मुहु काला आगै भइआ ॥ ओसु अरलु बरलु मुहहु निकलै नित झगू सुटदा मुआ ॥ किआ होवै किसै ही दै कीतै जां धुरि किरतु ओस दा एहो जेहा पइआ ॥ जिथै ओहु जाइ तिथै ओहु झूठा कूड़ु बोले किसै न भावै ॥ वेखहु भाई वडिआई हरि संतहु सुआमी अपुने की जैसा कोई करै तैसा कोई पावै ॥ एहु ब्रहम बीचारु होवै दरि साचै अगो दे जनु नानकु आखि सुणावै ॥२॥ पउड़ी ॥ गुरि सचै बधा थेहु रखवाले गुरि दिते ॥ पूरन होई आस गुर चरणी मन रते ॥ गुरि क्रिपालि बेअंति अवगुण सभि हते ॥ गुरि अपणी किरपा धारि अपणे करि लिते ॥ नानक सद बलिहार जिसु गुर के गुण इते ॥२७॥
अर्थ: अगर मनुष्य सतिगुरू के सनमुख है उसके अंदर ठंड है और वह मन से तन से नाम में लीन रहती है। वह नाम ही सिमरता है, नाम ही पढ़ता है और नाम में ही बिरती जोड़ी रखता है। नाम (रूप) सुंदर वस्तु ख़ोज कर उस की चिंता दूर हो जाती है। अगर गुरू मिल जाए तो नाम (हृदय में) पैदा होता है, तृष्णा दूर हो जाती है (माया की) भूख सारी दूर हो जाती है। हे नानक जी! नाम में रंगे जाने के कारण ही नाम ही (हृदय-रूप) पल्ले में उघड़ जाता है ॥१॥ जो मनुष्य गुरू परमेश्वर की तरफ़ से मरा हुआ है (भावार्थ, जिस को रब वाली तरफ़ से ही नफ़रत है) वह भ्रम में भटकता हुआ अपने टिकाने से भटक जाता है। उस के पीछे लोग फकड़ी वजाते हैं, और आगे (जहाँ जाता है) मुकालख खटता है। उस के मुँहों बहुत बकवास ही निकलती है वह सदा निंदा कर के ही दुखी होता रहता है। किसी के भी किया कुछ नहीं हो सकता (भावार्थ, कोई उस को सुमति नहीं दे सकता), क्योंकि शुरू से (किए मंदे कर्मों के संस्कारों के अनुसार अब भी) इस तरह की (भावार्थ, निंदा की मंदी) कमाई करनी पई है। वह (मनमुख) जहाँ जाता है वहाँ ही झूठा होता है, झूठ बोलता है और किसी को अच्छा नहीं लगता। हे संत जनों! प्यारे मालिक प्रभू की वडियाई देखो, कि जिस तरह की कोई कमाई करता है, उस तरह का उस को फल मिलता है। यह सच्ची विचार सच्ची दरगाह में होती है, दास नानक पहले ही आप को कह कर सुना रहा है (तां जो भला बीज बीज कर भले फल की आस हो सके) ॥२॥ सच्चे सतिगुरू ने (सत्संग-रूप) गांव वसाया है, (उस गांव के लिए सत्संगी) रक्षक भी सतिगुरू ने ही दिए हैं। जिनके मन गुरू के चरणों में जुड़े हैं, उनकी आस पूर्ण हो गई है (भावार्थ, तृष्णा मिट गई है)। दयाल और बेअंत गुरू ने उनके सारे पाप नाश कर दिए हैं। अपनी मेहर कर के सतिगुरू ने उनको अपना बना लिया है। हे नानक जी! मैं सदा उस सतिगुरू से कुर्बान जाता हूँ, जिस में इतने गुण हैं ॥२७॥
ਅੰਗ : 588
ਸਲੋਕ ਮਃ ੩ ॥ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਦਾਧੀ ਜਲਿ ਮੁਈ ਜਲਿ ਜਲਿ ਕਰੇ ਪੁਕਾਰ ॥ ਸਤਿਗੁਰ ਸੀਤਲ ਜੇ ਮਿਲੈ ਫਿਰਿ ਜਲੈ ਨ ਦੂਜੀ ਵਾਰ ॥ ਨਾਨਕ ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਨਿਰਭਉ ਕੋ ਨਹੀ ਜਿਚਰੁ ਸਬਦਿ ਨ ਕਰੇ ਵੀਚਾਰੁ ॥੧॥ ਮਃ ੩ ॥ ਭੇਖੀ ਅਗਨਿ ਨ ਬੁਝਈ ਚਿੰਤਾ ਹੈ ਮਨ ਮਾਹਿ ॥ ਵਰਮੀ ਮਾਰੀ ਸਾਪੁ ਨਾ ਮਰੈ ਤਿਉ ਨਿਗੁਰੇ ਕਰਮ ਕਮਾਹਿ ॥ ਸਤਿਗੁਰੁ ਦਾਤਾ ਸੇਵੀਐ ਸਬਦੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਆਇ ॥ ਮਨੁ ਤਨੁ ਸੀਤਲੁ ਸਾਂਤਿ ਹੋਇ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਅਗਨਿ ਬੁਝਾਇ ॥ ਸੁਖਾ ਸਿਰਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ਜਾ ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਵਾਇ ॥ ਗੁਰਮੁਖਿ ਉਦਾਸੀ ਸੋ ਕਰੇ ਜਿ ਸਚਿ ਰਹੈ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥ ਚਿੰਤਾ ਮੂਲਿ ਨ ਹੋਵਈ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਰਜਾ ਆਘਾਇ ॥ ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਨਹ ਛੂਟੀਐ ਹਉਮੈ ਪਚਹਿ ਪਚਾਇ ॥੨॥ ਪਉੜੀ ॥ ਜਿਨੀ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਤਿਨੀ ਪਾਇਅੜੇ ਸਰਬ ਸੁਖਾ ॥ ਸਭੁ ਜਨਮੁ ਤਿਨਾ ਕਾ ਸਫਲੁ ਹੈ ਜਿਨ ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮ ਕੀ ਮਨਿ ਲਾਗੀ ਭੁਖਾ ॥ ਜਿਨੀ ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਆਰਾਧਿਆ ਤਿਨ ਵਿਸਰਿ ਗਏ ਸਭਿ ਦੁਖਾ ॥ ਤੇ ਸੰਤ ਭਲੇ ਗੁਰਸਿਖ ਹੈ ਜਿਨ ਨਾਹੀ ਚਿੰਤ ਪਰਾਈ ਚੁਖਾ ॥ ਧਨੁ ਧੰਨੁ ਤਿਨਾ ਕਾ ਗੁਰੂ ਹੈ ਜਿਸੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਫਲ ਹਰਿ ਲਾਗੇ ਮੁਖਾ ॥੬॥
ਅਰਥ: ਦੁਨੀਆ ਤ੍ਰਿਸ਼ਨਾ ਦੀ ਸਾੜੀ ਹੋਈ ਦੁੱਖੀ ਹੋ ਰਹੀ ਹੈ, ਸੜ ਸੜ ਕੇ ਵਿਲਕ ਰਹੀ ਹੈ; ਜੇ ਇਹ ਠੰਡ ਪਾਣ ਵਾਲੇ ਗੁਰੂ ਨੂੰ ਮਿਲ ਪਏ, ਤਾਂ ਫਿਰ ਦੂਜੀ ਵਾਰੀ ਨਾਹ ਸੜੇ; (ਕਿਉਂਕਿ) ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਜੀ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ, ਹੇ ਨਾਨਕ! ਜਦ ਤਕ ਗੁਰੂ ਦੇ ਸ਼ਬਦ ਦੀ ਰਾਹੀਂ ਮਨੁੱਖ ਪ੍ਰਭੂ ਦੀ ਵਿਚਾਰ ਨਾਹ ਕਰੇ ਤਦ ਤਕ (ਨਾਮ ਨਹੀਂ ਮਿਲਦਾ, ਤੇ) ਨਾਮ ਤੋਂ ਬਿਨਾ ਕਿਸੇ ਦਾ ਭੀ ਡਰ ਨਹੀਂ ਮੁੱਕਦਾ (ਇਹ ਡਰ ਤੇ ਸਹਿਮ ਹੀ ਮੁੜ ਮੁੜ ਤ੍ਰਿਸ਼ਨਾ ਦੇ ਅਧੀਨ ਕਰਦਾ ਹੈ)।1। ਭੇਖ ਧਾਰਿਆਂ (ਤ੍ਰਿਸ਼ਨਾ ਦੀ) ਅੱਗ ਨਹੀਂ ਬੁੱਝਦੀ, ਮਨ ਵਿਚ ਚਿੰਤਾ ਟਿਕੀ ਰਹਿੰਦੀ ਹੈ; ਜਿਵੇਂ ਸੱਪ ਦੀ ਰੁੱਡ ਬੰਦ ਕੀਤਿਆਂ ਸੱਪ ਨਹੀਂ ਮਰਦਾ, ਤਿਵੇਂ ਹੀ ਉਹ ਮਨੁੱਖ ਕਰਮ ਕਰਦੇ ਹਨ ਜੋ ਗੁਰੂ ਦੀ ਸ਼ਰਨ ਨਹੀਂ ਆਉਂਦੇ (ਗੁਰੂ ਦੀ ਸ਼ਰਨ ਪੈ ਕੇ ਆਪਾ-ਭਾਵ ਮਿਟਾਉਣ ਤੋਂ ਬਿਨਾ ਤ੍ਰਿਸ਼ਨਾ ਦੀ ਅੱਗ ਬੁੱਝਦੀ ਨਹੀਂ)। ਜੇ (ਨਾਮ ਦੀ ਦਾਤਿ) ਦੇਣ ਵਾਲੇ ਗੁਰੂ ਦੀ ਦੱਸੀ ਹੋਈ ਕਾਰ ਕਰੀਏ ਤਾਂ ਗੁਰੂ ਦਾ ਸ਼ਬਦ ਮਨ ਵਿਚ ਆ ਵੱਸਦਾ ਹੈ, ਮਨ ਤਨ ਠੰਢਾ ਠਾਰ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਤ੍ਰਿਸ਼ਨਾ ਦੀ ਅੱਗ ਬੁਝ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ਤੇ ਮਨ ਵਿਚ ਸ਼ਾਂਤੀ ਪੈਦਾ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ; (ਗੁਰੂ ਦੀ ਸੇਵਾ ਵਿਚ) ਜਦੋਂ ਮਨੁੱਖ ਅਹੰਕਾਰ ਦੂਰ ਕਰਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਸਭ ਤੋਂ ਸ੍ਰੇਸ਼ਟ ਸੁਖ ਮਿਲਦਾ ਹੈ। ਗੁਰੂ ਦੇ ਸਨਮੁਖ ਹੋਇਆ ਹੋਇਆ ਉਹ ਮਨੁੱਖ ਹੀ (ਤ੍ਰਿਸ਼ਨਾ ਵਲੋਂ) ਤਿਆਗ ਕਰਦਾ ਹੈ ਜੋ ਸੱਚੇ ਨਾਮ ਵਿਚ ਸੁਰਤਿ ਜੋੜੀ ਰੱਖਦਾ ਹੈ, ਉਸ ਨੂੰ ਚਿੰਤਾ ਉੱਕਾ ਹੀ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦੀ, ਪ੍ਰਭੂ ਦੇ ਨਾਲ ਹੀ ਉਹ ਚੰਗੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਰੱਜਿਆ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ। ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਜੀ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ, ਹੇ ਨਾਨਕ! ਪ੍ਰਭੂ ਦਾ ਨਾਮ ਸਿਮਰਨ ਤੋਂ ਬਿਨਾ (ਤ੍ਰਿਸ਼ਨਾ ਦੀ ਅੱਗ ਤੋਂ) ਬਚ ਨਹੀਂ ਸਕੀਦਾ, (ਨਾਮ ਤੋਂ ਬਿਨਾ) ਜੀਵ ਅਹੰਕਾਰ ਵਿਚ ਪਏ ਸੜਦੇ ਹਨ। ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਮਨੁੱਖਾਂ ਨੇ ਪ੍ਰਭੂ ਦਾ ਨਾਮ ਸਿਮਰਿਆ ਹੈ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਸਾਰੇ ਸੁਖ ਮਿਲ ਗਏ ਹਨ, ਉਹਨਾਂ ਦਾ ਸਾਰਾ ਮਨੁੱਖਾ ਜੀਵਨ ਸਫਲ ਹੋਇਆ ਹੈ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਮਨ ਵਿਚ ਪ੍ਰਭੂ ਦੇ ਨਾਮ ਦੀ ਭੁੱਖ ਲੱਗੀ ਹੋਈ ਹੈ (ਭਾਵ, ‘ਨਾਮ’ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਦਾ ਆਸਰਾ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ)। ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਗੁਰੂ ਦੇ ਸ਼ਬਦ ਦੀ ਰਾਹੀਂ ਪ੍ਰਭੂ ਦਾ ਸਿਮਰਨ ਕੀਤਾ ਹੈ, ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਸਾਰੇ ਦੁਖ ਦੂਰ ਹੋ ਗਏ ਹਨ। ਉਹ ਗੁਰਸਿੱਖ ਚੰਗੇ ਸੰਤ ਹਨ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ (ਪ੍ਰਭੂ ਤੋਂ ਬਿਨਾ) ਹੋਰ ਕਿਸੇ ਦੀ ਰਤਾ ਭੀ ਆਸ ਨਹੀਂ ਰੱਖੀ; ਉਹਨਾਂ ਦਾ ਗੁਰੂ ਭੀ ਧੰਨ ਹੈ, ਭਾਗਾਂ ਵਾਲਾ ਹੈ, ਜਿਸ ਦੇ ਮੂੰਹ ਨੂੰ (ਪ੍ਰਭੂ ਦੀ ਸਿਫ਼ਤਿ-ਸਾਲਾਹ ਰੂਪ) ਅਮਰ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਫਲ ਲੱਗੇ ਹੋਏ ਹਨ (ਭਾਵ, ਜਿਸ ਦੇ ਮੂੰਹੋਂ ਪ੍ਰਭੂ ਦੀ ਵਡਿਆਈ ਦੇ ਬਚਨ ਨਿਕਲਦੇ ਹਨ)।6।
अंग : 588
सलोक मः ३ ॥ त्रिसना दाधी जलि मुई जलि जलि करे पुकार ॥ सतिगुर सीतल जे मिलै फिरि जलै न दूजी वार ॥ नानक विणु नावै निरभउ को नही जिचरु सबदि न करे वीचारु ॥१॥ मः ३ ॥ भेखी अगनि न बुझई चिंता है मन माहि ॥ वरमी मारी सापु ना मरै तिउ निगुरे करम कमाहि ॥ सतिगुरु दाता सेवीऐ सबदु वसै मनि आइ ॥ मनु तनु सीतलु सांति होइ त्रिसना अगनि बुझाइ ॥ सुखा सिरि सदा सुखु होइ जा विचहु आपु गवाइ ॥ गुरमुखि उदासी सो करे जि सचि रहै लिव लाइ ॥ चिंता मूलि न होवई हरि नामि रजा आघाइ ॥ नानक नाम बिना नह छूटीऐ हउमै पचहि पचाइ ॥२॥ पउड़ी ॥ जिनी हरि हरि नामु धिआइआ तिनी पाइअड़े सरब सुखा ॥ सभु जनमु तिना का सफलु है जिन हरि के नाम की मनि लागी भुखा ॥ जिनी गुर कै बचनि आराधिआ तिन विसरि गए सभि दुखा ॥ ते संत भले गुरसिख है जिन नाही चिंत पराई चुखा ॥ धनु धंनु तिना का गुरू है जिसु अंम्रित फल हरि लागे मुखा ॥६॥
अर्थ: दुनिया तृष्णा मे जली हुई दु:खी हो रही है, जल जल के पुकार रही है; अगर यह ठंडक पहुचाने वाले वाले गुरु से मिल जाए, तो फिर दूसरी बार ना जले; (क्योंकि) गुरू नानक जी स्वयं को कहते हैं, हे नानक ! जब तक गुरु के शब्द के द्वारा मनुख भगवान की विचार ना करे तब तक (नाम नहीं मिलता, और) नाम के बिना किसी का भी भय नहीं खत्म होता (यह भय और सहम ही बार बार तृष्णा के अधीन करता है) ।1 । भेख बनाने से (तृष्णा की) अग्नि नहीं बुझती,मन में चिंता टिकी रहती है; जैसे साँप की रुड बंद करने से साँप नहीं मरता, उसी प्रकार वह मनुख कर्म करते हैं जो गुरु की शरण नहीं आते (गुरु की शरण पड़ के आपा-भाव मिटाए बिना तृष्णा की अग्नि बुझती नहीं है) । अगर (नाम की दाति) देने वाले गुरु की बताई हुई कार करें तो गुरु का शब्द मन में आ बसता है, मन तन ठंढा ठार हो जाता है, तृष्णा की अग्नि बुझ जाती है और मन में शांती पैदा हो जाती है; (गुरु की सेवा में) जब मनुख अहंकार दूर करता है तो सब से श्रेष्ठ सुख मिलता है । गुरु के सनमुख हुआ वह मनुख ही (तृष्णा की तरफ से) त्याग करता है जो सच्चे नाम में सुरति जोड़ी रखता है, उस को चिंता उॅका ही नहीं होती, भगवान के साथ ही वह भली प्रकार तृप्त हुआ रहता है । गुरू नानक जी कहते हैं, हे नानक ! भगवान का नाम सुमिरन के बिना (तृष्णा की अग्नि से) बच नहीं सकते, (नाम के बिना) जीव अहंकार में पड़े जलते हैं । जिन मनुष्यों ने भगवान का नाम सुमिरा है, उनको सारे सुख मिल गए हैं, उन का सारा मनुखा जीवन सफल हुआ है जिन के मन में भगवान के नाम की भूख लगी हुई है (भावार्थ, ‘नाम’ जिनकी जिंदगी का सहारा हो जाता है) । जिस जिस ने गुरु के शब्द के द्वारा भगवान का सुमिरन किया है, उन के सारे दुःख दूर हो गए हैं । वह गुरसिक्ख अच्छे संत हैं जिन्होंने ने (भगवान के बिना) ओर किसी की रता भी आशा नहीं रखी; उन का गुरु भी धन्य है,किस्मत वाला है, जिस के मुख को (भगवान की सिफ़त-सालाह रूप) अमर करने वाले फल लगे हुए हैं (भावार्थ, जिस के मुक्ख से भगवान की प्रशंसा के बचन निकलते हैं) ।6।
13 ਮਾਰਚ 1940 ਨੂੰ ਸਰਦਾਰ ਉਧਮ ਸਿੰਘ ਨੇ ਜਲਿਆਂਵਾਲੇ ਬਾਗ ਦਾ ਬਦਲਾ ਲੰਡਨ ਜਾ ਕੇ ਓਡਵਾਇਰ ਨੂੰ ਗੋਲੀ ਮਾਰ ਕੇ ਲਇਆ ਸੀ ।
26 ਦਸੰਬਰ 1899 ਨੂੰ ਊਧਮ ਸਿੰਘ ਦਾ ਜਨਮ ਸੁਨਾਮ ਵਿਚ ਹੋਇਆ (ਇਤਿਹਾਸਕਾਰਾਂ ਦਾ ਜਨਮ ਅਤੇ ਜਨਮ ਸਥਾਨ ਬਾਰੇ ਥੋੜ੍ਹਾ-ਬਹੁਤਾ ਮਤਭੇਦ ਹੈ)। ਬਚਪਨ ਵਿਚ ਊਧਮ ਸਿੰਘ ਦਾ ਨਾਮ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਸੀ ਤੇ ਉਸ ਦੇ ਵੱਡੇ ਭਰਾ ਦਾ ਨਾਮ ਸਾਧੂ ਸਿੰਘ। ਅੰਮ੍ਰਿਤਪਾਨ ਕਰਕੇ ਚੂਹੜ ਸਿੰਘ ਕੰਬੋਜ (ਪਿਤਾ) ਟਹਿਲ ਸਿੰਘ ਬਣ ਗਿਆ। ਉਹ ਰੇਲਵੇ ਵਿਭਾਗ ਵਿਚ ਉਪਲੀ ਪਿੰਡ ਲਾਗੇ ਰੇਲਵੇ ਫਾਟਕ ’ਤੇ ਗੇਟਮੈਨ ਦੀ ਨੌਕਰੀ ਕਰਦਾ ਸੀ। ਦੋ ਸਾਲ ਦਾ ਸੀ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਜਦੋਂ ਉਸ ਦੀ ਮਾਂ ਦਾ ਦੇਹਾਂਤ ਹੋ ਗਿਆ। ਸਾਧੂ ਸਿੰਘ, ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਤੋਂ 5 ਸਾਲ ਵੱਡਾ ਸੀ। ਘਰ ਦੀ ਹਾਲਤ ਚੰਗੀ ਨਹੀਂ ਸੀ। ਟਹਿਲ ਸਿੰਘ ਆਪਣੇ ਦੋਹਾਂ ਬੱਚਿਆਂ ਨੂੰ ਲੈ ਕੇ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਰਹਿੰਦੇ ਆਪਣੇ ਇਕ ਕੀਰਤਨੀਏ ਰਿਸ਼ਤੇਦਾਰ ਚੰਚਲ ਸਿੰਘ ਕੋਲ ਜਾਣ ਦਾ ਫ਼ੈਸਲਾ ਕਰਦਾ ਹੈ। ਰਸਤੇ ਵਿਚ ਬਿਮਾਰ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਸਬੱਬ ਨਾਲ ਚੰਚਲ ਸਿੰਘ ਨਾਲ ਮੁਲਾਕਾਤ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਟਹਿਲ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਦੇ ਸਿਵਲ ਹਸਪਤਾਲ ਵਿਚ ਦਾਖ਼ਲ ਕਰਵਾਇਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਉੱਥੇ ਉਸ ਦੀ ਮੌਤ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਦੋਵੇਂ ਬੱਚੇ ਅਨਾਥ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਹਨ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਪਾਲਣ-ਪੋਸਣ ਦੀ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ ਚੰਚਲ ਸਿੰਘ ਉਪਰ ਆ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਉਹ ਕੀਰਤਨੀਆ ਹੈ, ਦੂਰ ਨੇੜੇ ਵੀ ਜਾਣਾ ਪੈਂਦਾ ਹੈ। ਬੱਚਿਆਂ ਦੀ ਦੇਖ-ਭਾਲ ਕਿਵੇਂ ਹੋਵੇਗੀ? ਇਹ ਸੋਚ ਕੇ ਚੰਚਲ ਸਿੰਘ ਦੋਹਾਂ ਬੱਚਿਆਂ ਨੂੰ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਦੇ ਕੇਂਦਰੀ ਖਾਲਸਾ ਯਤੀਮਖਾਨੇ ਵਿਚ ਦਾਖ਼ਲ ਕਰਵਾ ਦਿੰਦਾ ਹੈ।
ਯਤੀਮਖਾਨੇ ਦੀ ਇਹ ਰਵਾਇਤ ਸੀ, ਇੱਥੇ ਹਰ ਬੱਚੇ ਨੂੰ ਅੰਮ੍ਰਿਤਪਾਨ ਕਰਨਾ ਜ਼ਰੂਰੀ ਸੀ। ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਤੇ ਸਾਧੂ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਵੀ ਅੰਮ੍ਰਿਤਪਾਨ ਕਰਵਾਇਆ ਗਿਆ। ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਦਾ ਨਾਮ ਊਧਮ ਸਿੰਘ ਰੱਖਿਆ ਗਿਆ, ਸਾਧੂ ਸਿੰਘ ਦਾ ਨਾਮ ਮੋਤਾ ਸਿੰਘ ਰੱਖਿਆ (ਕੁਝ ਇਤਿਹਾਸਕਾਰ ਸਾਧੂ ਸਿੰਘ ਦਾ ਨਾਮ ਮੁਕਤਾ ਸਿੰਘ ਵੀ ਲਿਖਦੇ ਹਨ)। ਦੋਵੇਂ ਭਰਾ ਯਤੀਮਖਾਨੇ ਵਿਚ ਪਲਦੇ ਰਹੇ ਤੇ ਉੱਥੇ ਦਸਤਕਾਰੀ ਵੀ ਸਿੱਖਦੇ ਰਹੇ। ਊਧਮ ਸਿੰਘ ਬਣੇ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਨੇ ਬੜੇ ਕੰਮ ਬਦਲੇ। ਕਦੇ ਕੁਰਸੀਆਂ ਬਣਾਉਣ ਲੱਗ ਜਾਂਦਾ, ਕਦੇ ਉਸ ਨੂੰ ਸਿਲਾਈ ਦਾ ਕੰਮ ਚੰਗਾ ਲੱਗਦਾ, ਕਦੇ ਉਹ ਤਬਲਾ ਸਿੱਖਣ ਲੱਗਦਾ, ਕਦੇ ਕੀਰਤਨੀਆ ਬਣ ਬਹਿੰਦਾ। ਬਚਪਨ ਵਿਚ ਹੀ ਉਹ ਟਿਕ ਕੇ ਕੰਮ ਕਰਨ ਦੇ ਸੁਭਾਅ ਵਾਲਾ ਨਹੀਂ ਸੀ। ਇਹੀ ਸੁਭਾਅ ਉਸ ਦੇ ਅੰਤ ਤੱਕ ਨਾਲ ਨਿਭਿਆ, ਜਦੋਂ ਹਰ ਯਾਤਰਾ ਵੇਲੇ ਉਹ ਆਪਣਾ ਨਾਮ ਬਦਲ ਲੈਂਦਾ ਸੀ। 1913 ਵਿਚ ਨਮੂਨੀਏ ਦੀ ਬਿਮਾਰੀ ਨਾਲ ਉਸ ਦੇ ਵੱਡੇ ਭਰਾ ਸਾਧੂ ਸਿੰਘ (ਮੋਤਾ ਸਿੰਘ) ਦੀ ਮੌਤ ਹੋ ਗਈ। ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਵੱਡੇ ਭਰਾ ਦਾ ਬਾਪ ਜਿੰਨਾ ਆਸਰਾ ਸੀ। ਉਹ ਉਦਾਸ ਰਹਿਣ ਲੱਗਾ। ਰਾਤ ਵੇਲੇ ਰੋਇਆ ਕਰੇ। ਆਸਮਾਨ ਵਿਚ ਦਿਸਦੇ ਤਾਰਿਆਂ ਵਿਚੋਂ ਆਪਣੇ ਮਾਂ-ਬਾਪ ਤੇ ਭਰਾ ਭਾਲਿਆ ਕਰੇ। …ਹੌਲੀ ਹੌਲੀ ਉਹ ਸੰਭਲਿਆ ਤੇ ਉਸ ਨੇ ਦਸਵੀਂ ਜਮਾਤ ਪਾਸ ਕਰ ਲਈ। ਯਤੀਮਖਾਨੇ ਤੋਂ ਸਕੂਲ ਜਾਂਦਿਆਂ ਜਾਂ ਸਕੂਲ ਤੋਂ ਯਤੀਮਖਾਨੇ ਆਉਂਦਿਆਂ, ਕਦੇ ਸ੍ਰੀ ਹਰਿਮੰਦਰ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਦਰਸ਼ਨ ਕਰਨ ਜਾਂਦਿਆਂ ਰਸਤੇ ਵਿਚ ਉਹ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਨੂੰ ਵੇਖਦਾ, ਉਹ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਕੋੜੇ ਮਾਰ ਰਹੇ ਹੁੰਦੇ, ਕਿਸੇ ਕੋਲੋਂ ਬੈਠਕਾਂ ਕਢਵਾ ਰਹੇ ਹੁੰਦੇ, ਉਸਦਾ ਮਨ ਦੁਖੀ ਹੁੰਦਾ। ਜਦੋਂ ਮੌਕਾ ਮਿਲਦਾ ਉਹ ਜਾਨਣ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰਦਾ, ਉਹ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਕਿਉਂ ਸਜ਼ਾ ਦਿੰਦੇ ਹਨ। ਪਤਾ ਲੱਗਦਾ ਇਧਰੋਂ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਅਫ਼ਸਰ ਘੋੜੇ ਉੱਪਰ ਲੰਘ ਰਿਹਾ ਸੀ। ਬੇਧਿਆਨੀ ਵਿਚ ਕਿਸੇ ਦੁਕਾਨਦਾਰ ਜਾਂ ਰਾਹਗੀਰ ਨੇ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਨੂੰ ਸਲੂਟ ਨਹੀਂ ਮਾਰਿਆ ਤਾਂ ਉਸ ਨੂੰ ਕੋੜੇ ਮਾਰੇ ਜਾਂਦੇ ਹਨ ਜਾਂ ਬੈਠਕਾਂ ਕਢਵਾਈਆਂ ਜਾਂਦੀਆਂ ਹਨ। ਅੰਗਰੇਜ਼ ਅਫ਼ਸਰਾਂ ਦੇ ਇਸ ਵਿਹਾਰ ਨੇ ਊਧਮ ਸਿੰਘ ਦਾ ਮਨ ਅੰਗਰੇਜ਼ਾਂ ਪ੍ਰਤੀ ਨਫ਼ਰਤ ਅਤੇ ਘ੍ਰਿਣਾ ਨਾਲ ਭਰ ਦਿੱਤਾ। ਸਮੇਂ ਦੇ ਨਾਲ ਨਾਲ ਇਸ ਘ੍ਰਿਣਾ ਵਿਚ ਹੋਰ ਵਾਧਾ ਹੁੰਦਾ ਗਿਆ।
13 ਅਪਰੈਲ 1919 ਨੂੰ ਜਲ੍ਹਿਆਂਵਾਲਾ ਬਾਗ਼ ਦੀ ਘਟਨਾ ਨਾਲ ਪੂਰੇ ਭਾਰਤ ਵਿਚ ਰੋਸ ਦੀ ਲਹਿਰ ਫੈਲ ਗਈ। ਦਰਅਸਲ, 1915 ਦੇ ਡਿਫੈਂਸ ਆਫ਼ ਇੰਡੀਆ ਐਕਟ ਤੋਂ ਹੀ ਇਸ ਘਟਨਾ ਦੇ ਬੀਜ ਬੀਜੇ ਗਏ ਸਨ। ਰੌਲਟ ਐਕਟ ਨੇ ਇਸ ਨੂੰ ਸਿੰਜਿਆ। ਭਾਰਤੀਆਂ ਦੀਆਂ ਮੁਸ਼ਕਾਂ ਕਸਣ ਲਈ ਇਹ ਕਾਨੂੰਨ ਲਿਆਂਦਾ ਸੀ। ਸ਼ੱਕ ਦੇ ਆਧਾਰ ’ਤੇ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਵੀ ਫੜ ਲਓ। ਨਾ ਮੁਕੱਦਮਾ, ਨਾ ਸੁਣਵਾਈ, ਨਾ ਫ਼ਰਿਆਦ। ਸਿੱਧੀ ਸਜ਼ਾ ਕਾਲੇਪਾਣੀ ਜਾਂ ਉਮਰ ਕੈਦ। ਨਾ ਕੋਈ ਅਪੀਲ, ਨਾ ਕੋਈ ਦਲੀਲ, ਨਾ ਕੋਈ ਵਕੀਲ।
ਮੁਜ਼ਾਹਰਿਆਂ ਅਤੇ ਜਲਸਿਆਂ-ਜਲੂਸਾਂ ਦੇ ਡਰ ਤੋਂ ਅੰਗਰੇਜ਼ੀ ਹਕੂਮਤ ਨੇ ਜਨਤਾ ਦੇ ਆਗੂ ਡਾ. ਸੈਫ਼ੂਦੀਨ ਕਿਚਲੂ ਅਤੇ ਡਾ. ਸਤਿਆਪਾਲ ਨੂੰ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਤੋਂ ਗ੍ਰਿਫ਼ਤਾਰ ਕਰਕੇ ਡਲਹੌਜ਼ੀ ਨਜ਼ਰਬੰਦ ਕਰ ਦਿੱਤਾ। ਊਸੇ ਰੋਸ ਵਿਚ ਤੇ ਆਪਣੇ ਆਗੂਆਂ ਨੂੰ ਰਿਹਾਅ ਕਰਵਾਉਣ ਲਈ ਜਲ੍ਹਿਆਂਵਾਲਾ ਬਾਗ਼ ਵਿਚ ਪੰਜਾਬੀ, ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਵਿਚ ਹਿੰਦੂ, ਸਿੱਖ ਤੇ ਮੁਸਲਮਾਨ ਵੀ ਸਨ, ਇਕੱਠੇ ਹੋਏ। 13 ਅਪਰੈਲ ਵਿਸਾਖੀ ਦਾ ਦਿਹਾੜਾ ਸੀ। ਕੁਝ ਸ਼ਰਧਾਲੂ ਦਰਬਾਰ ਸਾਹਿਬ ਸੀਸ ਨਿਵਾਉਣ ਅਾਏ ਸਨ। ਉਹ ਵੀ ਜਲਸੇ ਵਿਚ ਸ਼ਾਮਲ ਹੋ ਗਏ। ਜਰਨਲ ਡਾਇਰ ਨੇ ਧਾਰਾ 144 ਲਗਾਈ ਹੋਈ ਸੀ ਤੇ ਇਕੱਠ ਕਾਰਨ ਦੀ ਮਨਾਹੀ ਸੀ। ਇਕ ਮੁਖ਼ਬਰ ਦੇ ਦੱਸਣ ’ਤੇ ਡਾਇਰ ਭੜਕ ਉੱਠਿਆ ਤੇ ਉਸ ਨੇ ਜਾ ਕੇ ਨਿਹੱਥੇ ਲੋਕਾਂ ਉੱਪਰ ਬਿਨਾਂ ਚਿਤਾਵਨੀ ਦਿੱਤਿਆਂ ਗੋਲੀਆਂ ਦਾ ਮੀਂਹ ਵਰ੍ਹਾ ਦਿੱਤਾ। ਗ਼ੈਰ-ਸਰਕਾਰੀ ਅੰਕੜਿਆਂ ਅਨੁਸਾਰ 1000 ਤੋਂ ਵੱਧ ਲੋਕ ਮਾਰੇ ਗਏ ਤੇ 1200 ਤੋਂ ਵੱਧ ਲੋਕ ਜ਼ਖ਼ਮੀ ਹੋਏ। ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਦੇ ਸਿਵਲ ਸਰਜਨ ਅਨੁਸਾਰ 1800 ਮੌਤਾਂ ਹੋਈਆਂ ਸਨ। ਇਹ ਵੀ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਕਿ ਊਧਮ ਸਿੰਘ ਆਪਣੇ ਯਤੀਮਖਾਨੇ ਦੇ ਸਾਥੀਆਂ ਨਾਲ ਉੱਥੇ ਪਾਣੀ ਪਿਲਾਉਣ ਦੀ ਸੇਵਾ ਕਰ ਰਿਹਾ ਸੀ ਤੇ ਦਰਿੰਦਗੀ ਦਾ ਇਹ ਕਾਂਡ ਉਸ ਨੇ ਅੱਖੀਂ ਵੇਖਿਆ ਸੀ ਤੇ ਦਰਬਾਰ ਸਾਹਿਬ ਜਾ ਕੇ ਇਸ਼ਨਾਨ ਕਰਕੇ, ਬਦਲਾ ਲੈਣ ਦਾ ਪ੍ਰਣ ਕੀਤਾ ਸੀ।
ਊਧਮ ਸਿੰਘ ਨੇ ਕਰਤਾਰ ਸਿੰਘ ਸਰਾਭੇ ਦੀ ਜੀਵਨੀ ਪੜ੍ਹੀ ਸੀ। ਮਦਨ ਲਾਲ ਢੀਂਗਰਾ ਬਾਰੇ ਸੁਣਿਆ ਹੋਇਆ ਸੀ। ਜਲ੍ਹਿਆਂਵਾਲਾ ਬਾਗ਼ ਕਾਂਡ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਉਸ ਦੇ ਜਿਉਣ ਦਾ ਮਕਸਦ ਹੀ ਬਦਲ ਗਿਆ। ਉਸ ਦਾ ਕੀਤਾ ਹੋਇਆ ਪ੍ਰਣ 21 ਸਾਲਾਂ ਬਾਅਦ 13 ਮਾਰਚ 1940 ਨੂੰ ਉਦੋਂ ਪੂਰਾ ਹੋਇਆ ਜਦੋਂ ਉਸ ਦਿਨ ਬਾਅਦ ਦੁਪਹਿਰ ਤਿੰਨ ਵਜੇ ਵੈਸਟਮਿੰਸਟਰ ਦੇ ਕੈਕਸਟਨ ਹਾਲ ਵਿਚ ਈਸਟ ਇੰਡੀਅਨ ਐਸੋਸੀਏਸ਼ਨ ਅਤੇ ਸੈਂਟਰਲ ਏਸ਼ੀਅਨ ਸੁਸਾਇਟੀ ਦੀ ਸਾਂਝੀ ਮੀਟਿੰਗ ਸਮੇਂ ਊਧਮ ਸਿੰਘ ਨੇ ਮਾਈਕਲ ਓਡਵਾਇਰ ਤੇ ਉਸ ਦੇ ਸਾਥੀਆਂ ’ਤੇ ਗੋਲੀਆਂ ਦਾਗ਼ ਦਿੱਤੀਆਂ। ਮਾਈਕਲ ਓਡਵਾਇਰ ਤਾਂ ਮੰਚ ਦੀਆਂ ਪੌੜੀਆਂ ਵਿਚ ਹੀ ਡਿੱਗ ਪਿਆ ਤੇ ਮਰ ਗਿਆ। ਲਾਰਡ ਜੈਟਲੈਂਡ ਅਤੇ ਲਾਰਡ ਲੈਮਿੰਗਟਨ ਜ਼ਖ਼ਮੀ ਹੋ ਗਏ। ਖ਼ਬਰ ਫੈਲਣ ਪਿੱਛੋਂ ਸਾਰੇ ਲੰਡਨ ਵਿਚ ਜਿਵੇਂ ਭੂਚਾਲ ਆ ਗਿਆ।
ਜੂਨ 1997 ‘ਚ ਇੰਗਲੈਡ ਸਰਕਾਰ ਵੱਲੋਂ ਰਿਲੀਜ ਕੀਤੀਆਂ ਗਈਆਂ 5 ਫਾਈਲਾਂ (771ਪੰਨੇ) ਤੋਂ ਪਤਾ ਲਗਦਾ ਹੈ ਕਿ ਸ਼ਹੀਦ ਊਧਮ ਸਿੰਘ ਨੇ ਕੈਕਸਟਨ ਹਾਲ ਵਿੱਚ ਇਕੱਲੇ ਮਾਈਕਲ ਓਡਵਾਇਰ ‘ਤੇ ਨਹੀਂ ਬਲਕਿ ਕੁੱਲ ਚਾਰ ਅੰਗਰੇਜ਼ ਅਫਸਰਾਂ ‘ਤੇ ਛੇ ਗੋਲੀਆਂ ਦਾਗੀਆਂ ਜਿਹਨਾਂ ਵਿੱਚ ਮਾਈਕਲ ਓਡਵਾਇਰ ਮੌਕੇ ‘ਤੇ ਹੀ ਮਾਰਿਆ ਗਿਆ ਅਤੇ ਬਾਕੀ ਜ਼ਖਮੀ ਹੋਏ। ਇਹ ਸਾਰੇ ਅਫਸਰ ਭਾਰਤ ਵਿੱਚ ਗਵਰਨਰ ਰਹਿ ਚੁੱਕੇ ਸਨ ਅਤੇ ਭਾਰਤ ਦੀ ਆਜ਼ਾਦੀ ਦੇ ਵਿਰੋਧੀ ਸਨ। ਲੇਖਕ ਜੋਰਾਵਰ ਸਿੰਘ ਤਰਸਿੱਕਾ ।
ਪੂਰੇ ਇੱਕੀ ਸਾਲ, ਜਲ੍ਹਿਆਂਵਾਲਾ ਬਾਗ਼ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਦੀ ਘਟਨਾ, ਊਧਮ ਸਿੰਘ ਦੇ ਸੀਨੇ ਵਿਚ ਅੱਗ ਵਾਂਗ ਬਲਦੀ ਰਹੀ ਤੇ ਬੇਕਸੂਰ ਨਿਹੱਥੇ ਪੰਜਾਬੀਆਂ ਦੀਆਂ ਚੀਕਾਂ ਉਸ ਦੇ ਕੰਨਾਂ ਵਿਚ ਗੂੰਜਦੀਆਂ ਰਹੀਆਂ। ਜਨਰਲ ਡਾਇਰ ਤੱਕ ਪੁੱਜਣ ਲਈ ਉਹ ਕਦੇ ਉਦੈ ਸਿੰਘ, ਕਦੇ ਸ਼ੇਰ ਸਿੰਘ, ਕਦੇ ਊਦਨ ਸਿੰਘ, ਕਦੇ ਊਧਮ ਸਿੰਘ, ਮੁਹੰਮਦ ਸਿੰਘ ਆਜ਼ਾਦ, ਆਜ਼ਾਦ ਸਿੰਘ, ਬਾਵਾ, ਫਰੈਂਕ ਬ੍ਰਾਜ਼ੀਲ ਬਣ ਕੇ ਯਤਨ ਕਰਦਾ ਰਿਹਾ। ਸ਼ਾਇਦ ਹੀ ਕੋਈ ਅਜਿਹਾ ਇਨਕਲਾਬੀ ਜਾਂ ਆਜ਼ਾਦੀ ਘੁਲਾਟੀਆ ਹੋਵੇਗਾ ਜਿਸ ਨੇ ਆਪਣੇ ਮਕਸਦ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਕਰਨ ਲਈ ਇੰਨੇ ਨਾਮ ਤਬਦੀਲ ਕੀਤੇ ਹੋਣ।
ਸ਼ਹੀਦ ਊਧਮ ਸਿੰਘ ਨੇ ਸਿਰਫ਼ ਆਪਣੇ ਨਾਮ ਹੀ ਨਹੀਂ ਬਦਲੇ, ਆਪਣੀ ਮੰਜ਼ਿਲ ਸਰ ਕਰਨ ਲਈ ਉਸ ਨੇ ਵੱਖ ਵੱਖ ਦੇਸ਼ਾਂ ਅਤੇ ਮਹਾਂਦੀਪਾਂ ਦੀਆਂ ਯਾਤਰਾਵਾਂ ਵੀ ਕੀਤੀਆਂ। ਕਦੇ ਸੜਕ ਰਾਹੀਂ, ਕਦੇ ਸਮੁੰਦਰਾਂ ਰਾਹੀਂ। ਜਦ ਤੱਕ ਉਸ ਨੇ ਆਪਣਾ ਮਿਸ਼ਨ ਪੂਰਾ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ, ਉਹ ਕਦੇ ਚੈਨ ਨਾਲ ਨਹੀਂ ਬੈਠਾ। ਉਹ ਗ਼ਦਰੀ ਬਾਬਿਆਂ ਨੂੰ ਮਿਲਿਆ, ਕ੍ਰਾਂਤੀਕਾਰੀਆਂ ਕੋਲ ਜਾਂਦਾ ਰਿਹਾ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਲਈ ਹਥਿਆਰਾਂ ਦਾ ਪ੍ਰਬੰਧ ਵੀ ਕਰਦਾ ਰਿਹਾ। ਕਮਾਲ ਦੀ ਗੱਲ ਹੈ: ਆਪਣੇ ਸਾਥੀਆਂ ਨਾਲ ਉਹ ਇਹੋ ਜਿਹਾ ਵਿਵਹਾਰ ਕਰਦਾ, ਸਾਰੇ ਉਸ ਨੂੰ ‘ਫੜ੍ਹਾਂ ਮਾਰਨ ਵਾਲਾ’ ਹੀ ਸਮਝਦੇ ਸਨ। ਉਸ ਦੀਆਂ ਗੱਲਾਂ ਨੂੰ ਕਦੇ ਗੰਭੀਰਤਾ ਨਾਲ ਨਹੀਂ ਸੀ ਲੈਂਦੇ। ਉਲਟਾ ਉਸ ਨੂੰ ਕਹਿੰਦੇ ਸਨ…: ‘‘ਤੂੰ ਕਦੇ ਵੀ ਥੇਮਜ਼ ਦੇ ਪਾਣੀਆਂ ਨੂੰ ਅੱਗ ਨਹੀਂ ਲਾ ਸਕੇਂਗਾ।’’
13 ਮਾਰਚ 1940 ਨੂੰ ਊਧਮ ਸਿੰਘ ਨੇ ਸੱਚਮੁੱਚ ਥੇਮਜ਼ ਦੇ ਪਾਣੀਆਂ ਨੂੰ ਅੱਗ ਲਾ ਦਿੱਤੀ। ਇੰਗਲੈਂਡ ਵਿਚ ਉਸ ਦੇ ਦੋਸਤ ਤਾਂ ਚਕਿੱਤ ਹੀ ਰਹਿ ਗਏ। ਪੂਰਾ ਬਰਤਾਨੀਆ, ਭਾਰਤ ਤੇ ਵਿਸ਼ਵ ਭਰ ਵਿਚ ਇਸ ਸਾਹਸੀ ਕਾਰਨਾਮੇ ਦੇ ਚਰਚੇ ਹੋਣ ਲੱਗੇ। ਮਾਈਕਲ ਉਡਵਾਇਰ ਨੂੰ ਮਾਰ ਕੇ ਤੇ ਉਸ ਦੇ ਸਹਿਯੋਗੀਆਂ ਨੂੰ ਜ਼ਖ਼ਮੀ ਕਰਕੇ ਊਧਮ ਸਿੰਘ ਘਟਨਾ ਵਾਲੇ ਸਥਾਨ ਤੋਂ ਭੱਜਿਆ ਨਹੀਂ। ਉਸ ਮੌਕੇ ਦੀ ਤਸਵੀਰ ਵਿਚ ਊਹ ਮੁਸਕਰਾ ਰਿਹਾ ਦਿਸਦਾ ਹੈ ਤੇ ਮਾਣ ਨਾਲ ਭਰਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ। ਊਧਮ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਗਿਆਨ ਸੀ, ਉਸ ਨੂੰ ਫਾਂਸੀ ਦੀ ਸਜ਼ਾ ਮਿਲੇਗੀ। ਉਹ ਕਹਿੰਦਾ ਹੈ, ‘‘ਮੈਂ ਆਪਣੇ ਸ਼ਹੀਦ ਸਾਥੀਆਂ ਕੋਲ ਜਾ ਰਿਹਾ ਹਾਂ।’’